प्रह्लाद सबनानी
बैंकिंग सेवा के पूर्व अधिकारी
भारत में सनातन धर्म का गौरवशाली इतिहास विश्व में सबसे पुराना माना जाता है। कहते हैं कि लगभग 14,000 विक्रम सम्वत् पूर्व भगवान नील वराह ने अवतार लिया था। नील वराह काल के बाद आदि वराह काल और फिर श्वेत वराह काल हुए। इस काल में भगवान वराह ने धरती पर से जल को हटाया और उसे इंसानों के रहने लायक बनाया था। उसके बाद ब्रह्मा ने इंसानों की जाति का विस्तार किया और शिव ने सम्पूर्ण धरती पर धर्म और न्याय का राज्य क़ायम किया। सभ्यता की शुरुआत यहीं से मानी जाती है। सनातन धर्म की यह कहानी वराह कल्प से ही शुरू होती है। जबकि इससे पहले का इतिहास भी पुराणों में दर्ज है जिसे मुख्य 5 कल्पों के माध्यम से बताया गया है।
यदि भारत के इतने प्राचीन एवं महान सनातन धर्म के इतिहास पर नज़र डालें तो पता चलता है कि हिन्दू संस्कृति एवं सनातन वैदिक ज्ञान वैश्विक आधुनिक विज्ञान का आधार रहा है। इसे कई उदाहरणों के माध्यम से, हिन्दू मान्यताओं एवं धार्मिक ग्रंथों का हवाला देते हुए, समय समय पर सिद्ध किया जा चुका है। इस प्रकार के कुछ उदाहरण इस लेख में भी दिए जा रहे हैं। परंतु, हम लोग अपने ही सनातन धर्म की शिक्षाओं को भूल चुके हैं क्योंकि आधुनिक पश्चिमी समाज एवं उन्हीं के पीछे चलने वाले कुछ प्रचारकों ने सनातन धर्म की शिक्षाओं को पिछड़ा हुआ करार दे दिया था।
भारतीय गणित विज्ञान का इतिहास 400 ईसा पूर्व तक जाता है। प्राचीन हिंदू कृतियों में अंकों को दर्शाने के लिए शब्दों का इस्तेमाल किया जाता था। जैसे 2 को भुज कहा जाता था, क्योंकि मनुष्य की दो भुजाएं थीं, पर शब्दों से गणनाएं करना सम्भव नहीं था, अतः गणना की सरलता के लिए संस्कृत भाषा में अंकों को दर्शाने के लिए शब्दों के बजाए 9 चिन्हों से बदल दिया गया। आधुनिक काल की अंक प्रणाली इन्हीं 9 अंक चिन्हों पर आधारित है। विश्व में सभ्यता क्रांति के बाद व्यापार करने के लिए गणनाओं की आवश्यकता थी। इसलिए विश्व ऋणी है आर्यभट का जिन्होंने गणनाओं को सम्पूर्ण करने के लिए शून्य का आविष्कार किया। शून्य के बिना न तो कम्प्यूटर का आविष्कार सम्भव था और न ही आधुनिक काल का अंतरिक्ष विज्ञान। गणना करने की प्रणाली बिना शून्य के सम्भव नहीं थी और ये प्रणाली भारत से अरब व्यापारियों के जरिए पूरे विश्व में फैली।
खगोल विज्ञान के सम्बंध में प्राचीन भारतीयों का ज्ञान बहुत उन्नत था। 13वीं सदी का कोणार्क का सूर्य मंदिर इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है। मंदिर हिन्दू देवता सूर्य को समर्पित है और सूर्य रथ के रूप में बनाया गया है। रथ के सात घोड़े सात दिनों और 12 पहिए साल के बारह महीनों को इंगित करते हैं। आधुनिक कैलेंडर इन्हीं सिद्धांतों पर आधारित है।
भारत में धातु विज्ञान का इतिहास 3000 साल पुराना है। इसका प्रमाण भारत का एक समुदाय घडिया लोहार है। ये समुदाय राजस्थान से लेकर मध्य प्रदेश और हिमालय की तलहटी में निवास करता है। इनके लोहे से औज़ारों के निर्माण करने की कला में प्राचीन काल से लेकर अब तक कोई ज़्यादा फर्क नहीं आया है। 10वीं सदी में जब यूरोपीयनों और अरबों के बीच युद्ध हो रहा था तब यूरोपवासियों ने अपनी हार का कारण अरब योद्धाओं की उन्नत तलवार को बताया था जिसके लिए इस्पात बनाने की तकनीक प्राचीन भारत की ही थी।
प्राचीन भारत का चिकित्सा विज्ञान बहुत उन्नत था। कुष्ठ रोग का पहिला उल्लेख भारतीय चिकित्सा ग्रंथ सुश्रुत संहिता 6वीं शताब्दी ईसा पूर्व में वर्णित है। हालांकि, द ऑक्सफोर्ड इलस्ट्रेटेड कम्पेनियन टू मेडिसिन में कहा गया है कि कुष्ठ रोग का उल्लेख, साथ ही इसका उपचार, अथर्व-वेद (1500-1200 ईसा पूर्व) में वर्णित किया गया था। जो सुश्रुत संहिता से भी पहिले लिखा गया था। सुश्रुत ने मोतियाबिंद के आपरेशन और प्लास्टिक सर्जरी की पद्धति को सदियों पहिले विकसित कर लिया था। रॉयल आस्ट्रेलिया कॉलेज आफ सर्जन्स में लगी सुश्रुत की प्रतिमा शल्य चिकित्सा में उनके योगदान का प्रमाण है।
हिन्दू मान्यता के अनुसार इस पृथ्वी का निर्माण ब्रह्मा ने किया है और ब्रह्मा के सोने और जागने के क्रम से इस पृथ्वी का निर्माण हुआ। ब्रह्मा के एक बार जागने से सोने तक के समय को कल्प कहा जाता है और इस कल्प का समय 432 करोड़ साल माना जाता है। आधुनिक भू-वैज्ञानियों के अनुसार इस पृथ्वी की आयु भी लगभग इतनी ही है। भारतीय वैदिक ऋचाओं में इन कल्पों की विस्तृत गणना की गई है।
गणित विज्ञान, खगोल विज्ञान, धातु विज्ञान, चिकित्सा विज्ञान एवं पृथ्वी के जीवन सम्बंधी उपरोक्त कुछ उदाहरण मात्र दिए गए हैं जिससे सिद्ध होता है कि सनातन वैदिक ज्ञान कितना विकसित था, जिसके मूल का उपयोग कर आज के आधुनिक विज्ञान के नाम पर पश्चिमी देशों द्वारा वैश्विक स्तर पर फैलाया गया है। दरअसल, सैकड़ों सालों के आक्रमणों और गुलामी ने हमें सिर्फ राजनीतिक रूप से गुलाम ही नहीं बनाया बल्कि मानसिक रूप से भी हम गुलामी की जंजीरों में जकड़े गए। अंग्रेजों के शासन ने हमें हमारी ही संस्कृति के प्रति हीन भावना से भर दिया। जबकि हमारे ही ज्ञान का प्रयोग कर वे संसार भर में विजयी होते रहे और नाम कमाते रहे। अब जरूरत है कि हम अपनी इस सांस्कृतिक धरोहर को जाने और इस पर गर्व करना भी सीखें।
जैसा कि ऊपर वर्णन किया गया है कि सनातन धर्म विश्व में सबसे पुराना धर्म माना जाता है। सनातन धर्म को मानने वाले लोग पूरे विश्व के लगभग सभी भागों में फैले हुए हैं। हाल ही के समय में विश्व की कई महान हस्तियों ने अपने मूल धर्म को छोड़कर या तो सनातन धर्म को अपना लिया है अथवा सनातन धर्म के प्रति अपनी आस्था प्रकट की है। इनमें मुख्य रूप से शामिल हैं फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग, एप्पल के संस्थापक स्टीव जोब्स, हॉलीवुड फ़िल्म स्टार सिल्वेस्टर स्टलोन, रशेल ब्राण्ड, ह्यू जैकमेन, पोप स्टार मेडोना, मिली सायरस, हांगकांग के प्रसिद्ध कलाकार जैकी हंग, इंडोनेशिया की मुख्य न्यायाधीश इफा सुदेवी, जावा की राजकुमारी कंजेन रडेन महेंद्रानी, हॉलीवुड की जानीमानी एक्ट्रेस जूलिया राबर्ट्स तो एक फिल्म की शूटिंग के लिए भारत आईं थी। भारत में सनातन धर्म से इतना प्रभावित हुईं थीं कि बाद में उन्होंने सनातन धर्म को ही अपना लिया था। उक्त कुछ नाम केवल उदाहरण के तौर पर दिए गए हैं अन्यथा विश्व में सैकड़ों हस्तियों ने हाल ही में सनातन धर्म को अपना लिया है।
उक्त वर्णित उदाहरण से स्पष्ट तौर पर अब यह कहा जा सकता है कि आज भारत और भारतीयता को प्राथमिकता मिल रही है। भारतीय पद्धति से की गई खोज या नवोन्मेष को या भारतीय पद्धतियों को पूरे विश्व में मान्यता मिलने लगी है। ऐसा लगता है कि पूरी दुनिया पर्यावरण का मित्र बनकर मनुष्य और सृष्टि का एक साथ विकास साधने वाले भारतीय विचार के मूल तत्वों की ओर लौट रही है। अब तो पूरी दुनिया ही एक तरह से भारत की ओर आशा भारी नजरों से देख रही है।
पश्चिमी देशों में दरअसल विकास के लिए औद्योगिकीकरण पर बल दिया गया था और कहा जाता रहा है कि किसी भी कीमत पर विकास चाहिए। पश्चिमी राष्ट्रों में ऐसी मान्यता है कि यदि औद्योगिकीकरण नहीं होगा तो विकास भी नहीं होगा। लेकिन किसी भी कीमत पर विकास की चाहत ने प्रकृति को पूरी तरह से खतरे में डाल दिया है। औद्योगिकीकरण का समर्थन करने वाली विचारधारा में प्रकृति का आदर करने की जगह उसकी उपेक्षा का भाव निहित है। पश्चिमी देशों ने औद्योगिक विकास के नाम पर पर्यावरण पर प्रभुत्व स्थापित करने की कोशिश की। जिसका नतीजा पर्यावरण में हुए भारी नुक़सान के रूप में देखने को मिला है।
