सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को पीएम केयर्स फंड के मामले में अपना फैसला सुना दिया। कोर्ट ने उस याचिका को खारिज कर दिया है जिसमें पीएम केयर्स फंड की राशि को कोरोना महामारी के मद्देनजर राष्ट्रीय आपदा राहत कोष (NDRF) में हस्तांतरित करने की मांग की गई थी। कोर्ट के इस फैसले का स्वागत करते हुए भाजपा नेताओं ने कांग्रेस और और गांधी परिवार पर जमकर हमला बोला।
एक NGO सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (CPIL) की याचिका पर जस्टिस अशोक भूषण की अध्यक्षता वाली न्यायमूर्ति आरएस रेड्डी व न्यायमूर्ति एमआर शाह की पीठ ने कहा कि पीएम केयर्स फंड का पैसा एनडीआरएफ में ट्रांसफर करने का आदेश नहीं दे सकते। ये दोनों अलग-अलग फंड हैं। कोई व्यक्ति एनडीआरएफ में दान देना देना चाहे तो उस पर पाबंदी नहीं है। नई आपदा राहत योजना की भी जरूरत नहीं है। शीर्ष अदालत ने कहा कि सरकार इसकी राशि को उचित जगह हस्तांतरित करने के लिए स्वतंत्र है। उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार ने 28 मार्च को आपात स्थितियों में प्रधानमंत्री नागरिक सहायता एवं राहत (PM केयर्स) कोष की स्थापना की थी। इसका उद्देश्य कोविड-19 की वजह से उत्पन्न मौजूदा परिस्थिति से निपटना और प्रभावितों को राहत पहुंचाना था। इस कोष के प्रधानमंत्री पदेन अध्यक्ष बनाए गए हैं और रक्षामंत्री, गृहमंत्री व वित्तमंत्री पदेन न्यासी हैं।
नड्डा ने ट्वीट कर कांग्रेस पर साधा निशाना
कोर्ट का फैसला आते ही भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर निशाना साधा है। नड्डा ने सिलसिलेवार ट्वीट कर कहा, ‘पीएम केयर्स पर सर्वोच्च अदालत द्वारा दिए गए फैसले ने राहुल गांधी के नापाक मंसूबों पर पानी फेर दिया है। यह दिखाता है कि कांग्रेस पार्टी और उसके सहयोगियों के बुरे इरादे और दुर्भावनापूर्ण प्रयासों के बावजूद सच्चाई की जीत होती है।’ भाजपा अध्यक्ष ने कहा कि राहुल गांधी के हल्ला मचाकर दोषारोपण करने की आदत को जनता ने लगातार नकारा है और उसी जनता ने पीएम केयर्स कोष में दिल खेलकर दान किया है। गांधी परिवार ने पीएमएनआरएफ को दशकों तक व्यक्तिगत जागीर के रूप में माना और अपने परिवार के ट्रस्टों में पीएमएनआरएफ में नागरिकों की मेहनत से अर्जित धन हस्तांतरित किया।’
रविशंकर प्रसाद ने दिया हिसाब
इधर, केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कहा कि पीएम केयर्स फंड से अब तक कोरोना की लड़ाई में 3100 करोड़ रुपये की मदद की गई है। जिसमें 2,000 करोड़ रुपये सिर्फ वेंटिलेटर के लिए दिए गए हैं। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि 1000 करोड़ रुपये राज्यों को प्रवासी मजदूरों की व्यवस्था के लिए दिए गए। 100 करोड़ रुपये कोरोना की वैक्सीन के अनुसंधान के लिए दिए गए है। पीएम केयर्स फंड पंजीकृत सार्वजनिक ट्रस्ट है, जिसके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अध्यक्ष हैं। यह ट्रस्ट कोविड-19 जैसी आपातकाल स्थितियों के लिए बनाया गया है। इस फंड में लोगों ने स्वेच्छा से दान दिया। पिछले 6 साल के दौरान मोदी सरकार पर कोई भी भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगा। सभी चीजें पारदर्शिता के साथ हो रही है।
कांग्रेस पर निशाना साधते हुए प्रसाद ने कहा, राजीव गांधी फाउंडेशन एक फैमिली फाउंडेशन था। उसे चीन से भी मदद मिली थी। उस फाउंडेशन की रिपोर्ट में भारत के बाजार को चीनी उत्पाद के लिए खोलने की बात भी कही गई थी। उन्होंने कहा कि राहुल ने कोरोना की लड़ाई को कमजोर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। पीएम मोदी ने डॉक्टर, नर्स और कोविड की लड़ाई लड़ने वाले कोरोना वारियर्स के लिए ताली और थाली बजाने की बात कही तो राहुल गांधी ने कहा कि क्यों बजा रहे हो ? पूरे देश ने पीएम के कहने पर कोरोना के खिलाफ आशा का दीया जलाया तो राहुल ने कहा कि क्यों जला रहे हो?
