अक्सर लोग सेहतमंद रहने की चाह में दिन की शुरुआत कुछ ऐसे खाद्य पदार्थों से कर लेते हैं, जिन्हें वे सबसे ज्यादा फायदेमंद मानते हैं। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि हर पौष्टिक चीज हर समय शरीर के लिए लाभकारी नहीं होती। खासतौर पर सुबह खाली पेट कुछ चीजों का सेवन पाचन तंत्र पर उल्टा असर डाल सकता है और धीरे-धीरे कई स्वास्थ्य समस्याओं की वजह बन सकता है।
चिकित्सा विज्ञान और आयुर्वेद के अनुसार, रातभर के उपवास के बाद पेट में एसिड का स्तर अधिक होता है। ऐसे में यदि सुबह खाली पेट गलत खाद्य पदार्थ लिए जाएं, तो पेट की अंदरूनी परत प्रभावित हो सकती है। इसका असर केवल एसिडिटी या गैस तक सीमित नहीं रहता, बल्कि लंबे समय में यह मेटाबॉलिज्म से जुड़ी दिक्कतें, ब्लड शुगर असंतुलन और आंतों की सूजन जैसी समस्याएं भी पैदा कर सकता है। इसलिए यह जानना जरूरी है कि कौन-सी चीज कब खानी चाहिए।
खाली पेट इन चीजों से बढ़ सकती है परेशानी
खट्टे फल जैसे संतरा, नींबू और मौसमी विटामिन-सी से भरपूर होते हैं, लेकिन सुबह खाली पेट इनका सेवन पेट में अतिरिक्त एसिड बना सकता है। इसी तरह फ्रूट जूस में फाइबर की कमी होती है और इसमें मौजूद फ्रुक्टोज अचानक ब्लड शुगर बढ़ा सकता है, जिससे कुछ देर बाद थकान महसूस होने लगती है।
कॉफी पीने की आदत भी खाली पेट नुकसानदेह हो सकती है। कैफीन पेट में एसिड के उत्पादन को बढ़ाता है और स्ट्रेस हार्मोन कोर्टिसोल को सक्रिय कर देता है, जिससे बेचैनी, घबराहट और डिहाइड्रेशन की समस्या हो सकती है।
दही को भले ही प्रोबायोटिक माना जाता हो, लेकिन खाली पेट लेने पर पेट में मौजूद तेज एसिड इसके लाभकारी बैक्टीरिया को नष्ट कर सकता है। इससे दही के फायदे कम हो जाते हैं और कुछ लोगों को गैस या पेट दर्द की शिकायत हो सकती है।
सुबह क्या लेना है बेहतर
विशेषज्ञों के अनुसार, दिन की शुरुआत गुनगुने पानी से करनी चाहिए। इसके बाद भीगे हुए बादाम, अखरोट, ओट्स या हल्का नाश्ता पाचन के लिए बेहतर रहता है। खट्टे फल, दही और जूस को नाश्ते के बाद या दिन में किसी अन्य समय लेना ज्यादा फायदेमंद माना जाता है। सही समय पर सही भोजन का चुनाव छोटी-सी आदत लग सकती है, लेकिन यही आदतें लंबे समय तक सेहत को सुरक्षित रखती हैं।
नोट: यह लेख विभिन्न मेडिकल रिपोर्ट्स और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह पर आधारित है।
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सर्दियों के मौसम में सिर्फ गर्म कपड़े पहनना ही काफी नहीं होता, बल्कि शरीर को भीतर से गर्म और मजबूत रखना भी उतना ही जरूरी है। ठंड और शीतलहर के दौरान अगर शरीर की आंतरिक ऊर्जा कमजोर पड़ जाए, तो सर्दी-जुकाम, खांसी, जोड़ों के दर्द और संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में भारतीय रसोई में मौजूद कुछ पारंपरिक चीजें प्राकृतिक सुरक्षा कवच का काम करती हैं। इनमें अदरक और लहसुन को सबसे प्रभावी माना जाता है।
आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान दोनों के अनुसार अदरक और लहसुन की तासीर गर्म होती है। इनमें मौजूद थर्मोजेनिक गुण शरीर के मेटाबॉलिज्म को सक्रिय कर अंदर से गर्माहट पैदा करते हैं। अदरक में पाया जाने वाला जिंजरॉल और लहसुन का एलिसिन तत्व रक्त संचार को बेहतर बनाता है, जिससे ठंड के कारण होने वाली सुस्ती और कमजोरी कम होती है। यही नहीं, ये दोनों तत्व सर्दियों में वायरल संक्रमण से बचाव में भी मददगार माने जाते हैं।
इनका नियमित और संतुलित सेवन श्वसन तंत्र को मजबूत करता है और फेफड़ों में जमा कफ को बाहर निकालने में सहायक होता है। ठंड के मौसम में दिल पर पड़ने वाले अतिरिक्त दबाव को कम करने में भी लहसुन उपयोगी माना जाता है, क्योंकि यह रक्त को गाढ़ा होने से रोकता है। वहीं अदरक सूजन और जकड़न को कम कर जोड़ों के दर्द से राहत दिलाने में सहायक है।
लहसुन को ऐसे करें शामिल