पश्चिमी देशों की उक्त विचारधारा के विपरीत भारतीय विचार परंपरा में प्रकृति को भगवान का दर्जा दिया गया है। हम तो ‘क्षिति जल पावक गगन समीरा’ को मानने वाले लोग हैं। हमारी परंपरा में तो नदी, पर्वत और जल को पूजे जाने की परंपरा रही है। भारत में आज भी परम्परा अनुसार किसी भी शुभ अवसर पर प्रकृति को भी याद किया जाता है।
भारतीय ज्ञान परंपरा में जिन औषधियों की चर्चा मिलती है, आज वो अचानक बेहद महत्वपूर्ण हो गई हैं। आज पूरी दुनिया में भारतीय खान-पान की आदतों को लेकर विमर्श हो रहा है। भारत में तो हर मौसम के हिसाब से भोजन तय है। मौसम तो छोड़िए, सूर्यास्त और सूर्योदय के बाद या पहले क्या खाना और क्या नहीं खाना ये भी बताया गया है।
आज पश्चिमी जीवन शैली के भोजन या भोजन पद्धति से इम्यूनिटी बढ़ने की बात समझ में नहीं आ रही है। आज भारतीय पद्धति से भोजन यानि ताजा खाने की वकालत की जा रही है, फ्रिज में रखे तीन दिन पुराने खाने को हानिकारक बताया जा रहा है। कोरोना काल में पूरी दुनिया भारतीय योग विद्या को आशा भरी नजरों से देख रही है। आज जब कोरोना का कोई ज्ञात ट्रीटमेंट नहीं है तो ऐसे में श्वसन प्रणाली को ठीक रखने, जीवन शैली को संतुलित रखने की बात हो रही है। भारत में तो इन चीजों की एक सुदीर्घ परंपरा रही है।
जब कोई संस्कृति और विचारधारा इतनी समृद्धशाली, विवेकशील होगी, उन्नत होगी, क्रांतिकारी होगी तो फिर उस संस्कृति और विचारधारा की स्वत: उन्नति होगी, स्वत: ग्रहण करने की प्रेरणा होगी। आज हम यह निश्चित तौर पर कह सकते हैं कि इन्ही विशेषताओं को लेकर दुनिया भर में सनातन धर्म के प्रति जागरूकता बढ़ी हैं, सनातन धर्म की विचारधारा को स्वीकार्य करने की क्रियाएं बढ़ी हैं। सनातन धर्म की विचारधारा को, आज जीवन की सुखमय प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए, एक प्रेरणा दृष्टि के तौर पर देखा जा रहा है और इसे विश्व में शांति और सदभावना स्थापित करने के लिए एक आवश्यक घटक माना जा रहा है। सनातन धर्म की यह निधि आगे भी बढ़ती ही जायेगी क्योंकि सनातन धर्म वैसे भी दुनिया की सबसे पुरानी जीवन शैली की शक्ति रहा है।
डॉ.नीलम महेंद्र
वरिष्ठ स्तंभकार
पश्चिम बंगाल में चुनावों की औपचारिक घोषणा के साथ ही राजनैतिक पारा भी उफान पर पहुँच गया है। देखा जाए तो चुनाव किसी भी लोकतंत्र की आत्मा होते हैं सैद्धांतिक रूप से तो चुनावों को लोकतंत्र का महापर्व कहा जाता है।और निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र की नींव को मजबूती प्रदान करते हैं।
लेकिन जब इन्हीं चुनावों के दौरान हिंसक घटनाएं सामने आती हैं जिनमें लोगों की जान तक दांव पर लग जाती हो तो प्रश्न केवल कानून व्यवस्था पर ही नहीं लगता बल्कि लोकतंत्र भी घायल होता है।
वैसे तो पश्चिम बंगाल में चुनावों के दौरान हिंसा का इतिहास काफी पुराना है। नेशनल क्राइम रेकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े इस बात को तथ्यात्मक तरीके से प्रमाणित भी करते हैं। इनके अनुसार 2016 में बंगाल में राजनैतिक हिंसा की 91 घटनाएं हुईं जिसमें 206 लोग इसके शिकार हुए। इससे पहले 2015 में राजनैतिक हिंसा की 131 घटनाएं दर्ज की गई जिनके शिकार 184 लोग हुए थे। वहीं गृहमंत्रालय के ताजा आंकड़ों की बात करें तो 2017 में बंगाल में 509 राजनैतिक हिंसा की घटनाएं हुईं थीं और 2018 में यह आंकड़ा 1035 तक पहुंच गया था।
इससे पहले 1997 में वामदल की सरकार के गृहमंत्री बुद्धदेब भट्टाचार्य ने बाकायदा विधानसभा में यह जानकारी दी थी कि वर्ष 1977 से 1996 तक पश्चिम बंगाल में 28,000 लोग राजनैतिक हिंसा में मारे गए थे। निसंदेह यह आंकड़े पश्चिम बंगाल की राजनीति का कुत्सित चेहरा प्रस्तुत करते हैं।
पंचायत चुनाव से लेकर लोकसभा चुनाव के दौरान पश्चिम बंगाल का रक्तरंजित इतिहास उसकी “शोनार बंगला” की छवि जो कि रबिन्द्रनाथ टैगोर और बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय जैसी महान विभूतियों की देन है उसे भी धूमिल कर रहा है।
बंगाल की राजनीति वर्तमान में शायद अपने इतिहास के सबसे दयनीय दौर से गुज़र रही है जहाँ वामदलों की रक्तरंजित राजनीति को उखाड़ कर एक स्वच्छ राजनीति की शुरुआत के नाम पर जो तृणमूल सत्ता में आई थी आज सत्ता बचाने के लिए खुद उस पर रक्तपिपासु राजनीति करने के आरोप लग रहे हैं।
हाल के लोकसभा चुनावों में भाजपा का वोट प्रतिशत बढ़ने के साथ ही राज्य में हिंसा के ये आंकड़े भी लगातार बढ़ते जा रहे हैं। चाहे वो भाजपा के विभिन्न रोड़ शो के दौरान हिंसा की घटनाएं हों या उनकी परिवर्तन यात्रा को रोकने की कोशिश हो या फिर जेपी नड्डा के काफिले पर पथराव हो।
यही कारण है कि चुनाव आयुक्त को कहना पड़ा कि बंगाल में जो परिस्थितियां बन रही हैं उससे यहाँ पर शांतिपूर्ण तरीके से चुनाव करना चुनाव आयोग के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि चुनाव आयोग इस बार 2019 के लोकसभा चुनावों की अपेक्षा 25 फीसदी अधिक सुरक्षा कर्मियों की तैनाती करने पर विचार कर रहा है।
लेकिन इस चुनावी मौसम में बंगाल के राजनैतिक परिदृश्य पर घोटालों के बादल भी उभरने लगे हैं जो कितना बरसेंगे यह तो वक्त ही बताएगा लेकिन वर्तमान में उनकी गर्जना तो देश भर में सुनाई दे रही है।
दरअसल, केंद्रीय जाँच ब्यूरो ने राज्य में कोयला चोरी और अवैध खनन के मामले में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे और टीएमसी सांसद अभिषेक बैनर्जी की पत्नी रुजीरा बैनर्जी और उनकी साली को पूछताछ के लिए नोटिस भेजा है।
इससे कुछ दिन पहले शारदा चिटफंड घोटाला जिसमें देश के पूर्व वित्तमंत्री चिदम्बरम और खुद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री पर आरोप लगे थे, इस मामले में सीबीआई ने दिसंबर 2020 में सुप्रीम कोर्ट में एक अवमानना याचिका दायर की थी। इसके अनुसार बंगाल के मुख्यमंत्री राहत कोष से तारा टीवी को नियमित रूप से 23 महीने तक भुगतान किया गया। कथित तौर पर यह राशि मीडिया कर्मियों के वेतन के भुगतान के लिए दी गई।
गौरतलब है कि जांच के दौरान तारा टीवी के शारदा ग्रुप ऑफ कम्पनीज का हिस्सा होने की बात सामने आई थी। सीबीआई का कहना है कि पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री राहत कोष से तारा टीवी कर्मचारी कल्याण संघ को कुल 6.21 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया था। इससे कुछ समय पहले या यूँ कहा जाए कि 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले भी इसी शारदा घोटाले की जाँच को लेकर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और केंद्र सरकार आमने सामने थीं।
वैसे भारत जैसे देश में घोटाले होना कोई नई बात नहीं हैं और ना ही चुनावी मौसम में घोटालों के पिटारे खुलना। ऐसे संयोग इस देश के आम आदमी ने पहले भी देखे हैं। चाहे वो रोबर्ट वाड्रा के जमीन और मनी लॉन्ड्रिंग घोटाले हों या फिर सोनिया गांधी और कांग्रेस नेताओं के नेशनल हेराल्ड जैसे केस हों या यूपी में अवैध खनन के मामले में अखिलेश यादव और या फिर स्मारक घोटाले में मायावती पर ईडी की कार्यवाही। अधिकाँश संयोग कुछ ऐसा ही बना कि चुनावी मौसम में ही ये सामने आते हैं और फिर पाँच साल के लिए लुप्त हो जाते हैं।
देश की राजनीति अब उस दौर से गुज़र रही है जब देश के आम आदमी को यह महसूस होने लगा है कि हिंसा और घोटाले चुनावी हथियार बनकर रह गए हैं और उसके पास इनमें से किसी का भी मुकाबला करने का सामर्थ्य नहीं है। क्योंकि जब तक तय समय सीमा के भीतर निष्पक्ष जांच के द्वारा इन घोटालों के बादलों पर से पर्दा नहीं उठाता, वो केवल चुनावों के दौरान विपक्षी दल की हिंसा के प्रतिउत्तर में गरजने के लिए सामने आते रहेंगे, बंगाल हो या बिहार या फिर कोई अन्य राज्य।