केंद्रीय सतर्कता आयोग ( Central Vigilance Commission, CVC) ने केंद्र सरकार के सभी विभागों से कहा है कि भ्रष्टाचार की शिकायतों की जांच रिपोर्ट वे समय पर दें। साथ ही चेतावनी दी कि तय समय-सीमा का पालन नहीं करने को गंभीरता से लिया जाएगा।
CVC ने मुख्य सतर्कता अधिकारियों (Chief Vigilance Officers, CVOs) से ये रिपोर्ट मांगी। CVOs केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों, संगठनों के खिलाफ मिलने वाली भ्रष्टाचार की शिकायतों की जांच करते हैं। ऐसे मामलों की शिकायत मिलने पर CVOs को तीन महीने के भीतर जांच रिपोर्ट जमा करनी होती है।

CVC ने कहा, ‘आयोग को पता चला है कि विभाग व संगठन तय समयसीमा का पालन नहीं कर रहे हैं, जिसकी वजह से मामलों में बेवजह देरी हो रही है और शिकायत पर समयबद्ध कार्रवाई नहीं हो पा रही है। ‘
आयोग ने वर्तमान निर्देशों की समीक्षा के बाद कहा कि विभागों व संगठनों के CVOs तीन महीने की समय सीमा का ध्यान रखें। इस संबंध में आयोग के निदेशक जे.विनोद कुमार द्वारा केंद्र सरकार के सभी मंत्रालयों, विभागों, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों, बैंकों के आदि के CVO को निर्देश जारी किए गए।
महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी को गोवा के राज्यपाल का अतिरिक्त कार्यभार सौंपा गया है।
राष्ट्रपति सचिवालय द्वारा आज जारी एक विज्ञप्ति में जानकारी दी गयी है कि राष्ट्रपति ने गोवा के राज्यपाल सत्यपाल मलिक का स्थानांतरण मेघालय के राज्यपाल के पद पर किया है। मलिक के स्थानांतरण के फलस्वरूप महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी को गोवा के राज्यपाल का अतिरिक्त कार्यभार सौंपा गया है। उपरोक्त नियुक्तियां संबंधित व्यक्तियों के कार्यभार ग्रहण करने की तिथि से प्रभावी होंगी।

जय सिंह रावत, वरिष्ठ पत्रकार
पिछड़ापन, आर्थिक असमानता, गरीबी, लाचारी और सर्वसुलभ न्याय दुर्लभ होने के कारण अब भी भारत की आजादी को अधूरी मानने वाले लोगों से हम सहमत हो या नहीं, मगर इतना तो मानना ही पड़ेगा कि 15 अगस्त 1947 को हमें जो आजादी मिली थी वह सचमुच अधूरी ही थी, क्योंकि आजादी की घोषणा केवल ब्रिटिश भारत के लिए की गई थी और लगभग 562 रियासतों वाले शेष भारत का भविष्य तब भी अधर में लटका हुआ था।
देखा जाए तो जिस 15 अगस्त के दिन अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई मुकाम तक पहुंची। उसी दिन से देशी शासकों के अधिपत्य वाले रियासती भारत में आजादी की निर्णायक जंग शुरू हुई, जो कि 1975 में सिक्किम के विलय तक जारी रही। मानने वाले तो 5 अगस्त 2019 को संविधान की धारा 370 और 35 ए के प्रावधानों की समाप्ति को ही आजादी के समय शुरू हुई विलय की प्रक्रिया की सम्पूर्णता मानते हैं। 15 अगस्त 1947 को जब भारत में नए लोकतांत्रिक युग का सूत्रपात हुआ उस समय भारत में दो तरह की शासन व्यवस्थाएं थीं। इनमें से एक देशी रियासतों की सामंती व्यवस्था और दूसरी ब्रिटिश शासन व्यवस्था थी।
ब्रिटिश भारत भी बंगाल, मद्रास और बंबई प्रेसिडेंसियों तथा पूर्वी तथा पश्चिमी पाकिस्तान समेत भारत के 17 प्रोविन्सों में बंटा हुआ था। उस समय लगभग 562 देशी राज्य थे जिनमें कुल 27 की जनसंख्या वाली बिलबाड़ी रियासत भी थी, तो इटली देश से बड़ी हैदराबाद रियासत भी थी। जिसकी जनसंख्या उस समय 1.40 करोड़ थी। इनमें वे 35 हिमालयी रियासतें भी थीं जिनसे बाद में हिमाचल प्रदेश बना। एक अनुमान के अनुसार इन सभी रियासतों का क्षेत्रफल लगभग 7,12,508 वर्गमील या 11,40,013 वर्ग किमी था।