लहसुन का अधिक लाभ पाने के लिए इसे कच्चा या हल्का भूनकर सेवन करना बेहतर होता है। सुबह खाली पेट एक-दो कलियां शहद के साथ लेने से रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है। दाल, सब्जी और सूप में लहसुन का इस्तेमाल स्वाद के साथ-साथ सेहत भी बढ़ाता है। कुछ लोग सरसों के तेल में लहसुन पकाकर उस तेल से पैरों की मालिश करते हैं, जिससे शरीर की ठंडक कम होने में मदद मिलती है।
अदरक से बढ़ेगी अंदरूनी गर्मी
अदरक की चाय या काढ़ा सर्दियों में सबसे आसान और असरदार उपाय माना जाता है। अदरक, तुलसी और काली मिर्च को पानी में उबालकर पीने से गले की खराश और सर्दी में राहत मिलती है। खाने से पहले अदरक के छोटे टुकड़े पर नमक और नींबू लगाकर चबाने से पाचन बेहतर होता है और शरीर में ऊर्जा बनी रहती है।
संक्रमण और जोड़ों के दर्द से सुरक्षा
सर्दियों में जोड़ों की अकड़न और दर्द आम समस्या है। अदरक और लहसुन में मौजूद एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण सूजन को कम करने में मदद करते हैं। इसके अलावा ये दोनों मिलकर इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाते हैं, जिससे मौसमी बीमारियां शरीर पर आसानी से हावी नहीं हो पातीं।
सावधानी भी जरूरी
हालांकि अदरक और लहसुन बेहद फायदेमंद हैं, लेकिन इनका सेवन सीमित मात्रा में ही करना चाहिए। अधिक सेवन से एसिडिटी या पेट में जलन हो सकती है। गर्भवती महिलाएं या किसी विशेष दवा का सेवन कर रहे लोग इन्हें नियमित रूप से लेने से पहले विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।
नोट: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जानकारी पर आधारित है। किसी भी प्रकार की चिकित्सीय समस्या में डॉक्टर की सलाह लेना आवश्यक है।
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अब तक फैटी लिवर की बीमारी को केवल शराब या ज्यादा मीठा खाने से जोड़कर देखा जाता रहा है, लेकिन ताजा हेल्थ स्टडी और एक्सपर्ट्स की चेतावनियां कुछ और ही इशारा कर रही हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, हमारी रोजमर्रा की थाली में शामिल कुछ सामान्य खाद्य पदार्थ ऐसे हैं जो चुपचाप लिवर में फैट जमा कर रहे हैं और फैटी लिवर का खतरा कई गुना बढ़ा रहे हैं।
फैटी लिवर तब होता है जब लीवर की कोशिकाओं में जरूरत से ज्यादा चर्बी जमा हो जाती है। शुरुआत में इसके लक्षण साफ नजर नहीं आते, लेकिन समय के साथ यह सूजन, लीवर फाइब्रोसिस और यहां तक कि सिरोसिस जैसी गंभीर बीमारियों का रूप ले सकता है। बदलती जीवनशैली, प्रोसेस्ड फूड और गलत खानपान लिवर पर अतिरिक्त मेटाबॉलिक दबाव डाल रहे हैं, जिससे यह समस्या तेजी से बढ़ रही है।
हेल्थ एक्सपर्ट्स का कहना है कि सिर्फ चीनी कम करना काफी नहीं है। लीवर को सुरक्षित रखने के लिए उन खाद्य पदार्थों की पहचान करना जरूरी है जो रोजाना हमारे किचन से प्लेट तक पहुंच रहे हैं और धीरे-धीरे नुकसान पहुंचा रहे हैं।
रिफाइंड आटा और प्रोसेस्ड कार्बोहाइड्रेट
मैदा से बने खाद्य पदार्थ जैसे सफेद ब्रेड, बिस्कुट, नूडल्स और पास्ता शरीर में तेजी से शुगर में बदल जाते हैं। इनमें फाइबर न होने के कारण ब्लड शुगर अचानक बढ़ती है और लिवर अतिरिक्त ग्लूकोज को फैट में बदलने लगता है। यही प्रक्रिया आगे चलकर नॉन-अल्कोहलिक फैटी लीवर डिजीज की वजह बनती है।
जरूरत से ज्यादा नमक
अधिक नमक का सेवन केवल दिल के लिए ही नहीं, लीवर के लिए भी खतरनाक माना जाता है। अचार, पैकेज्ड स्नैक्स और डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों में मौजूद सोडियम शरीर में पानी रोकने और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को बढ़ाता है। इससे लिवर की कोशिकाओं पर दबाव बढ़ता है और उनमें क्षति की संभावना बढ़ जाती है।
ट्रांस फैट और हाइड्रोजेनेटेड तेल
वनस्पति घी, दोबारा गरम किया गया तेल और बाहर के तले हुए खाद्य पदार्थ ट्रांस फैट से भरपूर होते हैं। ये फैट लीवर में सूजन बढ़ाने के साथ-साथ खराब कोलेस्ट्रॉल को भी बढ़ाते हैं। लंबे समय तक इनके सेवन से लिवर के टिशूज में फैट जमा होने लगता है, जिसे शरीर आसानी से प्रोसेस नहीं कर पाता।
कैसे रखें लीवर को सुरक्षित?