अगर बंगाल की ही बात करें तो एक तरफ चुनावों के पहले सामने आने वाले घोटालों से राज्य की मुख्यमंत्री और उनका कुनबा सवालों के घेरे में है। वहीं दूसरी तरफ जैसे जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं वहाँ सत्तारूढ़ दल द्वारा सत्ता बचाने और भाजपा द्वारा सत्ता हासिल करने के उद्देश्य से दोनों दलों के बीच होने वाली राजनैतिक हिंसा के मामले भी बढ़ते जा रहे हैं।
लेकिन सत्ता बचाने और हासिल करने की इस उठापटक के बीच राजनैतिक दलों को यह समझ लेना चाहिए कि आज का वोटर इतना नासमझ भी नहीं है जो इन घोटालों और हिंसा के बीच की रेखाओं को ना पढ़ सके। खास तौर पर तब जब इन परिस्थितियों में चुनावों के दौरान बोले जाने वाले “आर नोई अन्याय” (और नहीं अन्याय) या फिर “कृष्ण कृष्ण हरे हरे, पद्म (कमल) फूल खिले घरे घरे”, या बांग्ला “निजेर मेयकेई चाए” ( बंगाल अपनी बेटी को चाहता है) जैसे शब्द कभी “नारों” की दहलीज पार करके यथार्थ में परिवर्तित नहीं होते। इसलिए “लोकतंत्र” तो सही मायनों में तभी मजबूत होगा जब चुनावी मौसम में घोटाले सिर्फ सामने ही नहीं आएंगे बल्कि उसके असली दोषी सज़ा भी पाएंगे।
- प्रह्लाद सबनानी
आर्थिक मामलों के जानकार और बैंकिंग सेवा के पूर्व अधिकारी
भारत के नियंत्रक और लेखा महानिरीक्षक (कैग) की रिपोर्ट के अनुसार, सरकारी योजनाएं प्रतिदिन प्रति व्यक्ति चार बाल्टी स्वच्छ जल उपलब्ध कराने के निर्धारित लक्ष्य का आधा भी आपूर्ति करने में सफल नहीं हो पायी हैं। आजादी के 70 वर्षों के पश्चात, देश की आबादी के एक बड़े भाग के घरों में पीने के लिए स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं है। साथ ही, वाटर एड नामक संस्था द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, पूरे विश्व में पानी की कमी से जूझती सबसे अधिक आबादी भारत वर्ष में ही है, जो वर्ष भर के किसी न किसी समय पर, पानी की कमी से जूझती नजर आती है।
आइए निम्न लिखित कुछ अन्य आंकड़ों पर भी जरा एक नजर डालें, जो देश में जल की कमी के बारे में कैसी भयावह स्थिति दर्शाते हैं –
- पिछले 70 सालों में देश में 20 लाख कुएं, पोखर एवं झीलें ख़त्म हो चुके हैं।
- पिछले 10 सालों में देश की 30 प्रतिशत नदियां सूख गई हैं।
- देश के 54 प्रतिशत हिस्से का भूजल स्तर तेज़ी से गिर रहा है।
- नई दिल्ली सहित देश के 21 शहरों में पानी ख़त्म होने की कगार पर है।
- पिछले वर्ष, देश के कुल 91 जलाशयों में से 62 जलाशयों में 80 प्रतिशत अथवा इससे कम पानी बच गया था। किसी भी जलाशय में यदि लम्बी अवधि औसत के 90 प्रतिशत से कम पानी रह जाता है तो इस जलाशय को पानी की कमी वाले जलाशय में शामिल कर लिया जाता है, एवं यहां से पानी की निकासी कम कर दी जाती है।
- एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2030 तक देश के 40 प्रतिशत लोगों को पानी नहीं मिल पाएगा। देश में प्रतिवर्ष औसतन 110 सेंटी मीटर बारिश होती है और बारिश के केवल 8 प्रतिशत पानी का ही संचय हो पाता है। बाकी 92 प्रतिशत पानी बेकार चला जाता है। अतः देश में, शहरी एवं ग्रामीण इलाक़ों में, भूजल का उपयोग कर पानी की पूर्ति की जा रही है। भूजल का उपयोग इतनी बेदर्दी से किया जा रहा है की आज देश के कई भागों में हालात इतने खराब हो चुके हैं कि 500 फ़ुट तक जमीन खोदने के बाद भी जमीन से पानी नहीं निकल पा रहा है। एक अंतरराष्ट्रीय संस्था द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार, पूरे विश्व में उपयोग किए जा रहे भूजल का 24 प्रतिशत हिस्सा केवल भारत में ही उपयोग हो रहा है। यह अमेरिका एवं चीन दोनों देशों द्वारा मिलाकर उपयोग किए जा रहे भूजल से भी अधिक है। इसी कारण से भारत के भूजल स्तर में तेज़ी से कमी आ रही है।
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल में देश में पानी की कमी की उपरोक्त वर्णित भयावह स्थिति को देखते हुए तथा इस स्थिति से निपटने के लिए कमर कस ली है और इसके लिए एक नए जल शक्ति मंत्रालय का गठन किया गया है। साथ ही, भारतवर्ष में जल शक्ति अभियान की शुरुआत दिनांक 1 जुलाई 2019 से की जा चुकी है। यह अभियान देश में स्वच्छ भारत अभियान की तर्ज़ पर जन भागीदारी के साथ चलाया जा रहा है।
जल शक्ति अभियान की शुरुआत दो चरणों में की गई है। इस अभियान के अंतर्गत बारिश के पानी का संग्रहण, जल संरक्षण एवं पानी का प्रबंधन आदि कार्यों पर ध्यान दिया जा रहा है। पहले चरण में बरसात के पानी का संग्रहण करने हेतु प्रयास किए गए थे। इस हेतु देश के उन 256 जिलों पर फ़ोकस किया गया था, जहां स्थिति अत्यंत गंभीर एवं भयावह थी। इन जिलों में स्थानीय स्तर पर आवश्यकता अनुरूप कई कार्यक्रमों को लागू कर भूजल स्तर में वृद्धि करने हेतु प्रयास किया जा रहा है। पानी के संचय हेतु विभिन्न संरचनाएं यथा तालाब, चेकडेम, रोबियन स्ट्रक्चर, स्टॉप डेम, पेरकोलेशन टैंक जमीन के ऊपर या नीचे बड़ी मात्रा में बनाए जा रहे हैं।
देश में प्रति वर्ष पानी के कुल उपयोग का 89 प्रतिशत हिस्सा कृषि की सिंचाई के लिए खर्च होता है, 9 प्रतिशत हिस्सा घरेलू कामों में तथा शेष 2 प्रतिशत हिस्सा उद्योगों द्वारा खर्च किया जाता है। देश में हर घर में खर्च होने वाले पानी का 75 प्रतिशत हिस्सा बाथरूम में खर्च होता है। इस लिहाज से देश के ग्रामीण इलाक़ों में पानी के संचय की आज आवश्यकता अधिक है। क्योंकि ग्रामीण इलाक़ों में हमारी माताएं एवं बहनें तो कई इलाक़ों में 2-3 किलोमीटर पैदल चल कर केवल एक घड़ा भर पानी लाती देखी जाती हैं। अतः खेत में उपयोग होने हेतु पानी का संचय खेत में ही किया जाना चाहिए एवं गांव में उपयोग होने हेतु पानी का संचय गांव में ही किया जाना चाहिए।
जल के संचय एवं जल के नियंत्रित उपयोग के लिए उपाय किए जाने जरुरी हैं। देश की खाद्य सुरक्षा को प्रभावित किए बिना सिंचाई स्तर पर पानी के उपयोग को नियंत्रित करना, सबसे महत्वपूर्ण सुझाव हो सकता है। क्योंकि, यह 85 प्रतिशत भूजल का उपयोग करता है। ड्रिप एवं स्प्रिंक्लर तकनीक को प्रभावी ढंग से लागू करके प्रति एकड़ सिंचाई के लिए पानी की खपत में 40 प्रतिशत तक की कमी की जा सकती है। सरकार द्वारा किसानों के लिए घरेलू स्तर पर निर्मित एवं ड्रिप तथा स्प्रिंक्लर जैसे कुशल पानी के उपयोग वाले उत्पादों और सेंसर-टैप एक्सेसरीज़, आटोमेटिक मोटर कंट्रोलर आदि उत्पादों पर सब्सिडी देकर इस तरह के उत्पादों के उपयोग को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
ऐसी फ़सलें, जिन्हें लेने में पानी की अधिक आवश्यकता पड़ती है, जैसे, गन्ने एवं अंगूर की खेती, आदि फ़सलों को पानी की कमी वाले इलाक़ों में धीरे-धीरे कम करते जाना चाहिए। अथवा, इस प्रकार की फ़सलों को देश के उन भागों में स्थानांतरित कर देना चाहिए जहां हर वर्ष अधिक वर्षा के कारण बाढ़ की स्थिति निर्मित हो जाती है।
भूजल के अत्यधिक बेदर्दी से उपयोग पर भी रोक लगायी जानी चाहिए ताकि भूजल के तेज़ी से कम हो रहे भंडारण को बनाए रखा जा सके। देश की विभिन्न नदियों को जोड़ने के प्रयास भी प्रारम्भ किए जाने चाहिए जिससे देश के एक भाग में बाढ़ एवं दूसरे भाग में सूखे की स्थिति से भी निपटा जा सके। विभिन्न स्तरों पर पाइप लाइन में रिसाव से बहुत सारे पानी का अपव्यय हो जाता है, इस तरह के रिसाव को रोकने हेतु भी सरकार को गम्भीर प्रयास करने चाहिए। देश में लोगों को पानी का मूल्य नहीं पता है, वे समझते हैं जैसे पानी आसानी से उपलब्ध है। लोगों में पानी के प्रति जागरूकता लाने के उद्देश्य से सरकार को 24 घंटे 7 दिन की पानी की आपूर्ति के बजाय, एक निश्चित किए गए समय पर, रिसाव-प्रूफ़ और सुरक्षित पानी की आपूर्ति सुनिश्चित करनी चाहिए।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम घर में कई छोटे छोटे कार्यों पर ध्यान देकर भी पानी की भारी बचत करें। एक अनुमान के अनुसार, छोटे छोटे कार्यों पर ध्यान देकर प्रति परिवार प्रतिदिन 300 लीटर से अधिक पानी की बचत की जा सकती है। राष्ट्रीय स्तर पर जल साक्षरता पर ध्यान दिया जाय। प्राथमिक शिक्षा स्तर पर पानी की बचत एवं संरक्षण, आदि विषयों पर विशेष अध्याय जोड़े जाने चाहिए।