कैबिनेट मिशन स्पष्ट कर चुका था कि देशी राज्यों को पौरामौंट्सी संधि के तहत आंतरिक और बाह्य सुरक्षा की जो गारंटी ब्रिटिश सरकार ने दे रखी है, वह 15 अगस्त 1947 को संधि के समाप्त होने पर स्वतः ही समाप्त हो जाएगी। सन् 1857 की गदर के बाद ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत का शासन ईस्ट इंडिया कंपनी से छीन कर अपने हाथ में लिए जाने के बाद जब 1876 के अधिनियम के तहत ब्रिटिश साम्राज्ञी को ‘‘क्वीन एम्प्रेस ऑफ इंडिया’’ या भारत की महारानी घोषित किया गया और राज्यहरण की नीति त्याग कर देशी रियासतों को आंतरिक और बाह्य सुरक्षा की गारंटी दी गई तो बदले में उनकी सार्वभौम सत्ता ब्रिटिश क्राउन में सन्निहित हो गई थी।
इसमें देशी राज्यों के रक्षा, संचार, डाक एवं तार, रेलवे एवं वैदेशिक मामले ब्रिटिश हुकूमत में निहित हो गए थे। इसलिए सरदार पटेल और वीपी मेनन ने बहुत ही होशियारी से सबसे पहले देशी राज्यों को भारत संघ में मिलाने से पहले उनसे ‘इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन’ पर हस्ताक्षर करा कर स्वतंत्र निर्णय लेने के मामले में कानूनी तौर पर उनके हाथ बांध दिए थे। इसके बाद चरणबद्ध तरीके से उन सबका भारत संघ में विलय करा दिया गया। इस प्रक्रिया में उड़ीसा के 36 राज्यों का विलय 15 दिसंबर 1947 को तो कोल्हापुर और दक्कन ऐजेंसी के 17 राज्यों का विलय 8 मार्च 1948 को हुआ। सन् 1948 में ही सौराष्ट्र और काठियावाड़ की रियासतों का विलय हुआ।
बुंदेलखंड और बाघेलखंड की 35 रियासतों का 13 मार्च 1948, राजपूताना की 19 रियासतों का विलय भी मार्च 1948 में, जोधपुर, जैसलमेर, जयपुर, एवं बीकानेर का 19 मार्च 1948 को, इंदौर, ग्वालियर, झाबुआ एवं देवास का जून 1949 में, पंजाब की 6 रियासतों का 1948 में, उत्तर पूर्व के मणिपुर का 21 सितंबर 1948 में, त्रिपुरा का 9 सितम्बर 1949 में, कूच बिहार का 30 अगस्त 1949 में विलय हुआ। बड़े राज्यों में से हैदराबाद का पुलिस कार्यवाही के बाद 18 सितंबर 1948 को अधिग्रहण किया गया। जबकि त्रावनकोर-कोचीन 27 मई 1949, कोल्हापुर फरबरी 1949 तथा मैसूर का विलय 25 नवंबर 1949 को तथा हिमालयी राज्य टिहरी का विलय 1 अगस्त 1949 को हुआ। हिमाचल प्रदेश का गठन करने से पहले 1948 में ही वहां की 27 रियासतों का संघ बना कर उसे केंद्रीय शासन के तहत लाया गया।
ब्रिटिश भारत में जहां कांग्रेस आजादी के लिए लड़ रही थी, वहीं रियासतों में कांग्रेस के ही दिशा-निर्देशन में प्रजामंडल सक्रिय थे। इन प्रजामंडलों का संचालन सन् 1927 में बंबई में गठित अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद (ऑल इंडिया स्टेट्स पीपुल्स कान्फ्रेंस) कर रही थी। इसकी कमान पंडित जवाहरलाल नेहरू ने सन् 1939 में स्वयं संभाली, जो कि 1946 तक इसके अध्यक्ष रहे। नेहरू के बाद डॉ. पट्टाभि सीतारमैया ने परिषद की कमान संभाली जो कि 25 अप्रैल सन् 1948 में लोक परिषद के कांग्रेस में विलय के समय तक इसके अध्यक्ष रहे। इसी लोक परिषद के तहत पंजाब हिल्स की टिहरी समेत हिमाचल की 35 रियासतों के प्रजामंडलों के दिशा-निर्देशन के लिए हिमालयन हिल स्टेट्स रीजनल काउंसिल का गठन किया गया।
दरअसल, देशी रियासतें ब्रिटिश हुकूमत के लिए बफर स्टेट्स के समान थी। सन् 1857 की गदर के दौरान देशी शासकों ने अंग्रेजों का साथ देकर उन्हें अहसास दिला दिया था कि भारत पर शासन करना है तो राज्य हरण की नीति पर चलने के बजाय उनसे मिलकर चलने में ही अंग्रेजी हुकूमत की भलाई है। अंग्रेजों का इन पर नियंत्रण भी था और इनके प्रति सुरक्षा के अलावा कोई खास जिम्मेदारी भी नहीं थी। अंग्रेजी हुकूमत ने पैरामौंटसी हासिल कर देशी शासकों को दंडित करने और उनके उत्तराधिकारी के चयन का अधिकार अपने पास रख कर सार्वभौमिकता साथ ही उनकी वफादारी भी गिरवी रख दी थी।