फैटी लिवर से बचाव के लिए मैदा की जगह साबुत अनाज, जैसे जौ, बाजरा और ओट्स को भोजन में शामिल करें। ट्रांस फैट की जगह कोल्ड-प्रेस्ड या सीमित मात्रा में सरसों और जैतून के तेल का उपयोग करें। फाइबर युक्त आहार, नियमित व्यायाम और सक्रिय दिनचर्या लीवर को स्वस्थ रखने में अहम भूमिका निभाते हैं।
ध्यान रखें, लीवर शरीर का प्राकृतिक फिल्टर है। यदि इसकी सेहत बेहतर रहेगी, तो पूरे शरीर पर उसका सकारात्मक असर दिखाई देगा।
नोट: यह लेख विभिन्न मेडिकल रिपोर्ट्स और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह पर आधारित है।
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स्वच्छ पानी को स्वास्थ्य की बुनियाद माना जाता है, लेकिन जब यही पानी दूषित हो जाए तो यह गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है। अक्सर गंदे पानी से होने वाली बीमारी को केवल दस्त या डायरिया तक सीमित समझ लिया जाता है, जबकि चिकित्सकों के अनुसार अशुद्ध जल शरीर के कई अहम अंगों पर सीधा असर डालता है। दूषित जल में मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया, वायरस और परजीवी शरीर में प्रवेश कर पाचन तंत्र से होते हुए लीवर, किडनी और तंत्रिका तंत्र तक को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
सीवरेज और औद्योगिक अपशिष्ट से बढ़ता जोखिम
जब जल स्रोतों में सीवरेज का पानी या औद्योगिक कचरा मिल जाता है, तो वह पानी गंभीर संक्रामक रोगों का माध्यम बन जाता है। कई बार पानी दिखने में साफ होता है, लेकिन पाइपलाइन लीकेज या टंकी की गंदगी के कारण उसमें सूक्ष्म जीव मौजूद रहते हैं। ऐसे में हैजा, टाइफाइड और हेपेटाइटिस जैसी बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है, खासकर घनी आबादी वाले इलाकों में।
डिहाइड्रेशन से लेकर किडनी तक असर
गंदा पानी पीने से होने वाले संक्रमण सिर्फ शरीर से पानी की कमी तक सीमित नहीं रहते। इन बीमारियों के कारण इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन पैदा होता है, जिससे किडनी फेल होने, कमजोरी और तंत्रिका तंत्र से जुड़ी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है। समय पर इलाज न मिलने पर स्थिति जानलेवा भी हो सकती है।
टाइफाइड और हैजा का बड़ा कारण दूषित जल
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार टाइफाइड और हैजा का मुख्य कारण अशुद्ध पानी है। टाइफाइड साल्मोनेला टाइफी नामक बैक्टीरिया से होता है, जो तेज बुखार और आंतों में गंभीर संक्रमण पैदा करता है। वहीं हैजा में शरीर से पानी इतनी तेजी से बाहर निकलता है कि कुछ ही घंटों में मरीज की हालत बिगड़ सकती है। ये रोग दूषित जल के जरिए तेजी से फैलते हैं।
हेपेटाइटिस A और E से लीवर को खतरा
अशुद्ध पानी पीने से हेपेटाइटिस ए और ई जैसे वायरस शरीर में प्रवेश कर सकते हैं। ये संक्रमण सीधे लीवर को प्रभावित करते हैं, जिससे पीलिया, थकान, उल्टी और भूख न लगने जैसी समस्याएं सामने आती हैं। डॉक्टरों के अनुसार हेपेटाइटिस ई गर्भवती महिलाओं के लिए विशेष रूप से खतरनाक हो सकता है और इससे रिकवरी में लंबा समय लग सकता है।
पेचिश और आंतों के संक्रमण
दूषित पानी में मौजूद परजीवी पेचिश और पेट में कीड़ों की समस्या पैदा करते हैं। इसके लक्षणों में पेट दर्द, मरोड़ और मल के साथ खून आना शामिल है। लंबे समय तक ऐसा पानी पीने से आंतों की कार्यक्षमता प्रभावित होती है, जिससे शरीर पोषक तत्वों को सही तरह से अवशोषित नहीं कर पाता। बच्चों में यह स्थिति कुपोषण और विकास संबंधी समस्याओं का कारण बन सकती है।
बचाव ही सबसे बेहतर उपाय