केंद्र एवं विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा तो पानी की कमी से जूझने हेतु कई प्रयास किए जा रहे हैं। परंतु, इस कार्य हेतु जन भागीदारी की आज अधिक आवश्यकता है। अब समय आ गया है कि सामाजिक संस्थाएं भी आगे आएं एवं जल संग्रहण एवं जल प्रबंधन हेतु समाज में लोगों को जागरूक करना प्रारम्भ करें। शहरी एवं ग्रामीण इलाक़ों में इस सम्बंध में अलख जगाने की आज महती आवश्यकता है। तभी हम अपनी आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए उनकी आवश्यकता पूर्ति हेतु जल छोड़कर जा पाएंगे अन्यथा तो हमारे स्वयं के जीवन में ही जल की उपलब्धता शून्य की स्थिति पर पहुंच जाने वाली है।
डिस्क्लेमर : आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। हिम दूत का इन विचारों से सहमत होना आवश्यक नहीं है।
प्रहलाद सबनानी
आर्थिक मामलों के जानकार और बैंकिंग सेवा के पूर्व अधिकारी
एक अनुमान के अनुसार, देश में वर्ष 2050 तक शहरों की आबादी 80 करोड़ का आंकड़ा पार कर जाएगी। यानी, उस समय की देश की कुल आबादी के 50 प्रतिशत से अधिक और आज की शहरी आबादी से लगभग दुगुनी यथा भारत एक शहरी देश के तौर पर उभर कर सामने आ जाएगा। 2011 की जनगणना के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, भारत में 53 ऐसे शहर हैं जिनकी आबादी 10 लाख की संख्या से अधिक है।
शहरीकरण के एक सबसे बड़े फ़ायदे के तौर पर, यह कई अनुसंधानों के माध्यम से सिद्ध हो चुका है कि, देश में बढ़ते शहरीकरण से आर्थिक विकास की दर तेज़ होती है एवं रोज़गार के नए अवसर भी गांवों की अपेक्षा शहरों में अधिक उत्पन्न होते हैं। आज भारत में भी देश के सकल घरेलू उत्पाद में शहरी क्षेत्र का योगदान 65 प्रतिशत का है, जिसे बढ़ाकर 75 प्रतिशत तक ले जाना है। बढ़ते शहरीकरण से विभिन्न स्तरों पर सरकारों की ज़िम्मेदारी भी बढ़ती है, क्योंकि साफ हवा, पीने का पानी, ऊर्जा, इन शहरों को उपलब्ध कराना सरकारों की ज़िम्मेदारी है।
शहरों का विकास शुरू में ही यदि उचित तरीक़े से नहीं किया जाए तो पर्यावरण से सम्बंधित कई समस्याएं खड़ी हो जाती हैं। जैसे भारत के कई शहरों में आज देखने में आ रहा है कि सर्दियों के मौसम में शुद्ध हवा का अभाव हो जाता है। कोहरा इतना घना होने लगता है कि लगभग 50 फ़ुट दूर तक भी साफ़ दिखाई देना मुश्किल हो जाता है। शहरों की कई कालोनियों में साफ़ पीने का पानी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं है। अतः शहरों का विकास इस प्रकार से किया जाना चाहिए कि भविष्य में पर्यावरण से सम्बंधित किसी भी प्रकार की समस्या खड़ी न हो सके।
हाल ही के वर्षों में इस ओर ध्यान दिया गया है। स्वच्छ भारत मिशन एवं राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन जैसे कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, जिसके अंतर्गत, नागरिकों के सहयोग से शहरों में स्वच्छता बनाए रखे जाने का प्रयास किया जा रहा है। शहरों में झुग्गी झोपड़ी की समस्या हल करने के उद्देश्य से हर परिवार को वर्ष 2022 तक एक पक्का मकान उपलब्ध कराये जाने का प्रयास किया जा रहा है। इस हेतु शहरी इलाक़ों में एक करोड़ नए मकान बनाये जा रहे हैं।
देश में 100 स्मार्ट शहरों का विकास किया जा रहा है। इन स्मार्ट शहरों के स्थानीय निवासियों को अपने शहर के विकास की योजना बनाने को कहा गया है। साइकल एवं पैदल चलने के लिए अलग से मार्गों को बनाया जा रहा है। इन शहरों में पब्लिक वाहनों का अधिक से अधिक प्रयोग किये जाने पर बल दिया जा रहा है। उद्योगों को इन शहरों की सीमाओं से बाहर बसाया जा रहा है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि इन शहरों का समावेशी एवं मिश्रित विकास किया जा रहा है।
देश में 500 किलोमीटर से अधिक मेट्रो की लाइन भी स्थापित चुकी है और इसका तेज़ी से विकास जारी है। महानगरों में यातायात पर दबाव कम करने के उद्देश्य से कई नए नए बाई पास भी बनाए जा रहे हैं। महानगरों के 200 किलोमीटर के आस पास के क्षेत्रों में लोगों को बसाए जाने पर भी विचार किया जा रहा है एवं उनके लिए द्रुत गति से चलने वाले यातायात की व्यवस्था भी की जाएगी। ताकि, ये लोग इन इलाक़ों में निवास कर सकें एवं आसानी से महानगरों में आवागमन कर सकें। परिवहन उन्मुख विकास योजना के अंतर्गत क्षेत्रीय त्वरित यातायात के क्षेत्र में पड़ने वाले क्षेत्र में लंबवत एवं मिश्रित विकास किया जाना चाहिए ताकि इस क्षेत्र में रहने वाले लोगों को सारी सुविधाएं इनके घरों के आसपास ही मिलें और इन सुविधाओं को पाने के लिए उन्हें घर से कहीं दूर जाना न पड़े।
देश के शहरी क्षेत्रों में पर्यावरण की स्थिति में सुधार करने हेतु वर्षा के पानी का संचयन करना, ऊर्जा की दक्षता – एलईडी बल्बों का अधिक से अधिक उपयोग करना, शहरों में हरियाली का अधिक से अधिक विस्तार करना, ध्वनि प्रदूषण कम करना, सॉलिड वेस्ट प्रबंधन को बढ़ावा देना, ग्रीन यातायात का उपयोग करना, आदि क्षेत्रों में अभी और अधिक प्रयास किए जाने की आवश्यकता है।
उक्त क्षेत्रों में तीव्र गति से सुधार करने हेतु हर मकान के लिए बारिश के पानी के संचयन को आवश्यक कर देना चाहिए ताकि भूमि के पानी को रीचार्ज किया जा सके। अक्षय ऊर्जा के उपयोग को भी आवश्यक किया जाना चाहिए और घर में सोलर ऊर्जा के उत्पादन प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। विद्युत ऊर्जा से चालित वाहनों के उपयोग को बढ़ावा देने की नीति बननी चाहिए। हर घर में ग्रीन बेल्ट होनी चाहिए। घरों के अंदर एवं आस पास पौधे लगाए जाने आवश्यक कर देना चाहिए। मकानों के निर्माण में लंबवत विकास होना चाहिए ताकि शहर में हरियाली हेतु अधिक ज़मीन उपलब्ध हो सके। देश में ख़ाली पड़ी पूरी ज़मीन को ग्रीन बेल्ट में बदल देना चाहिए। आज तो पेड़ों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित करने की तकनीक भी उपलब्ध है। अतः पेड़ों को काटने के बजाय एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित किया जाना चाहिए।
साथ ही, पर्यावरण को बचाने के उद्देश्य से प्लास्टिक के उपयोग को सीमित करने के लिए हमें कुछ आदतें अपने आप में विकसित करनी होंगी। यथा, जब भी हम सब्ज़ी एवं किराने का सामान आदि ख़रीदने हेतु जाएं तो कपड़े के थैलों का इस्तेमाल करें। हम घर में कई छोटे-छोटे कार्यों पर ध्यान देकर पानी की भारी बचत कर सकते हैं। जैसे, टॉइलेट में फ़्लश की जगह पर बालटी में पानी का इस्तेमाल करें, दातों पर ब्रश करते समय सीधे नल से पानी लेने के बजाय, एक डब्बे में पानी भरकर ब्रश करें, स्नान करते समय शॉवर का इस्तेमाल न करके, बालटी में पानी भरकर स्नान करें।
अपशिष्ट एवं बेकार पड़ी चीज़ों को रीसाइकल कैसे करें ताकि इसे देश के लिए सम्पत्ति में परिवर्तित किया जा सके। इस विषय की और अब हम सभी को गहन ध्यान देने की ज़रूरत है। प्लास्टिक, कपड़ा, अल्यूमिनीयम, स्टील आदि सभी को रीसाइकल किया जा सकता है। कचरा एवं प्लास्टिक को तो शीघ्र ही रीसाइकल करना होगा क्योंकि देश के पर्यावरण पर इन दोनों घटकों का अत्यधिक बुरा प्रभाव पड़ रहा है।