सन् 1921 में माउटेग्यू चेम्सफोर्ड सुधार के तहत देशी शासकों को अपनी जरूरतों और आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति के लिए चैम्बर ऑफ प्रिंसेेज का गठन हो चुका था, जिसे नरेंद्र मंडल भी कहा जाता था। इसके पहले चांसलर बिकानेर के महाराजा गंगा सिंह बने। जवाहर लाल नेहरू ने स्वतंत्र भारत का संविधान बनाने के लिए जब देशी राज्यों से संविधान सभा में अपने प्रतिनिधि भेजने की अपील की तो भोपाल के नवाब, जो कि उस समय नरेंद्र मंडल के चांसलर भी थे, ने अपील ठुकरा दी। जबकि बीकानेर के महाराजा ने सबसे पहले अपना प्रतिनिधि संविधान सभा के लिए मनोनीत कर दिया। उसके बाद पटियाला, बड़ोदा, जयपुर और कोचीन के प्रतिनिधियों के संविधान सभा में शामिल होने से इन राज्यों की नई व्यवस्था के साथ चलने की शुरुआत हो गई।
तत्कालीन गर्वनर जनरल माउंटबेटन ने चैम्बर ऑफ प्रिंसेज की बैठक में साफ कह दिया था की राज्यों का अपना अलग अस्तित्व बनाए रखना अब व्यवहारिक नहीं रह गया है। इसलिए इन राज्यों को भारत या पाकिस्तान में से किसी के साथ भौगोलिक सम्बद्धता के अनुसार मिल जाना चाहिए। चूंकि जितने देशी राज्य उतने प्रांत बनाना संभव नहीं था। इसलिए पूर्ण रूप से भारत संघ में इनके विलय से पहले एकीकरण की कार्यवाही की गई और विलीनीकरण या मर्जर से पहले इंस्ट्रूमेण्ट ऑफ एक्सेशन पर देशी शासकों से हस्ताक्षर करा कर पटेल और मेनन ने एक तरह से उनकी सार्वभौमिकता हासिल कर ली, जिसके तहत देशी राज्यों ने सुरक्षा, यातायात और वैदेशिक मामलों के अधिकार भारत संघ को सौंप दिए मगर उनकी आंतरिक स्वायत्तता बरकरार रही। 15 अगस्त 1947 तक हैदराबाद, भोपाल और कश्मीर को छोड़कर 136 राज्यों ने विलय-पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए थे।
इस तरह भारत संघ में मिलने वाले 554 देशी राज्यों में से 551 तो इंस्ट्रूमेण्ट ऑफ एक्सेशन पर हस्ताक्षर के बाद शांतिपूर्ण ढंग से भारत संघ में विलीन हो गए। लेकिन हैदराबाद और भोपाल के विलय में मामूली बल का प्रयोग करना पड़ा। जूनागढ़ का नवाब पाकिस्तान में मिलने की घोषणा कर पाकिस्तान भाग गया था और उसकी रियासत को जनमत के आधार पर भारत में मिलाना पड़ा। कश्मीर के शासक ने भी स्वतंत्र रहने की घोषणा की थी, लेकिन जब 1948 में पाकिस्तान की ओर से उस पर कबाइली हमला हुआ तो उसने भी इंस्ट्रूमेण्ट ऑफ एक्सेशन पर हस्ताक्षर कर लिए। उस समय 216 छोटे राज्यों को निकटवर्ती प्रांतों से जोड़ कर उन प्रांतों को पार्ट-ए में रखा गया। उड़ीसा और छत्तीसगढ़ के 39 राज्यों को सेंट्रल प्रोविन्स और उड़ीसा में जोड़ा गया जबकि गुजरात के राज्य बंबई में मिलाए गए।
इसी तरह के 61 छोटे राज्यों का एकीकरण कर उन्हें पार्ट-सी की श्रेणी में तथा कुछ राज्यों के पांच संघ बना कर उन्हें पार्ट-बी में रखा गया। इनमें संयुक्त प्रांत पंजाब राज्य संघ राजस्थान संयुक्त प्रांत त्रानकोर-कोचीन आदि शामिल थे। सन् 1956 में संविधान के सातवें संशोधन से पार्ट-बी श्रेणी समाप्त कर दी गया।आजादी के बाद भी सन् 1975 में सिक्किम का भारत संघ में विलय हुआ, जबकि 5 अगस्त 2019 को भारत की संसद ने जम्मू-कश्मीर के लिए विशेषाधिकार वाली संविधान की धारा 370 और 35 को समाप्त कर उस राज्य की भारत संघ में पूर्ण विलय की जो प्रक्रिया 1948 में अधूरी रह गई थी उसे पूरा कर लिया। इसलिए देखा जाए तो 15 अगस्त का दिन स्वतंत्रता दिवस के साथ ही अखंड भारत के संकल्प का दिवस भी है।
पीएम स्ट्रीट वेंडर्स आत्म-निर्भर निधि (पीएम स्वनिधि) योजना के तहत ऋण देने की प्रक्रिया के शुरू होने के 41 दिनों के भीतर पांच लाख लोगों ने ऋण के लिए आवेदन किया है, जबकि एक लाख लोगों को ऋण उपलब्ध कराया जा चूका है। पीएम स्वनिधि योजना को केंद्रीय आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय ने ‘आत्म-निर्भर भारत अभियान’ के तहत लॉन्च किया था।
आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय के अनुसार इस योजना के तहत २ जुलाई से ऋण देने की प्रक्रिया शुरू की गयी थी। इसका उद्देश्य शहरी क्षेत्रों और उसके आसपास के अर्द्ध-शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों के लगभग 50 लाख स्ट्रीट वेंडर (रेहड़ी वाले छोटे व्यापारियों) को कोविड-19 लॉकडाउन के बाद फिर से अपना कारोबार शुरू करने के लिए बिना किसी की गारंटी के एक साल की अवधि के लिए 10,000 रुपये तक के कार्यशील पूंजी ऋण की सुविधा देना है। इसके तहत ऋण के नियमित किश्त चुकाने पर प्रोत्साहन के रूप में प्रति वर्ष 7 प्रतिशत की ब्याज सब्सिडी दी जाएगी। इसके आलावा निर्धारित डिजिटल लेनदेन करने पर सालाना 1,200रुपये तक का कैशबैक और आगे फिर से ऋण पाने की पात्रता भी प्रदान की गई है।
पीएम स्वनिधि योजना में व्यावसायिक बैंकों- सार्वजनिक एवं निजी, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों, सहकारी बैंकों, स्वयं सहायता समूह (SHG) बैंकों आदि के अलावा ऋण देने वाली संस्थाओं के रूप में गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFC)और लघु वित्तीय संस्थानों (MFI) को योजना से जोड़कर इन छोटे उद्यमियों के द्वार तक बैंकों की सेवाएं पहुंचाने का विचार किया गया है। डिजिटल भुगतान प्लेटफॉर्म पर इन विक्रेताओं को लाना इनके क्रेडिट प्रोफाइल का निर्माण करने के लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण घटक है ताकि इन्हें औपचारिक शहरी अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनने में मदद मिल सके।
इस योजना को लागू करने की जिम्मेदारी भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (SIDB) को दी गई है। रेहड़ी-खोमचे वालों को उधार देने के लिए इन ऋणदाता संस्थानों को लघु एवं मध्यम उद्योगों के लिए क्रेडिट गारंटी फंड ट्रस्ट (CGTMS) के माध्यम से प्रोत्साहित करने हेतु इनके पोर्टफोलियो के आधार पर एक ग्रेडेड गारंटी कवर प्रदान किया जाता है।
सड़कों पर रेहड़ी लगाकर व्यापार करने वाले ज्यादातर विक्रेता बहुत कम लाभ पर अपना व्यवसाय करते हैं। इस योजना के तहत ऐसे विक्रेताओं को लघु ऋण से न केवल बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है,बल्कि उन्हें आर्थिक प्रगति करने में भी मदद मिलेगी।
नई दिल्ली। कुछ चीनी व्यक्तियों और उनके भारतीय सहयोगियों की जाली संस्थाओं के माध्यम से मनी लॉन्डरिंग और हवाला जैसे लेन-देन में शामिल होने की विश्वसनीय जानकारी के आधार आयकर विभाग ने मंगलवार को इन चीनी संस्थाओं के विभिन्न परिसरों, इनके करीबियों और इनसे जुड़े बैंक कर्मचारियों के खिलाफ एक तलाशी अभियान चलाया है।
एक सरकारी प्रेस विज्ञप्ति में यह जानकारी दी गयी है। तहकीकात से पता चला है कि इन चीनी व्यक्तियों के इशारे पर, विभिन्न फर्जी संस्थाओं में 40 से अधिक बैंक खाते खोले गए थे। एक निश्चित समयावधि के भीतर ही इनमें 1,000 करोड़ रुपये से अधिक की धनराशि जमा की गई थी। चीनी कंपनी की एक सहायक इकाई और उससे संबंधित जाली संस्थाओं ने भारत में खुदरा शोरूम खोलने के कारोबार के लिए जाली संस्थाओं से 100 करोड़ रुपये से अधिक की अग्रिम धनराशि प्राप्त की है। इसके अलावा, तलाशी के दौरान हवाला लेन-देन और मनी लॉन्डरिंग के दस्तावेजों को नष्ट करने में कुछ बैंक कर्मचारियों और चार्टेड अकाउंटेंट के सक्रिय रूप लिप्त होने की भी जानकारी मिली है। छानबीन के दौरान हांगकांग व अमेरिकी डॉलर के विदेशी हवाला लेन-देन के सबूतों का भी खुलासा हुआ है। इस मामले में आगे की जांच प्रक्रिया को अंजाम दिया जा रहा है।
केन्द्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स, सूचना प्रोद्योगिकी, संचार तथा विधि मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि केंद्र सरकार सामरिक महत्व के दूर-दराज तथा सीमावर्ती क्षेत्रों में मोबाइल कनेक्टिविटी प्रदान करने के लिए प्राथमिकता के आधार पर प्रयास कर रही है ताकि यहां जीवन सुगम बनाया जा सके।