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि पानी से होने वाली बीमारियों से बचाव के लिए सबसे जरूरी है सुरक्षित और शुद्ध जल का उपयोग। पानी को उबालकर पीना, क्लोरीन टैबलेट का इस्तेमाल और जल भंडारण के बर्तनों को साफ रखना प्रभावी उपाय माने जाते हैं। खुले में बिकने वाले पेय पदार्थों और बर्फ से परहेज करना भी जरूरी है। बुखार, दस्त या कमजोरी जैसे लक्षण दिखने पर तुरंत चिकित्सकीय सलाह लेना चाहिए।
नोट: यह लेख विभिन्न चिकित्सा रिपोर्ट्स और विशेषज्ञों की सलाह पर आधारित सामान्य जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है।
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सर्द मौसम में ठंड महसूस होना आम बात है, लेकिन कई बार ऐसा देखा जाता है कि समान माहौल में बैठे लोगों में कुछ को असहनीय ठंड लगती है, जबकि बाकी सामान्य महसूस करते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, इसका कारण केवल मौसम नहीं बल्कि शरीर के भीतर होने वाले पोषण असंतुलन और मेटाबॉलिक बदलाव भी हो सकते हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं कि मानव शरीर अपने तापमान को संतुलित रखने के लिए रक्त संचार, हार्मोन और ऊर्जा उत्पादन की प्रणाली पर निर्भर करता है। जब शरीर में आवश्यक विटामिन और मिनरल्स की कमी हो जाती है, तो यह संतुलन बिगड़ने लगता है। नतीजतन शरीर पर्याप्त गर्मी उत्पन्न नहीं कर पाता और व्यक्ति को बार-बार ठंड लगने लगती है।
डॉक्टरों के मुताबिक, आयरन की कमी इस समस्या की सबसे आम वजहों में से एक है। आयरन की कमी से हीमोग्लोबिन घटता है, जिससे शरीर के अंगों तक ऑक्सीजन कम पहुंचती है और हाथ-पैर ठंडे रहने लगते हैं। वहीं विटामिन बी12 की कमी नसों को प्रभावित करती है, जिससे झुनझुनी और ठंडक का अहसास बढ़ जाता है।
इसके अलावा थायरॉइड हार्मोन असंतुलन, कम कैलोरी डाइट, लगातार खाली पेट रहना और अत्यधिक मानसिक तनाव भी शरीर की गर्मी बनाए रखने की क्षमता को कमजोर कर देते हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि कमजोर इम्यून सिस्टम वाले लोगों को ठंड अधिक महसूस होती है।
ठंड से तुरंत राहत पाने के लिए हल्की शारीरिक गतिविधि जैसे टहलना या स्ट्रेचिंग फायदेमंद मानी जाती है। इससे रक्त प्रवाह बढ़ता है और शरीर जल्दी गर्म होता है। साथ ही गुनगुना पानी, हर्बल चाय या सूप पीने से भी आंतरिक तापमान में सुधार आता है।
पोषण विशेषज्ञ सर्दियों में गुड़, तिल, मूंगफली, बाजरा, खजूर, अदरक और लहसुन जैसे खाद्य पदार्थों को आहार में शामिल करने की सलाह देते हैं। ये खाद्य पदार्थ शरीर में ऊर्जा उत्पादन बढ़ाते हैं और रक्त संचार को बेहतर बनाते हैं।
यदि पर्याप्त भोजन और जीवनशैली सुधार के बावजूद अत्यधिक ठंड लगने की समस्या बनी रहती है, तो चिकित्सकीय जांच कराना जरूरी है। समय रहते ब्लड टेस्ट कराने से आयरन, बी12 या अन्य पोषक तत्वों की कमी का पता लगाया जा सकता है।
विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि बार-बार ठंड लगना किसी अंदरूनी स्वास्थ्य समस्या का संकेत भी हो सकता है, इसलिए इसे हल्के में न लें। संतुलित आहार, पर्याप्त नींद, नियमित योग और तनाव मुक्त जीवनशैली अपनाकर शरीर की प्राकृतिक गर्मी बनाए रखने की क्षमता को मजबूत किया जा सकता है।
नए साल और लगातार चलने वाली पार्टियों के बीच ज्यादा खाना लगभग हर किसी के साथ हो जाता है। स्वादिष्ट व्यंजन और मिठाइयों के कारण कई लोग जरूरत से कहीं अधिक कैलोरी ले लेते हैं। इसके बाद वजन बढ़ने की चिंता में लोग अगले ही दिन जिम में जरूरत से ज्यादा कसरत करने या डाइट को अचानक बेहद सख्त बनाने की गलती कर बैठते हैं। लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञ इसे सेहत के लिए नुकसानदायक मानते हैं।
वजन नियंत्रण और मेटाबॉलिज्म पर काम करने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि एक दिन में बहुत अधिक खाने के बाद शरीर को खुद को संतुलित करने के लिए समय चाहिए। ज्यादा कैलोरी लेने पर शरीर के हार्मोन, खासतौर पर इंसुलिन और पाचन से जुड़े एंजाइम्स, अतिरिक्त दबाव में आ जाते हैं। ऐसे में तुरंत भारी एक्सरसाइज या भूखा रहना शरीर के संतुलन को और बिगाड़ सकता है।