प्रति व्यक्ति देश में प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग अन्य देशों की तुलना में आज बहुत कम है। जबकि देश में और अधिक शहरीकरण होने के चलते प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग अभी तो और आगे बढ़ेगा। अतः वर्तमान संसाधनों की दक्षता को भी बढ़ाना ही होगा एवं इनका रीसाइकल एवं पुनः उपयोग भी करना होगा। प्रयास यह हो कि शहरीकरण और पर्यावरण में संतुलन क़ायम हो सके।
डॉ. नीलम महेंद्र
वरिष्ठ स्तंभकार
आज सोशल मीडिया अपनी बात मजबूती के साथ रखने का एक शक्तिशाली माध्यम मात्र नहीं रह गया है, बल्कि यह एक शक्तिशाली हथियार का रूप भी ले चुका है। देश में चलने वाला किसान आंदोलन इस बात का सशक्त प्रमाण है। दरअसल, सिंघु बॉर्डर और गाजीपुर बॉर्डर पर पिछले दो माह से भी अधिक समय से चल रहा किसान आंदोलन भले ही 26 जनवरी के बाद से दिल्ली की सीमाओं में प्रवेश नहीं कर पा रहा हो, लेकिन ट्विटर पर अपने प्रवेश के साथ ही उसने अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को पार कर लिया। वैसे होना तो यह चाहिए था कि बीतते समय और इस आंदोलन को लगातार बढ़ते हुए अंतरराष्ट्रीय मंचों की उपलब्धता के साथ आंदोलनरत किसानों के प्रति देश भर में सहानुभूति की लहर उठती और देश का आम जन सरकार के खिलाफ खड़ा हो जाता। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। बल्कि इसी साल की जनवरी में एक अमेरिकी डाटा फर्म की सर्वे रिपोर्ट सामने आई, जिसमें प्रधानमंत्री मोदी को भारत ही नहीं विश्व का सबसे लोकप्रिय और स्वीकार्य राजनेता माना गया। इस सर्वे में अमरीका, फ्रांस, ब्राज़ील, जापान सहित दुनिया के 13 लोकतांत्रिक देशों को शामिल किया गया था। जिसमें 75 फीसदी लोगों ने प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व पर भरोसा जताया है।
लेकिन यहां प्रश्न प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता का नहीं है, बल्कि किसान आंदोलन की विश्वसनीयता और देश के आम जनमानस के ह्रदय में उसके प्रति सहानुभूति का है। क्योंकि देखा जाए तो 26 जनवरी की हिंसा के बाद से किसान आंदोलन ने अपनी प्रासंगिकता ही खो दी थी और किसान नेताओं सहित इस पूरे आंदोलन पर ही प्रश्नचिन्ह लगने शुरू हो गए थे। क्योंकि जब 26 जनवरी को देश ने दिल्ली पुलिस के जवानों पर आंदोलनकारियों का हिंसक आक्रमण देखा तो इस आंदोलन ने देश की सहानुभूति भी खो दी। दरअसल, लोग इस बात को बहुत अच्छे से समझते हैं कि देश का किसान जो इस देश की मिट्टी को अपने पसीने से सींचता है वो देश के उस जवान पर कभी प्रहार नहीं कर सकता जो देश की आन को अपने खून से सींचता है। शायद यही कारण है कि जो सहानुभूति इस आंदोलन के लिए “आंदोलनजीवी” नहीं खोज पाए, उस सहानुभूति को उनके द्वारा अब विदेश से प्रायोजित करवाने के प्रयास किए जा रहे हैं। जिसमें ट्विटर जैसी माइक्रोब्लॉगिंग साइट और अन्य विदेशी मंचों का सहारा लिया जाता है। आइए कुछ घटनाक्रमों पर नज़र डालते हैं –
कुछ तथाकथित अंतरराष्ट्रीय सेलेब्रिटीज़ द्वारा किसान आंदोलन के समर्थन में उनके द्वारा किए गए ट्वीट के बदले में उन्हें 2.5 मिलियन डॉलर दिए जाने की खबरें सामने आती हैं। इन तथाकथित सेलेब्रिटीज़ में एक 18 साल की लड़की है और दो ऐसी महिलाएं हैं जो स्वयं अपने बारे में भी एक महिला की भौतिक देह से ऊपर उठ कर नहीं सोच पातीं। जब ऐसी महिलाएं किसान आंदोलन पर ट्वीट करके चिंता व्यक्त करती हैं तो कहने को कम और समझने के लिए ज्यादा हो जाता है। इतना ही नहीं कथित पर्यावरणविद ग्रेटा थनबर्ग द्वारा पहले किसान आंदोलन से संबंधित टूलकिट को शेयर किया जाता है और फिर हटा लिया जाता है जो अपने आप में कई गंभीर सवालों को खड़ा कर देता है।
किसान आंदोलन को लेकर ट्विटर की भूमिका संदेह के घेरे। भ्रामक एवं हिंसा भड़काने वाली जानकारी फैलाने वालों के खिलाफ सरकार के कहने के बाद भी ट्विटर उन पर आसानी से कार्रवाई को राजी नहीं हुआ। हाल ही में अमेरिका की लोकप्रिय सुपर बाउल लीग के दौरान भी किसान आंदोलन से जुड़ा विज्ञापन चलाया जाता है, जिसमें इसे ”इतिहास का सबसे बड़ा प्रदर्शन” बताया जाता है। इस बीच लेबर पार्टी के सांसद तनमजीत सिंह धेसी के नेतृत्व में 40 ब्रिटिश सांसदों द्वारा किसान आंदोलन के मुद्दे को ब्रिटेन की संसद में उठाकर भारत पर दबाव बनाने का प्रयास किया जाता है। लेकिन ब्रिटेन की सरकार इसे भारत का अंदरूनी मामला बताकर खारिज कर देती है।
जाहिर है इन तथ्यों से देश में फॉरेन डिस्ट्रक्टिव आइडियोलॉजी का प्रवेश तथा आन्दोलनजीवियों के हस्तक्षेप से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन किसान आंदोलन के पीछे चल रही इस राजनीति के बीच जब देश के कृषि मंत्री देश की संसद में यह खुलासा करते हैं कि पंजाब में जो कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग एक्ट बना है, उसमें करार तोड़ने पर किसान पर न्यूनतम पांच हजार रुपये जुर्माना जिसे पांच लाख तक बढ़ाया जा सकता है, इसका प्रावधान है। जबकि केंद्र द्वारा लागू कृषि कानूनों में किसान को सजा का प्रावधान नहीं है तो कांग्रेस का दोहरा चरित्र देश के सामने रखते हैं। क्योंकि पंजाब में फार्मिंग कॉन्ट्रैक्ट का यह कानून 2013 में बादल सरकार ने पारित किया था।
हैरत की बात है कि पंजाब की वर्तमान कांग्रेस सरकार ने केंद्र के कृषि क़ानूनों के विरोध में तो प्रस्ताव पारित कर दिया। लेकिन पहले से जो फार्मिंग कॉन्ट्रैक्ट कानून पंजाब में लागू था, जिसमें किसानों के लिए भी सजा का प्रावधान था उसे रद्द करने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया। इस प्रकार मूलभूत तथ्यों को दरकिनार करते हुए जब किसानों के हितों के नाम विपक्ष द्वारा की जाने वाली राजनीति देश विरोधी गतिविधियों को बढ़ावा देती हैं तो तात्कालिक लाभ तो दूर की बात है, इस प्रकार के कदम यह बताते हैं कि विपक्ष में दूरदर्शी सोच का भी अभाव है। काश कि वो यह समझ पाते कि इस प्रकार के आचरण से कहीं उनकी भावी स्वीकार्यता भी समाप्त न हो जाए।
सुखदेव वशिष्ठ
वरिष्ठ पत्रकार
किसान आंदोलन को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को घेरने और देश के बढ़ते यश को कम करने के लिए बनाई गई रणनीति का खुलासा हो गया। दरअसल, बुधवार को स्वीडन की क्लाइमेट चेंज एक्टिविस्ट ग्रेटा थनबर्ग ने एक टूलकिट (गूगल फॉर्म) को ट्वीट किया था। जिसमें किसान आंदोलन को लेकर मोदी सरकार को घेरने और भारत को बदनाम करने को रची गई साजिश की जानकारी थी। ग्रेटा ने बवाल बढ़ता देख इस ट्वीट को तुरंत डिलीट भी कर दिया। हालांकि, बाद में उन्होंने दूसरा ट्वीट कर नए टूलकिट को शेयर किया। जिसमें कुछ संस्थानों, व पत्रकारों के नाम गायब थे। किसान आंदोलन के समर्थन में पॉप स्टार रिहाना का ट्वीट वायरल होने के बाद से ही आंदोलन को लेकर सोशल मीडिया पर सक्रियता बढ़ गई थी, जो ग्रेटा के ट्वीट के बाद और बढ़ी।
विदेश मंत्रालय ने इसे लेकर एक बयान जारी किया। जिसमें स्पष्ट कहा कि ऐसे मामलों पर कॉमेंट करने से पहले मुद्दे को अच्छी तरह से समझ लिया जाए। सनसनी के लालच में सोशल मीडिया चल रहे हैशटैग्स और कॉमेंट्स, खासकर जिन्हें सेलिब्रिटी कर रहे हैं, ना तो वे सही हैं और न ही जिम्मेदारी भरे हैं।
विदेश मंत्रालय की तरफ से दिये गए बयान के बाद बॉलीवुड के सुपरस्टार अक्षय कुमार और अजय देवगन सहित बॉलीवुड व देश की नामचीन हस्तियों, खिलाड़ियों ने कृषि बिल पर सरकार के पक्ष का समर्थन किया. और सोशल मीडिया पर इंडिया टुगेदर और इंडिया अगेंस्ट प्रोपेगेंडा हैशटैग ट्रेड करने लगे.