दिल्ली में मीडियाकर्मियों से बातचीत करते हुए प्रसाद ने दूर-दराज के क्षेत्रों में कनेक्टिविटी प्रदान करने के लिए दूरसंचार विभाग द्वारा कार्यान्वित की जा रही विभिन्न परियोजनाओं के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि रणनीतिक, दूरस्थ और सीमावर्ती क्षेत्रों में 354 गांवों में ऐसी कनेक्टिविटी प्रदान करने के लिए एक निविदा को अंतिम रूप दिया गया है। बिहार, राजस्थान, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और गुजरात के अन्य प्राथमिकता वाले क्षेत्रों के 144 गांवों में जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेशों में इसे लागू किया जा रहा है। इन गांवों को रणनीतिक रूप से मोबाइल पर सीमा क्षेत्र कनेक्टिविटी को कवर करने के लिए चुना गया है। इन गांवों में चालू होने के बाद, मोबाइल कनेक्टिविटी के लिए जम्मू-कश्मीर, लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेशों में कोई भी ऐसा गाँव नहीं होगा जहां मोबाइल कनेक्टिवविटी उपलब्ध नहीं होगी। सेना, बीआरओ, बीएसएफ, सीआरपीएफ, आईटीबीपी, एसएसबी आदि के लिए 1347 साइटों पर उपग्रह आधारित डीएसपीटी डिजिटल सैटेलाइट फोन टर्मिनल (डीएसपीटी) भी प्रदान किए जा रहे हैं, जिनमें से 183 साइटें पहले से ही चालू हैं और शेष चालू होने की प्रक्रिया में हैं।
केन्द्रीय मंत्री ने यह भी बताया कि दूरसंचार विभाग बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश के 24 जिलों के गाँवों में मोबाइल कनेक्टिविटी प्रदान करने पर काम कर रहा है। छत्तीसगढ़, ओडिशा, झारखंड, आंध्र प्रदेश में बचे हुए 44 जिलों के 7287 के गांवों को भी कवर किया जाएगा जिसके लिए सरकार की मंजूरी प्राप्त करने की प्रक्रिया चल रही है।
हिमालयी क्षेत्र में पाए जाने वाले गर्म पानी के सोते (Hot Water Spring) बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) का उत्सर्जन करते हैं। यह तथ्य वाडिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ हिमालयन जियोलॉजी के एक अध्ययन में सामने आया है।
वाडिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ हिमालयन जियोलॉजी केंद्र सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय अधीन एक स्वायत्त संस्थान है। इसका मुख्यालय देहरादून में स्थित है। संस्थान द्वारा किये गए अध्ययन की एक वैज्ञानिक पत्रिका एनवायरनमेंटल साइंस एंड पॉल्यूशन रिसर्च में रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने एक विज्ञप्ति में कहा की ज्वालामुखी विस्फोटों, भू-गर्भीय चट्टानों और भू-तापीय प्रणाली के माध्यम से पृथ्वी के आंतरिक भाग से वायुमंडल में निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड गैस वैश्विक कार्बन चक्र पर असर डालती है और यह पृथ्वी पर छोटे और लंबे समय तक जलवायु को प्रभावित करती है।
अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र के लगभग 10,000 वर्ग किमी के हिमालयी क्षेत्र में लगभग 600 गर्म पानी के सोते हैं। विभिन्न तापमान और रासायनिक स्थितियों वाले ये भूगर्भीय सोते (Geothermal Springs) कार्बन डाइऑक्साइड का डिस्चार्ज करते पाए गए हैं। वाडिया इंस्टीट्यूट को इन सोतों से उत्सर्जित होने वाली गैस की जांच करने की विशेषज्ञता है। वैज्ञानिकों की टीम ने गढ़वाल में हिमालय के प्रमुख फॉल्ट क्षेत्रों से 20 गर्म पानी के इन सोतों से एकत्र किए गए पानी के नमूनों का विस्तृत रासायनिक और आइसोटोप विश्लेषण किया। आइसोटोपिक माप में कार्बनिक और अकार्बनिक यौगिकों के भीतर कुछ स्थिर आइसोटोप और रासायनिक तत्वों की प्रचुरता की पहचान के साथ-साथ सभी नमूनों का विश्लेषण किया गया।
उप राष्ट्रपति एम.वेंकैया नायडू ने भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के युवा प्रशिक्षु अधिकारियों से कहा कि वे अपने कार्य को गरीब-अमीर, स्त्री-पुरुष, शहर-गावों के बीच अंतर को मिटाने के मिशन के रूप में लें और नए भारत के लिए परिवर्तन के कारक के रूप में कार्य करें।