वेट लॉस एक्सपर्ट डॉक्टर मल्हार गणला के अनुसार, पार्टी के बाद अगले एक-दो दिन शरीर के लिए रिकवरी पीरियड की तरह होते हैं। इस दौरान अत्यधिक वर्कआउट करने से भूख और इंसुलिन का चक्र गड़बड़ा सकता है, जिससे बार-बार खाने की तलब लगने लगती है। अगर यह आदत कुछ दिनों तक जारी रहे, तो शरीर तैलीय और नमकीन खाने का आदी हो सकता है, जो आगे चलकर इंसुलिन रेजिस्टेंस की वजह बन सकता है।
डॉक्टर बताते हैं कि जब हार्मोन असंतुलित हो जाते हैं, तो दिमाग बार-बार भूख के संकेत भेजता है, भले ही शरीर को वास्तव में खाने की जरूरत न हो। इसलिए जरूरी है कि पार्टी के बाद खुद को सजा देने के बजाय शरीर को सामान्य स्थिति में लौटने का मौका दिया जाए।
विशेषज्ञों की सलाह है कि अधिक खाने के बाद अगले दो दिनों तक हल्का, सादा और घर का बना भोजन लिया जाए। इससे शरीर को अतिरिक्त कैलोरी को धीरे-धीरे खर्च करने का समय मिलता है और मेटाबॉलिज्म स्थिर रहता है। इस दौरान पर्याप्त पानी पीना और हल्की गतिविधि, जैसे टहलना, फायदेमंद हो सकता है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि वजन घटाने की जल्दबाजी से ज्यादा जरूरी है भूख और हार्मोनल संतुलन को सामान्य बनाए रखना। संयमित खानपान और धैर्य के साथ अपनाया गया तरीका न केवल वजन बढ़ने से बचाता है, बल्कि छुट्टियों के बाद शरीर को फिर से स्वस्थ लय में लौटाने में भी मदद करता है।
नए साल 2026 की शुरुआत के साथ ही स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने हाइपरटेंशन यानी हाई ब्लड प्रेशर को लेकर सतर्कता बरतने की अपील की है। देश में यह समस्या तेजी से बढ़ रही है और अनुमान के अनुसार 20 करोड़ से अधिक लोग इससे प्रभावित हैं। चिंताजनक बात यह है कि हाई बीपी अब केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि युवाओं में भी यह आम होता जा रहा है।
विशेषज्ञों के मुताबिक हाइपरटेंशन को ‘साइलेंट किलर’ कहा जाता है, क्योंकि शुरुआती दौर में इसके स्पष्ट लक्षण सामने नहीं आते। लेकिन समय रहते नियंत्रण न किया जाए तो यह हृदय, मस्तिष्क और किडनी को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है। बदलती जीवनशैली, मानसिक तनाव, असंतुलित खानपान और शारीरिक निष्क्रियता इसके प्रमुख कारण माने जा रहे हैं।
नमक का सीमित सेवन जरूरी
डॉक्टरों का कहना है कि हाई ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखने के लिए नमक का सेवन कम करना सबसे अहम कदम है। अधिक सोडियम शरीर में पानी की मात्रा बढ़ाता है, जिससे रक्तचाप बढ़ जाता है। प्रतिदिन 5 ग्राम से अधिक नमक का सेवन न करने और पैकेट बंद खाद्य पदार्थों से दूरी बनाने की सलाह दी गई है।
व्यायाम और वजन नियंत्रण पर जोर
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार नियमित शारीरिक गतिविधि से रक्तचाप को प्राकृतिक रूप से नियंत्रित किया जा सकता है। रोजाना कम से कम 30 मिनट तेज चाल से चलना, योग या हल्का व्यायाम करने से हृदय मजबूत होता है। साथ ही वजन संतुलित रहने पर हाई बीपी का खतरा भी कम हो जाता है।
तनाव और नींद भी अहम कारक
लगातार तनाव और नींद की कमी भी ब्लड प्रेशर बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाती है। विशेषज्ञ मेडिटेशन, प्राणायाम और गहरी सांस की तकनीक अपनाने की सलाह देते हैं। इसके अलावा रोजाना 7 से 8 घंटे की पर्याप्त नींद लेने से शरीर को आराम मिलता है और बीपी नियंत्रित रहता है।
खानपान में करें बदलाव