दिल्ली पुलिस ने कहा कि एक खास सोशल मीडिया अकाउंट से एक डॉक्यूमेंट/’टूल किट अपलोड किया गया था। यह टूल किट खालिस्तान से जुड़े एक संगठन ‘पोएटिक जस्टिस’ का है।’ स्पेशल कमिश्नर के अनुसार, ‘एक सोशल मीडिया हैंडल से अपलोड किए गए टूल किट में किसान आंदोलन के नाम पर डिजिटल स्ट्राइक की बात कही गई है। 26 जनवरी को फिजिकल ऐक्शन, ट्वीट स्टॉर्म की बात कही गई है। 26 जनवरी और उसके आसपास के हिंसा को देखें तो इससे पता चलता है कि पूरे प्लान तरीके से इसी के अनुसार सब कुछ किया गया है। यह दिल्ली पुलिस के लिए चिंता की बात है। ‘
इस टूलकिट या टेररकिट के लिंक पर क्लिक करके अंदर जाने पर किसान आंदोलन से जुड़ी कई सामग्री मिलती है। साथ में पेज नंबर तीन पर वेबसाइट का लिंक www.askindiawhy मिलता है। इस वेबसाइट के आखिरी पेज पर एक लिंक मिलता है ‘पोएटिक जस्टिस फाउंडडेशन’। संस्था के इंस्टाग्राम पेज से पता चलता है कि यह संस्था पॉप सिंगर रिहाना और ग्रेटा थनबर्ग को फंड करती है।
बता दें कि फाउंडेशन को चलाने वाले एम ओ धालीवाल और सिक्ख फॉर जस्टिस के मुख्य संरक्षक गुरपतवंत सिंह पन्नु का सिक्ख फॉर जस्टिस एक खालिस्तानी संगठन है और भारत में इस पर प्रतिबंध है। साथ ही इस पन्नु को भी यूएपीए के तहत आतंकी घोषित किया गया है।
खालिस्तान के विफल प्रयोग को कुछ लोग अभी भी उनके निजी हितों के कारण ढो रहे हैं, जबकि पंजाब का युवा इस सबसे दूर वैश्वीकरण के दौर में पूरे विश्व से अपनी प्रतिभा के बल पर सबसे आगे चलना चाहता है। भारत एक परिपक्व लोकतांत्रिक देश है, भारत की समझदार जनता ने पूर्ण बहुमत से राष्ट्र को आगे लेकर जाने के लिए कुशल नेतृत्व को अपनी बागडोर सौंपी है। भारत कैसा हो, भारत को कैसा चलाया जाना है, भारत का विकास किस प्रकार किया जाए, इसके जिम्मेदारी भारतीय समाज की है। विदेशों से हस्तक्षेप करने वाले लोग अपने देश की रंगभेदी, नस्लभेदी नीतियों के बारे में विषय रखें तो अच्छा रहेगा. क्लाइमेट चेंज के बारे में बात करने वाले भारत के कृषि और उसका पर्यावरण पर प्रभाव इस विषय का भी अध्ययन करें तो अच्छा रहेगा।
किसान आंदोलन की आड़ में छिपी विदेशी ताकतों के प्रयोग का सावधानीपूर्ण सामना करना होगा। सरकार द्वारा असली किसानों के प्रति धैर्य और स्नेह के भाव से आंदोलन को गलत दिशा में ले जाने वाली विदेशी ताकतों के चेहरे बेनकाब होते जा रहे हैं। (विसंकें)
स्वतंत्रता आंदोलन के दिनों में जिनकी एक पुकार पर हजारों महिलाओं ने अपने कीमती गहने अर्पित कर दिये, जिनके आह्नान पर हजारों युवक और युवतियाँ आजाद हिन्द फौज में भर्ती हो गये, उन नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का जन्म उड़ीसा की राजधानी कटक के एक मध्यमवर्गीय परिवार में 23 जनवरी, 1897 को हुआ था।
सुभाष के अंग्रेज भक्त पिता रायबहादुर जानकीनाथ चाहते थे कि वह अंग्रेजी आचार-विचार और शिक्षा को अपनाएँ। विदेश में जाकर पढ़ें तथा आई.सी.एस. बनकर अपने कुल का नाम रोशन करें; पर सुभाष की माता प्रभावती हिन्दुत्व और देश से प्रेम करने वाली महिला थीं। वे उन्हें 1857 के संग्राम तथा विवेकानन्द जैसे महापुरुषों की कहानियाँ सुनाती थीं। इससे सुभाष के मन में भी देश के लिए कुछ करने की भावना प्रबल हो उठी।
सुभाष ने कटक और कोलकाता से विभिन्न परीक्षाएँ उत्तीर्ण कीं। फिर पिताजी के आग्रह पर वे आई.सी.एस की पढ़ाई करने के लिए इंग्लैंड चले गये। अपनी योग्यता और परिश्रम से उन्होंने लिखित परीक्षा में पूरे विश्वविद्यालय में चतुर्थ स्थान प्राप्त किया; पर उनके मन में ब्रिटिश शासन की सेवा करने की इच्छा नहीं थी। वे अध्यापक या पत्रकार बनना चाहते थे। बंगाल के स्वतन्त्रता सेनानी देशबन्धु चितरंजन दास से उनका पत्र-व्यवहार होता रहता था। उनके आग्रह पर वे भारत आकर कांग्रेस में शामिल हो गये।
कांग्रेस में उन दिनों गांधी जी और नेहरू जी की तूती बोल रही थी। उनके निर्देश पर सुभाष बाबू ने अनेक आन्दोलनों में भाग लिया और 12 बार जेल-यात्रा की। 1938 में गुजरात के हरिपुरा में हुए राष्ट्रीय अधिवेशन में वे कांग्रेस के अध्यक्ष बनाये गये; पर फिर उनके गांधी जी से कुछ मतभेद हो गये। गांधी जी चाहते थे कि प्रेम और अहिंसा से आजादी का आन्दोलन चलाया जाये; पर सुभाष बाबू उग्र साधनों को अपनाना चाहते थे। कांग्रेस के अधिकांश लोग सुभाष बाबू का समर्थन करते थे। युवक वर्ग तो उनका दीवाना ही था।
सुभाष बाबू ने अगले साल मध्य प्रदेश के त्रिपुरी में हुए अधिवेशन में फिर से अध्यक्ष बनना चाहा; पर गांधी जी ने पट्टाभि सीतारमैया को खड़ा कर दिया। सुभाष बाबू भारी बहुमत से चुनाव जीत गये। इससे गांधी जी के दिल को बहुत चोट लगी। आगे चलकर सुभाष बाबू ने जो भी कार्यक्रम हाथ में लेना चाहा, गांधी जी और नेहरू के गुट ने उसमें सहयोग नहीं दिया। इससे खिन्न होकर सुभाष बाबू ने अध्यक्ष पद के साथ ही कांग्रेस भी छोड़ दी।
अब उन्होंने ‘फारवर्ड ब्लाक’ की स्थापना की। कुछ ही समय में कांग्रेस की चमक इसके आगे फीकी पड़ गयी। इस पर अंग्रेज शासन ने सुभाष बाबू को पहले जेल में और फिर घर में नजरबन्द कर दिया; पर सुभाष बाबू वहाँ से निकल भागे। उन दिनों द्वितीय विश्व युद्ध के बादल मंडरा रहे थे। सुभाष बाबू ने अंग्रेजों के विरोधी देशों के सहयोग से भारत की स्वतन्त्रता का प्रयास किया। उन्होंने आजाद हिन्द फौज के सेनापति पद से जय हिन्द, चलो दिल्ली तथा तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा का नारा दिया; पर दुर्भाग्य से उनका यह प्रयास सफल नहीं हो पाया।
सुभाष बाबू का अन्त कैसे, कब और कहाँ हुआ, यह रहस्य ही है। कहा जाता है कि 18 अगस्त, 1945 को जापान में हुई एक विमान दुर्घटना में उनका देहान्त हो गया। यद्यपि अधिकांश तथ्य इसे झूठ सिद्ध करते हैं; पर उनकी मृत्यु के रहस्य से पूरा पर्दा उठना अभी बाकी है।
गुजरात के हरिपुरा में होगा विशेष कार्यक्रम
शनिवार को इस महान नेता की जयंती पराक्रम दिवस के रूप में मनाई जाएगी। देश भर में आयोजित होने वाले विभिन्न कार्यक्रमों में से एक विशेष कार्यक्रम गुजरात के हरिपुरा में आयोजित होगा। इस कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शामिल होंगे।
हरिपुरा का नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के साथ एक विशेष संबंध रहा है। 1938 के ऐतिहासिक हरिपुरा अधिवेशन में नेताजी बोस ने कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष पद संभाला था। प्रधानमंत्री मोदी ने ट्वीट कर कहा कि हरिपुरा में आयोजित होने वाला कार्यक्रम हमारे राष्ट्र के लिए नेताजी बोस के योगदान को एक श्रद्धांजलि होगी।
–प्रवीण गुगनानी
लेखक व विचारक
स्वामी विवेकानंद ने भारत को व भारतत्व को कितना आत्मसात कर लिया था यह कविवर रविन्द्रनाथ टैगोर के इस कथन से समझा जा सकता है जिसमें उन्होंने कहा था कि –‘यदि आप भारत को समझना चाहते हैं तो स्वामी विवेकानंद को संपूर्णतः पढ़ लीजिये।’
नोबेल से सम्मानित फ्रांसीसी लेखक रोमां रोलां ने स्वामी जी के विषय में कहा था – ‘उनके द्वितीय होने की कल्पना करना भी असंभव है वे जहां भी गये, सर्वप्रथम ही रहे। प्रत्येक व्यक्ति उनमें अपने मार्गदर्शक व आदर्श को साक्षात पाता था। वे ईश्वर के साक्षात प्रतिनिधि थे व सबसे घुल मिल जाना ही उनकी विशिष्टता थी। हिमालय प्रदेश में एक बार एक अनजान यात्री उन्हें देख ठिठक कर रुक गया और आश्चर्यपूर्वक चिल्ला उठा- ‘शिव!’। यह ऐसा हुआ मानो उस व्यक्ति के आराध्य देव ने अपना नाम उनके माथे पर लिख दिया हो।’
ज्ञानपिपासु और घोर जिज्ञासु नरेन्द्र का बाल्यकाल तो स्वाभाविक विद्याओं और ज्ञान अर्जन में व्यतीत हो रहा था किन्तु वे बाल्यकाल में ही अचानक जीवन के चरम सत्य की खोज के लिए छटपटा उठे और यह जानने के लिए व्याकुल हो उठे कि क्या सृष्टि नियंता जैसी कोई शक्ति है जिसे लोग ईश्वर करते हैं? सत्य और परमज्ञान की यही अनवरत खोज उन्हें दक्षिणेश्वर के संत रामकृष्ण परमहंस तक ले गई और परमहंस ही वह सच्चे गुरु सिद्ध हुए जिनका सान्निध्य और आशीर्वाद पाकर नरेन्द्र की ज्ञान पिपासा शांत हुई और वे सम्पूर्ण विश्व में स्वामी विवेकानंद के रूप में स्वयं को प्रस्तुत कर पाए।