उप राष्ट्रपति ने आज लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासनिक अकादमी, मसूरी के 2018 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा के युवा प्रशिक्षुओं को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से संबोधित किया। उन्होंने कहा कि हाशिए पर खड़े वर्गों का सामाजिक आर्थिक उत्थान अधिकारियों का मूल उद्देश्य होना चाहिए। सरदार पटेल के स्वप्न को याद दिलाते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि उन्होंने एक ऐसी सिविल सेवा की अपेक्षा की थी जो गरीबी और भेदभाव से लड़ कर एक नए भारत के उत्थान के लिए काम करे।
उप राष्ट्रपति ने प्रशिक्षु अधिकारियों से कहा कि वे अपने काम में सत्यनिष्ठ, अनुशासित, कर्मठ, जवाबदेह, पारदर्शी बनें और सादगी का जीवन व्यतीत करें। पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को याद करते हुए उन्होंने कहा कि वे एक महान नेता थे, सत्यनिष्ठा, ईमानदारी, कर्मठता, करुणा, राष्ट्र भाव और साहस जैसे गुण उनके चरित्र में रचे-बसे थे।
नायडू ने प्रशिक्षुओं से कहा कि वे निरन्तर नया सीखते रहें, विचार करें और नए प्रयोग करें। उन्होंने कहा कि सुशासन ही आज के समय की मांग है। प्रशासन तंत्र छोटा किन्तु सक्षम और दक्ष होना चाहिए, जो पारदर्शी हो और लोगों की अपेक्षाओं को पूरा कर सके। एक ऐसा तन्त्र जो सुविधा और सेवाओं को तत्परता से उपलब्ध करा सके तथा उन्नति के अवसर और स्थितियां पैदा करे।
उपराष्ट्रपति ने कहा यद्यपि विधायिका कानून और नीतियां बनाती है। फिर भी उनको जमीन पर कैसे लागू किया जाता है, ये अधिक महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा जो सरकार तत्परता और दक्षता से सेवा और सुविधा सुनिश्चित कर सकती है वो ही लोगों द्वारा याद की जाती है। श्री नायडू ने कहा कि यह जिम्मेदारी प्रशासकों की है कि लोगों को उनके अधिकार और उनके लिए अधिकृत सुविधाएं बिना किसी देरी के जल्द से जल्द उपलब्ध कराई जाएं।
नायडू ने प्रशिक्षु अधिकारियों से अपेक्षा की कि वे अपने सहयोगियों और मातहत काम करने वाले कर्मचारियों के साथ एक टीम बनाएं और जन सेवा के कार्य दक्षता से करें। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दिया मंत्र “परफॉर्म, रिफॉर्म, ट्रांसफॉर्म” युवा अधिकारियों को नए प्रयोग करने की प्रेरणा देगा और वे बेहतर से बेहतर अधिकारी के रूप में प्रगति करते जायेंगे।
उन्होंने कहा कि भारत तेजी से हो रहे परिवर्तनों के दौर में है। महामारी के बावजूद विकास और आत्म निर्भरता के ऐसे अनेक नए अवसर हैं जो हमारे विकास की प्रक्रिया को किसी भी आपदा से निरापद रख सकते हैं। उन्होंने प्रशिक्षुओं से आग्रह किया कि वे आगे बढ़ कर बदलते हुए नए भारत का नेतृत्व करें। नया भारत समावेशी है। उसमें जीवन की गुणवत्ता है। लोकतान्त्रिक मर्यादाओं को सुदृढ़ किया जा रहा है। जन कल्याण के संस्थानों को सशक्त बनाया जा रहा है। युवा अधिकारियों को महात्मा गांधी का बताया मंत्र देते हुए, उन्होंने कहा कि वे सत्य, न्याय, समावेश, जन कल्याण और पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपनी निष्ठा के आधार पर ही सही और निस्पृह भाव से निर्णय ले सकेंगे।
भाषा की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि प्रशासन की भाषा स्थानीय लोगों की आम भाषा होनी चाहिए। उन्होंने इस बात की सराहना की कि अधिकारी अपने प्रशिक्षण के दौरान स्थानीय भाषा सीखते हैं।
इस अवसर पर उपराष्ट्रपति ने लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासनिक अकादमी द्वारा प्रकाशित, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के “मन की बात” कार्यक्रम के संकलन, “सिक्सटी फाइव कन्वर्सेशन” का लोकार्पण भी किया। एकेडमी के निदेशक संजीव चोपड़ा तथा फैकल्टी के अन्य सदस्य इस वर्चुअल समापन समारोह के अवसर पर उपस्थित रहे।