डाइट को लेकर डॉक्टर पोटेशियम युक्त खाद्य पदार्थों जैसे केला, पालक और शकरकंद को शामिल करने की सलाह देते हैं। DASH डाइट को हाई बीपी के मरीजों के लिए प्रभावी माना जाता है। साथ ही नियमित रूप से ब्लड प्रेशर की जांच कराने पर भी जोर दिया गया है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि जागरूकता और समय पर सावधानी ही हाई ब्लड प्रेशर जैसी गंभीर समस्या से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका है। नए साल में स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर इस ‘साइलेंट किलर’ को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
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तेज रफ्तार जीवन, असंतुलित खानपान और शारीरिक गतिविधियों की कमी ने बीते कुछ वर्षों में लिवर से जुड़ी बीमारियों का जोखिम तेजी से बढ़ा दिया है। स्थिति यह है कि अब केवल बुजुर्ग ही नहीं, बल्कि युवा और बच्चे भी लिवर संबंधी समस्याओं की चपेट में आ रहे हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते जीवनशैली में सुधार न किया जाए, तो लिवर की छोटी परेशानियां भी गंभीर रूप ले सकती हैं।
लिवर हमारे शरीर का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है, जो विषैले तत्वों को बाहर निकालने, पाचन और चयापचय जैसी अहम प्रक्रियाओं में भूमिका निभाता है। लिवर से जुड़ी बीमारियां जैसे फैटी लिवर या सिरोसिस न केवल जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करती हैं, बल्कि कई मामलों में जानलेवा भी साबित हो सकती हैं।
पहले से मौजूद बीमारियां बढ़ा सकती हैं लिवर का खतरा
विशेषज्ञ बताते हैं कि यदि कोई व्यक्ति पहले से डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर या हाई कोलेस्ट्रॉल जैसी बीमारियों से ग्रसित है और उन्हें नियंत्रित नहीं करता, तो इसका सीधा असर लिवर की सेहत पर पड़ सकता है। इन बीमारियों की अनियंत्रित स्थिति लिवर को धीरे-धीरे नुकसान पहुंचाती है, जिससे गंभीर रोग विकसित हो सकते हैं।
विशेषज्ञों की सलाह
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, जिन लोगों को मधुमेह, उच्च रक्तचाप या बढ़े हुए कोलेस्ट्रॉल की समस्या है, उन्हें नियमित जांच करानी चाहिए। ब्लड शुगर, ब्लड प्रेशर और लिपिड प्रोफाइल के साथ-साथ समय-समय पर लिवर, किडनी और आंखों की जांच भी जरूरी मानी जाती है, क्योंकि इन अंगों पर इन बीमारियों का सबसे अधिक असर पड़ता है।
डायबिटीज और लिवर रोगों का गहरा संबंध
डायबिटीज से पीड़ित लोगों में लिवर से जुड़ी समस्याओं का खतरा अधिक देखा गया है। जिस तरह मधुमेह किडनी को प्रभावित करता है, उसी प्रकार यह लिवर की कार्यप्रणाली को भी नुकसान पहुंचा सकता है। डायबिटिक मरीजों में नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज विकसित होने की आशंका अधिक रहती है, जो आगे चलकर गंभीर रूप ले सकती है।
अध्ययनों के अनुसार, सिरोसिस से पीड़ित अधिकांश मरीजों में ग्लूकोज इंटॉलरेंस या डायबिटीज की समस्या पाई जाती है। इसी कारण विशेषज्ञ ब्लड शुगर को नियंत्रण में रखने पर विशेष जोर देते हैं।
हाई ब्लड प्रेशर भी लिवर के लिए खतरा
आमतौर पर हाई ब्लड प्रेशर को हृदय रोगों से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन शोध बताते हैं कि यह लिवर सिरोसिस जैसी बीमारियों को भी बढ़ा सकता है। सिरोसिस की स्थिति में लिवर में रक्त प्रवाह बाधित होता है, जिससे पोर्टल वेन पर दबाव बढ़ता है। इस स्थिति को पोर्टल हाइपरटेंशन कहा जाता है, जो लिवर के लिए बेहद खतरनाक हो सकता है। इसलिए उच्च रक्तचाप को नियंत्रित रखना बेहद आवश्यक है।
बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल और लिवर की सेहत
हाई कोलेस्ट्रॉल केवल दिल ही नहीं, बल्कि लिवर के लिए भी नुकसानदायक होता है। सामान्य स्थिति में लिवर अतिरिक्त कोलेस्ट्रॉल को प्रोसेस कर बाहर निकाल देता है, लेकिन अत्यधिक वसायुक्त आहार लेने से यह क्षमता प्रभावित हो जाती है। इसके कारण फैटी लिवर डिजीज का खतरा बढ़ जाता है, जो समय के साथ गंभीर जटिलताओं का कारण बन सकती है।