स्वामी विवेकानंद एक ऐसे युगपुरुष थे जिनका रोम-रोम राष्ट्रभक्ति और भारतीयता से सराबोर था। उनके सारे चिंतन का केंद्र बिंदु राष्ट्र और राष्ट्रवाद था। भारत के विकास और उत्थान के लिए अद्वित्तीय चिंतन और कर्म इस तेजस्वी संन्यासी ने किया। उन्होंने कभी सीधे राजनीति में भाग नहीं लिया किंतु उनके कर्म और चिंतन की प्रेरणा से हजारों ऐसे कार्यकर्ता तैयार हुए जिन्होंने राष्ट्र रथ को आगे बढ़ाने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। इस युवा संन्यासी ने निजी मुक्ति को जीवन का लक्ष्य नहीं बनाया था, बल्कि करोड़ों देशवासियों के उत्थान को ही अपना जीवन लक्ष्य बनाया। राष्ट्र व इसके दीन-हीन जनों की सेवा को ही वह ईश्वर की सच्ची पूजा मानते थे।
सेवा की इस भावना को उन्होंने प्रबल शब्दों में व्यक्त करते हुए कहा था- ‘भले ही मुझे बार-बार जन्म लेना पड़े और जन्म-मरण की अनेक यातनाओं से गुजरना पड़े, लेकिन मैं चाहूंगा कि मैं उसे एकमात्र ईश्वर की सेवा कर सकूं, जो असंख्य आत्माओं का ही विस्तार है। वह और मेरी भावना से सभी जातियों, वर्गों, धर्मों के निर्धनों में बसता है, उनकी सेवा ही मेरा अभीष्ट है।’
अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस से प्रेरित स्वामी विवेकानंद ने साधना प्रारंभ की और परमहंस के जीवनकाल में ही समाधि प्राप्त कर ली थी, किंतु विवेकानंद का इस राष्ट्र के प्रति प्रारब्ध कुछ और ही था। इसलिए जब स्वामी विवेकानंद ने दीर्घकाल तक समाधि अवस्था में रहने की इच्छा प्रकट की तो रामकृष्ण परमहंस ने उन्हें एक महान लक्ष्य की ओर प्रेरित करते हुए कहा- ‘मैंने सोचा था कि तुम जीवन के एक प्रखर प्रकाश पुंज बनोगे और तुम हो कि एक साधारण मनुष्य की तरह व्यक्तिगत आनंद में ही डूब जाना चाहते हो, तुम्हें संसार में महान कार्य करने हैं, तुम्हें मानवता में आध्यात्मिक चेतना उत्पन्न करनी है और दीनहीन मानवों के दु:खों का निवारण करना है।’
विवेकानंद अपने आराध्य के इन शब्दों से अभिभूत हो उठे और अपने गुरु के वचनों में सदा के लिए खो गए। स्वयं रामकृष्ण परमहंस भी विवेकानंद के आश्वासन को पाकर अभिभूत हो गए और उन्होंने अपनी मृत्यशैया पर अंतिम क्षणों में कहा- ‘मैं ऐसे एक व्यक्ति की सहायता के लिए बीस हजार बार जन्म लेकर अपने प्राण न्योछावर करना पसंद करूंगा।’
जब 1886 में रामकृष्ण परमहंस ने अपना नश्वर शरीर त्यागा। तब उनके 12 युवा शिष्यों ने संसार छोड़कर साधना का पथ अपना लिया, लेकिन स्वामी विवेकानंद ने दरिद्र-नारायण की सेवा के लिए एक कोने से दूसरे कोने तक सारे भारत का भ्रमण किया। उन्होंने देखा, देश की जनता भयानक गरीबी से घिरी हुई है और तब उनके मुख से रामकृष्ण परमहंस के शब्द अनायास ही निकल पड़े- ‘भूखे पेट से धर्म की चर्चा नहीं हो सकती।’ किसी भी रूप में धर्म को इस सब के लिए जवाबदार माने बिना उनकी मान्यता थी कि समाज की यह दुरावस्था (गरीबी) धर्म के कारण नहीं हुई बल्कि इस कारण हुई की समाज में धर्म को इस प्रकार आचरित नहीं किया गया जिस प्रकार किया जाना चाहिए था।
विवेकानंद जी ने रामकृष्ण मठ और रामकृष्ण मिशन नाम से दो पृथक संस्थाएं गठित कीं। यद्दपि इन दोनों संस्थाओं में परस्पर नीतिगत सामंजस्य था। तथापि इनके उद्देश्य भिन्न, किन्तु पूरक थे। रामकृष्ण मठ समर्पित संन्यासियों की श्रृंखला तैयार करने के लिए थी, जबकि दूसरी रामकृष्ण मिशन जनसेवा की गतिविधियों के लिए थी। वर्तमान में इन दोनों संस्थाओं के विश्वभर में सैकड़ों केंद्र हैं और ये संस्थाएं शिक्षा, चिकित्सा, संस्कृति, अध्यात्म और अन्यान्य सेवा प्रकल्पों के लिए विश्वव्यापी व प्रख्यात हो चुकी हैं।
शिकागो संभाषण के द्वारा सम्पूर्ण विश्व को भारत के विश्वगुरु होनें का दृढ़ सन्देश दे चुके स्वामी जी को पश्चिमी मीडिया जगत “साइक्लोनिक हिन्दू” के नाम से पुकारने लगा था। इन महान कार्यों के स्थापना के बाद स्वामी जी केवल पांच वर्ष ही जीवित रह पाए और मात्र चालीस वर्ष की अल्पायु उनका दुखद निधन हो गया, किन्तु इस अल्पायु के जीवन में उन्होंने सदियों के जीवन को क्रियान्वित कर दिया था। इस कार्य यज्ञ हेतु उन्होंने सात बार सम्पूर्ण भारत का भ्रमण किया था और पाया था कि जनता गहन अंधकार में भटकी हुई है। उन्होंने भारत में व्याप्त दो महान बुराइयों की ओर संकेत किया। पहली महिलाओं पर अत्याचार और दूसरी जातिवादी विषयों की चक्की में गरीबों का शोषण।
उन्होंने कहा कि पेड़ों और पौधों तक को जल देने वाले धर्म में जातिभेद का कोई स्थान नहीं हो सकता; ये विकृति धर्म की नहीं, हमारे स्वार्थों की देन है। स्वामीजी ने उच्च स्वर में कहा- ‘जातिप्रथा की आड़ में शोषण चक्र चलाने वाले धर्म को बदनाम न करें।’
विवेकानंद एक सुखी और समृद्ध भारत के निर्माण के लिए बेचैन थे। इसके लिए जातिभेद ही नहीं, उन्होंने हर बुराई से संघर्ष किया। वे समाज में समता के पक्षधर थे और इसके लिए जिम्मेदार लोगों के प्रति उनके मन में गहरा रोष था। उन्होंने कहा- ‘जब तक करोड़ों लोग गरीबी, भुखमरी और अज्ञान का शिकार हो रहे हैं, मैं हर उस व्यक्ति को शोषक मानता हूं, जो उनकी ओर जरा भी ध्यान नहीं दे रहा है।’
स्वामी विवेकानंद के मन में समता के लिए वर्तमान समाजवाद की अवधारणा से भी अधिक आग्रह था। उन्होंने कहा था –‘समता का विचार सभी समाजों का आदर्श रहा है। संपूर्ण मानव जाति के विरुद्ध जन्म, जाति, लिंग, भेद अथवा किसी भी आधार पर समता के विरुद्ध उठाया गया कोई भी कदम एक भयानक भूल है, और ऐसी किसी भी जाति, राष्ट्र या समाज का अस्तित्व कायम नहीं रह सकता, जो इसके आदर्शों को स्वीकार नहीं कर लेता।’
आज कल बहुधा नहीं बल्कि सर्वदा ही कहा जानें लगा है कि शासन और प्रशासन को धर्म, संस्कृति और परम्पराओं के सन्दर्भों में धर्म निरपेक्ष होकर विचार और निर्णय करने चाहिए। यह बड़ा यक्ष प्रश्न है कि हमारे देश के तथाकथित बुद्धिजीवी और प्रगतिशील कहलानें वाला वर्ग धर्म निरपेक्षता के जो मायने निकाल रहा है क्या वह सही है? स्वामी जी ने जब शिकागो में अपने विचारों को व्यक्त करते हुए कहा था कि ” राष्ट्रवाद का मूल धर्म व संस्कृति के विचारों में ही बसता है”, तब सम्पूर्ण पाश्चात्य विश्व ने उनके इस विचार से सहमति व्यक्त की थी और भारत के इस युग पुरुष के इस विचार को अपने-अपने देशों में जाकर प्रचारित और प्रसारित किया था और भारतीय संस्कृति के प्रति सम्मान प्रकट किया था।
अपने संभाषण में स्वामी जी ने गौरवपूर्वक कहा था कि भारत एक हिन्दू राष्ट्र है और हिंदू जीवन शैली के साथ जीवन यापन करना ही इस आर्यावर्त का एक मात्र विकास मार्ग रहा है। भविष्य में विकास करने की और एक आत्मनिष्ठ समाज के रूप में अस्तित्व बनाएं रखने में यही एक मात्र मंत्र ही सिद्ध और सफल रहेगा। स्वामी जी ने कहा था कि भारत के विश्व गुरु के स्थान पर स्थापित होने का एक मात्र कारण यहां के वेद, उपनिषद, ग्रन्थ और लिखित अलिखित करोड़ों आख्यान और गाथाएं ही रहीं हैं।अपनी बात को विस्तार देतें हुए उन्होंने कहा था कि जिस भारत को विश्व सोने की चिड़िया के रूप में पहचानता है उसकी समृद्धि और ऐश्वर्य का आधार हिन्दू आध्यामिकता में निहित है।
- डॉ.नीलम महेंद्र
वरिष्ठ स्तंभकार
धर्म अथवा पंथ जब तक मानव के व्यक्तिगत जीवन का हिस्सा बनने तक सीमित रहे, वो उसकी आध्यात्मिक उन्नति का माध्यम बन कर उसमें एक सकारात्मक शक्ति का संचार करता है। लेकिन जब वो मानव के व्यक्तिगत जीवन के दायरे से बाहर निकल कर समाज के सामूहिक आचरण का माध्यम बन जाता है तो वो समाज में एक सामूहिक शक्ति का संचार करता है। लेकिन यह कहना कठिन होता है कि समाज की यह सामूहिक शक्ति उस समाज को सकारात्मकता की ओर ले जाएगी या फिर नकारात्मकता की ओर। शायद इसीलिए कार्ल मार्क्स ने धर्म को जनता की अफीम कहा था।