पूर्व केंद्रीय मंत्री व भाजपा की वरिष्ठ नेता पद्मविभूषण स्व. सुषमा स्वराज की प्रथम पुण्य तिथि पर आयोजित वेबिनार सुषमान्जलि में उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा कि सुषमा स्वराज सब पर प्यार बरसाने वाली जिंदादिल इंसान थीं।
वेबीनार का आयोजन नेशनल फर्स्ट कलेक्टिव, संस्कार भारती पूर्वोत्तर व संस्कृति गंगा न्यास के संयुक्त तत्वावधान में किया गया था। इस मौके पर जावड़ेकर ने कहा कि वर्ष 1980 में वे युवा मोर्चा में कार्य करते थे। उस दौरान उनका सुषमा स्वराज से पहली बार परिचय हुआ था। तब भी सुषमा जी की छवि एक प्रखर वक्ता के रूप में थी। उन्हें सुषमा जी का बहुत स्नेह मिला है।

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि सुषमा स्वराज की भाषा पर गहरी पकड़ थी। जब वो भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता बने तो सुषमा जी उनको बताती थीं कि शब्दों का समुचित उपयोग जरूरी है। सुषमा जी कनार्टक के बेल्लारी से लोकसभा चुनाव लड़ी, तो उन्होंने कन्नड़ भाषा सीख ली। भाषा ग्रहण करना उनके व्यक्तित्व का हिस्सा था।
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि राज्यसभा, लोकसभा हो या जनसभा, सभी जगह लोग उनके भाषण सुनने के लिए आतुर रहते थे। तेलंगाना राज्य निर्माण के समय सुषमा जी को लोकसभा में भाजपा की ओर से पक्ष रखने को कहा गया था। उन्होंने ऐसी आक्रमकता के साथ अपनी बात रखी कि तेलंगाना के लोगों के दिलों में उनके लिए जगह बन गई। उन्होंने सुषमा स्वराज की ममतामई छवि की चर्चा की और कहा कि विश्वास नहीं होता है कि वे असमय चली गईं। ऐसा लगता है कि वे अभी बोल उठेंगी।
कार्यक्रम की विशिष्ट अतिथि सुषमा स्वराज की सुपुत्री व सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता बांसुरी स्वराज ने कहा कि उनकी मां भगवान श्री कृष्ण की उपासक थीं। वो कहती थीं कि श्री कृष्ण ने जो भी कार्य किए, उसमें वो पूरी ताकत झोंक देते थे। मां ने भी उनका अनुसरण किया। सरकार में जो भी मंत्रालय संभाला, उसमें जनकल्याण के लिए बड़े-बड़े फैसले लिए।
बांसुरी के इस प्रसंग ने सभी की आंखे नम कर दीं। जब उन्होंने बताया कि वो छोटी थीं और परमिशन जैसे शब्द का अर्थ क्या, बोल भी नहीं पाती थीं। तब भी उनकी मां चुनाव-प्रचार में जाने से पूर्व कहती थीं कि पहले बेटी की परमिशन ले लूं। मगर उनकी अपनी मां से एक शिकायत है कि पिछले वर्ष 6 अगस्त को उन्होंने अपनी बेटी से कोई परमिशन नहीं ली और चली गईं।

भारतीय सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष प्रसून जोशी ने उन्हें संवेदनशील व प्रेरणादाई व्यक्तित्व बताया और कहा कि सुषमा जी का कविता के प्रति प्रेम था। यही कारण है कि जीवन के प्रति वो काव्य दृष्टि रखती थीं। यह उनके हावभाव में भी परिलक्षित होता था। जोशी ने इस अवसर पर अपनी एक कविता भी सुनाई, जिसे सुषमा स्वराज पसंद करती थीं।
प्रसिद्ध निर्माता-निर्देशक सुभाष घई ने उन्हें एक ऐसा सम्पूर्ण व्यक्तित्व बताया, जिसने कुशलता के साथ अलग-अलग भूमिकाओं का निर्वहन किया। फिल्मकार मधुर भंडारकर ने सुषमा स्वराज से जुड़े अपने संस्मरणों की चर्चा की और कहा कि वे हमेशा प्रोत्साहन देने का काम करती थीं।
फिल्म अभिनेत्री पद्मश्री कंगना राणावत ने कहा कि सुषमा जी महिला सशक्तिकरण की सच्ची मिशाल थीं। मध्यमवर्गीय परिवार से आने के बावजूद उन्होंने अपने चरम को छुआ।
कार्यक्रम में पद्मभूषण मोहन लाल, पद्मश्री कुलदीप सिंह, भजन गायक अनूप जलोटा समेत साहित्यिक जगत के अनेक वरिष्ठ लोगों ने अपने विचार रखे। कार्यक्रम का संचालन प्रसिद्ध एंकर हरीश विरमानी ने किया।