शोध बताते हैं कि शरीर में अतिरिक्त कोलेस्ट्रॉल फैटी लिवर डिजीज की गंभीरता को और बढ़ा सकता है।
नोट: यह लेख विभिन्न मेडिकल रिपोर्ट्स और विशेषज्ञों की सलाह के आधार पर तैयार किया गया है।
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उत्तर भारत के कई हिस्सों में कड़ाके की ठंड के साथ-साथ वायु प्रदूषण भी गंभीर स्तर पर पहुंच चुका है। ऐसे हालात में मॉर्निंग वॉक, जॉगिंग या खुले पार्क में व्यायाम करना स्वास्थ्य के लिए जोखिम भरा हो सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि स्मॉग और जहरीली हवा फेफड़ों के साथ-साथ दिल पर भी अतिरिक्त दबाव डालती है। हालांकि खराब मौसम के बावजूद फिटनेस से समझौता करना जरूरी नहीं है। सही दिनचर्या और संतुलित खानपान के जरिए घर के अंदर रहकर भी वजन बढ़ने की समस्या से बचा जा सकता है।
सर्दियों में शरीर का मेटाबॉलिज्म सामान्य रूप से धीमा पड़ जाता है और हाई-कैलोरी भोजन की इच्छा बढ़ जाती है। ऐसे में अगर सावधानी न बरती जाए, तो वजन तेजी से बढ़ सकता है। अच्छी खबर यह है कि ठंड और प्रदूषण के बीच भी कुछ आसान उपाय अपनाकर फैट बर्न की प्रक्रिया को सक्रिय रखा जा सकता है।
खानपान में छोटे बदलाव, बड़ा असर
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, सर्दियों में फैट बर्न के लिए शरीर के आंतरिक तापमान को बढ़ाना बेहद जरूरी है। इसे थर्मोजेनेसिस कहा जाता है। इसके लिए भोजन में अदरक, काली मिर्च, दालचीनी और लहसुन जैसे गर्म तासीर वाले मसालों को शामिल करना फायदेमंद माना जाता है। ये तत्व मेटाबॉलिज्म को तेज करने में मदद करते हैं।
इसके साथ ही ठंडे पानी से परहेज कर गुनगुना पानी पीने की सलाह दी जाती है। गुनगुना पानी पाचन सुधारने के साथ-साथ शरीर से विषैले तत्वों को बाहर निकालने में सहायक होता है। दिन में 2 से 3 कप ग्रीन टी या हर्बल टी का सेवन भी वजन नियंत्रण में मदद कर सकता है।
घर के अंदर करें असरदार एक्सरसाइज
जब बाहर का माहौल अनुकूल न हो, तो इनडोर फिजिकल एक्टिविटी सबसे सुरक्षित विकल्प बन जाती है। फिटनेस एक्सपर्ट्स के मुताबिक, एक ही जगह पर दौड़ना (स्पॉट रनिंग), जंपिंग जैक, रस्सी कूदना या सीढ़ियां चढ़ना-उतरना कैलोरी बर्न करने के प्रभावी तरीके हैं। रोजाना 15 से 20 मिनट की तेज इनडोर एक्सरसाइज भी फिट रहने के लिए काफी मानी जाती है।
योगाभ्यास भी सर्दियों में बेहद कारगर है। खासतौर पर सूर्य नमस्कार पूरे शरीर की मांसपेशियों को सक्रिय करता है और फैट बर्न में मदद करता है। इसके अलावा घर की साफ-सफाई जैसे रोजमर्रा के काम भी शारीरिक गतिविधि बढ़ाने का अच्छा माध्यम हो सकते हैं।
अनहेल्दी स्नैकिंग से रखें दूरी
ठंड के मौसम में तला-भुना और मीठा खाने की इच्छा बढ़ जाती है, जो वजन बढ़ने का मुख्य कारण बनती है। विशेषज्ञ इसे ‘बोरडम ईटिंग’ का असर मानते हैं, जो प्रदूषण के कारण घर में ज्यादा समय बिताने से बढ़ती है।
इससे बचने के लिए बिस्किट, नमकीन और मिठाइयों की जगह भुने चने, मखाने, फल या कच्ची सब्जियों को स्नैक के रूप में अपनाने की सलाह दी जाती है। बिना क्रीम का सब्जी या टमाटर सूप भी पेट भरा रखने में मदद करता है और ओवरईटिंग से बचाता है।
तनाव कम करें, नींद पूरी लें
विशेषज्ञों के अनुसार, सर्दियों में धूप की कमी और ठंड के कारण शरीर में स्ट्रेस हार्मोन कॉर्टिसोल का स्तर बढ़ सकता है, जिससे पेट के आसपास चर्बी जमा होने लगती है। ऐसे में योग, प्राणायाम और मेडिटेशन तनाव कम करने के साथ-साथ फैट बर्न प्रक्रिया को संतुलित रखते हैं।
इसके अलावा 7 से 8 घंटे की गहरी नींद बेहद जरूरी है, क्योंकि शरीर इसी दौरान खुद को रिपेयर करता है और फैट मेटाबोलिज्म सबसे ज्यादा सक्रिय रहता है। सही नींद और नियमित दिनचर्या अपनाकर ठंड और प्रदूषण के मौसम में भी खुद को फिट और हेल्दी रखा जा सकता है।
नोट: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जानकारी और उपलब्ध रिपोर्ट्स पर आधारित है। किसी भी डाइट या एक्सरसाइज रूटीन को अपनाने से पहले विशेषज्ञ की सलाह लेना उचित है।
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तेजी से बदलती जीवनशैली के बीच हृदय रोग अब केवल बुज़ुर्गों तक सीमित नहीं रह गए हैं। हाल के वर्षों में युवाओं, यहां तक कि 30 साल से कम उम्र के लोगों में भी दिल से जुड़ी गंभीर समस्याओं के मामले सामने आ रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, अनियमित दिनचर्या, तनाव और गलत खानपान के साथ-साथ कुछ मामलों में आनुवांशिक कारण भी हृदय रोगों के खतरे को चुपचाप बढ़ा देते हैं, जिसकी समय रहते पहचान करना बेहद जरूरी है।
इसी दिशा में वैज्ञानिकों को एक अहम सफलता मिली है। शोधकर्ताओं ने एक ऐसे ब्लड टेस्ट की पहचान की है, जो दिल की एक गंभीर आनुवांशिक बीमारी के जोखिम का पहले ही संकेत दे सकता है। यह खोज खासतौर पर हाइपरट्रॉफिक कार्डियोमायोपैथी (HCM) जैसी समस्या से जुड़े मरीजों के लिए उम्मीद की नई किरण मानी जा रही है।
क्या है हाइपरट्रॉफिक कार्डियोमायोपैथी?
हाइपरट्रॉफिक कार्डियोमायोपैथी दिल की मांसपेशियों से जुड़ी एक आनुवांशिक बीमारी है, जिसमें हृदय की दीवारें असामान्य रूप से मोटी हो जाती हैं। इससे दिल को खून पंप करने में अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती है। यह बीमारी अक्सर परिवार में पीढ़ी दर पीढ़ी चलती है और कई बार शुरुआती चरण में इसके लक्षण साफ नजर नहीं आते।
इस बीमारी से पीड़ित लोगों को सांस फूलना, सीने में दर्द, चक्कर आना या अचानक बेहोशी जैसी समस्याएं हो सकती हैं। गंभीर मामलों में यह स्थिति जानलेवा भी साबित हो सकती है और अचानक कार्डियक अरेस्ट का खतरा बढ़ जाता है।
अब ब्लड टेस्ट से मिलेगा खतरे का संकेत
अब तक इस बीमारी की पहचान के लिए इकोकार्डियोग्राम, ईसीजी और जेनेटिक टेस्ट का सहारा लिया जाता था। लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि इन तरीकों से यह अंदाजा लगाना मुश्किल होता है कि किन मरीजों को सबसे अधिक खतरा है। इसी कमी को दूर करने के लिए शोधकर्ताओं ने एक खास ब्लड टेस्ट पर काम किया है।
हार्वर्ड और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से जुड़े वैज्ञानिकों की टीम ने पाया कि खून में मौजूद एक विशेष प्रोटीन NT-Pro-BNP का स्तर हृदय पर पड़ने वाले दबाव को दर्शा सकता है। इस प्रोटीन का अधिक स्तर यह संकेत देता है कि दिल सामान्य से अधिक मेहनत कर रहा है।
अध्ययन में क्या सामने आया?
शोध के दौरान करीब 700 HCM मरीजों के ब्लड सैंपल का विश्लेषण किया गया। जिन मरीजों में NT-Pro-BNP का स्तर अधिक पाया गया, उनमें दिल की संरचना में बदलाव, स्कार टिश्यू बनने और भविष्य में हार्ट फेलियर या एट्रियल फाइब्रिलेशन जैसी समस्याओं का खतरा ज्यादा देखा गया।
वैज्ञानिकों का मानना है कि इस ब्लड टेस्ट की मदद से उच्च जोखिम वाले मरीजों की पहचान पहले ही की जा सकेगी, जिससे उनकी नियमित निगरानी और समय पर इलाज संभव होगा।
विशेषज्ञों की राय
हार्वर्ड मेडिकल स्कूल की कार्डियोवैस्कुलर जेनेटिक्स विशेषज्ञ प्रोफेसर कैरोलिन हो के अनुसार, यह टेस्ट डॉक्टरों को यह तय करने में मदद कर सकता है कि किन मरीजों को अधिक गहन इलाज और निगरानी की जरूरत है। इससे जानलेवा स्थितियों को समय रहते रोका जा सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की जांच से मरीजों को अपनी जीवनशैली में सुधार करने और हृदय स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने का मौका भी मिलेगा।
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