दरसअल, पिछले कुछ समय से मजहबी मान्यताओं के आधार पर विभिन्न उत्पादों का हलाल सर्टिफिकेशन राष्ट्रीय ही नहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा में है। हाल ही में योरोपीय महाद्वीप के देश बेल्जियम में हलाल मीट और कोशर मीट पर एक अदालती फैसला आया है। पशु अधिकारों को ध्यान में रखते हुए योरोपीय संघ की अदालत ने बिना बेहोश किए जानवरों को मारे जाने पर लगी रोक को बरकरार रखा है। इसका मतलब यह है कि बेल्जियम में किसी भी जानवर को मारने से पहले उसे बेहोश करना होगा ताकि उसे कष्ट ना हो। योरोपीय संघ की अदालत के इस फैसले ने योरोपीय संघ के अन्य देशों में भी इस प्रकार के कानून बनने का मार्ग प्रशस्त कर दिया है। मजहबी स्वतंत्रता के नाम पर बेल्जियम के मुसलमान और यहूदी संगठन इस कानून का विरोध कर रहे हैं।
भारत की बात करें तो यह चर्चा में इसलिए है कि अप्रैल 2020 में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी जिसमें कोविड महामारी के मद्देनजर हलाल मीट पर प्रतिबंध लगाने की मांग की गई थी जिसे कोर्ट ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि अदालत लोगों की भोजन करने की आदतों में हस्तक्षेप नहीं कर सकती। इसी से संबंधित ताजा मामला दक्षिण दिल्ली म्युनिसिपल कारपोरेशन के अंतर्गत आने वाले होटलों के लिए लागू किए गए एक नियम का है। इसमें दिल्ली के ऐसे होटल या मीट की दुकान जो दक्षिण दिल्ली म्युनिसिपल कारपोरेशन (SDMC) के अंतर्गत आते हैं उन्हें अब हलाल या झटका का बोर्ड दुकान के बाहर लगाना अनिवार्य होगा। दरसअल SDMC की सिविक बॉडी की स्टैंडिंग कमेटी ने एक प्रस्ताव पास किया, जिसमें लिखा है कि हिन्दू और सिख के लिए हलाल मीट खाना वर्जित है। इससे पहले क्रिसमस के दौरान केरल के ईसाइयों ने भी हलाल मांस के विरोध में प्रदर्शन किया था। इस मामले में क्रिश्चियन असोसिएशन ऑफ चर्च के ऑक्सीलरी फ़ॉर सोशल एक्शन ने ईसाइयों से एक अपील भी की थी जिसमें हलाल मांस को उनके धार्मिक लोकाचार के खिलाफ होने के कारण इन्हें खाद्य पदार्थों के रूप में खरीदने से मना किया गया था।
मजहब के नाम पर जिस हलाल पर विश्व भर में हायतौबा मची हुई है पहले थोड़ा उसे समझ लेते हैं। हलाल दरसअल एक अरबी शब्द है जिसका उपयोग क़ुरान में भोजन के रूप में स्वीकार करने योग्य वस्तुओं के लिए किया गया है। इस्लाम में आहार संबंधी कुछ नियम बताए गए हैं जिन्हें हलाल कहा जाता है। लेकिन इसका संबंध मुख्य रूप से मांसाहार से है। जिस पशु को भोजन के रूप में ग्रहण किया जाता है उसके वध की प्रक्रिया विशेष रूप से बताई गई है। इसी के चलते मुस्लिम देशों में सरकारें ही हलाल का सर्टिफिकेट देती हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि जो मीट वहां परोसा जा रहा है वो उनकी मजहबी मान्यताओं के अनुरूप है।
हमारे देश में भी भारतीय रेल और विमानन सेवाओँ जैसे प्रतिष्ठानों से लेकर फाइव स्टार होटल तक हलाल सर्टिफिकेट हासिल करते हैं जो यह सुनिश्चित करता है कि जो मांस परोसा जा रहा है वो हलाल है। मैकडोनाल्ड, डोमिनोज़, जोमाटो जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियां तक इसी सर्टिफिकेट के साथ काम करती हैं। लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि हमारे देश में यह सर्टिफिकेट सरकार द्वारा नहीं दिया जाता। दरसअल भारत में अलग अलग वस्तुओं के लिए अलग अलग सर्टिफिकेट का प्रावधान है जो उनकी गुणवत्ता सुनिश्चित करते हैं। जैसे औद्योगिक वस्तुओं के लिए ISI मार्क, कृषि उत्पादों के लिए एगमार्क, प्रॉसेस्ड फल उत्पाद जैसे जैम अचार के लिए एफपीओ, सोने के लिए हॉलमार्क, आदि। लेकिन हलाल का सर्टिफिकेट भारत सरकार नहीं देती है। भारत में यह सर्टिफिकेट कुछ प्राइवेट संस्थान जैसे हलाल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, हलाल सर्टिफिकेशन सर्विसेज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, जमायत उलमा ए हिन्द हलाल ट्रस्ट आदि।
अभी तक देश से निर्यात होने वाले डिब्बाबंद मांस के लिए वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के तहत आने वाले खाद्य उत्पादन निर्यात विकास प्राधिकरण को हलाल प्रमाणपत्र देना पड़ता था क्योंकि दुनिया के अधिकांश मुस्लिम देश हलाल मांसाहार ही आयात करते हैं। लेकिन यह बात जितनी साधारण दिखाई दे रहे है उससे कहीं अधिक पेचीदा है। क्योंकि तथ्य यह बताते हैं कि जो बात मजहबी मान्यताओं के अनुसार पशु वध के तरीके (हलाल) से शुरू हुई थी अब वो दवाईयों से लेकर सौंदर्य उत्पाद जैसे लिपस्टिक और शैम्पू, अस्पतालों से लेकर फाइव स्टार होटल, रियल एस्टेट से लेकर हलाल टूरिज्म और तो और आटा, मैदा, बेसन जैसे शाकाहारी उत्पादों तक के हलाल सर्टिफिकेशन पर पहुच गई है। आयुर्वेदिक औषधियों के लिए भी हलाल सर्टिफिकेट! ऐसा क्यों है? क्योंकि जो भी कंपनी अपना सामान मुस्लिम देशों को निर्यात करती हैं उन्हें इन देशों को यह सर्टिफिकेट दिखाना आवश्यक होता है। अगर हलाल फूड मार्किट के आंकड़ों की बात करें तो यह वैश्विक स्तर पर 19% की है जिसकी कीमत लगभग 2.5 ट्रिलियन $ की बैठती है। आज मुस्लिम देशों में हलाल सर्टिफिकेट उनकी जीवनशैली से जुड़ गया है। वे उस उत्पाद को नहीं खरीदते जिस पर हलाल सर्टिफिकेट नहीं हो। हलाल सर्टिफिकेट वाले अस्पताल में इलाज, हलाल सर्टिफिकेट वाले कॉम्प्लेक्स में फ्लैट औऱ हलाल टूरिज्म पैकेज देने वाली एजेंसी से यात्रा। यहां तक कि हलाल की मिंगल जैसी डेटिंग वेबसाइट।
अब प्रश्न उठता है कि उपर्युक्त तथ्यों के क्या मायने हैं। दरसअल जो बात एक सर्टिफिकेट से शुरू होती है वो बहुत दूर तक जाती है। क्योंकि जब हलाल मांस की बात आती है तो स्वाभाविक रूप से उसे काटने की प्रक्रिया के चलते वो एक मुस्लिम के द्वारा ही कटा हुआ होना चाहिए। जाहिर है इसके परिणामस्वरूप जो हिन्दू इस कारोबार से जुड़े थे वो इस कारोबार से ही बाहर हो गए। इसी प्रकार जब हलाल सर्टिफिकेट मांस तक सीमित ना होकर रेस्टोरेंट या फाइव स्टार होटल पर लागू होता है तो वहाँ परोसी जाने वाली हर चीज जैसे तेल, मसाले चावल, दाल सब कुछ हलाल सर्टिफिकेट की होनी चाहिए। और जब यह हलाल सर्टिफाइड मांसाहार रेल या विमानों में परोसा जाता है तो हिदुओं और सिखों जैसे गैर मुस्लिम मांसाहारियों को भी परोसा जाता है। ये गैर मुस्लिम जिनकी धार्मिक मान्यताएं हलाल के विपरीत झटका मांस की इजाजत देती हैं वो भी इसी का सेवन करने के लिए विवश हो जाते हैं।
लेकिन इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात जो समझने वाली है वो यह कि इस हलाल सर्टिफिकेट को लेने के लिए भारी भरकम रकम देनी पड़ती है जो गैर सरकारी मुस्लिम संगठनों की झोली में जाति है। माँस से आगे बढ़ कर चावल, आटा, दालों, कॉस्मेटिक जैसी वस्तुओं के हलाल सर्टिफिकेशन के कारण अब यह रकम धीरे-धीरे एक ऐसी समानांतर अर्थव्यवस्था का रूप लेती जा रही है जिस पर किसी भी देश की सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है और इसलिए यह एक वैश्विक चिंता का विषय भी बनता जा रहा है। ऑस्ट्रेलियाई नेता जॉर्ज क्रिस्टेनसेन ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि हलाल अर्थव्यवस्था का पैसा आतंकवाद के काम में लिया जा सकता है। वहीं अंतरराष्ट्रीय लेखक नसीम निकोलस ने अपनी पुस्तक “स्किन इन द गेम” में इसी विषय पर ” द मोस्ट इंटॉलरेंट विंस” (जो असहिष्णु होता है वो जीतता है) नाम का लेख लिखा है। इसमें उन्होंने यह बताया है कि अमरीका जैसे देश में मुस्लिम और यहूदियों की अल्पसंख्यक आबादी कैसे पूरे अमेरिका में हलाल मांसाहार की उपलब्धता मुमकिन करा देते हैं।
अमरीका, ऑस्ट्रेलिया और योरोप के देश इस बात को समझ चुके हैं कि मजहबी मान्यताओं के नाम पर हलाल सर्टिफिकेट के जरिए एक आर्थिक युद्ध की आधारशिला रखी जा रही है जिसे हलालोनोमिक्स भी कहा जा रहा है। यही कारण है कि ऑस्ट्रेलिया की दो बड़ी मल्टी नेशनल कंपनी केलॉग्स और सैनिटेरियम ने अपने उत्पादों के लिए हलाल सर्टिफिकेट लेने से यह कहते हुए इनकार कर दिया कि उनके उत्पाद शुद्ध शाकाहारी होते हैं। इसलिए उन्हें हलाल सर्टिफिकेशन की कोई आवश्यकता नहीं है।
लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारे देश में राष्ट्रवाद की बात करने वाले बाबा रामदेव तक अपने शाकाहारी औषधीय उत्पादों का हलाल सर्टिफिकेशन करवाने के लिए मुस्लिम संगठनों को भारी भरकम फीस देते हैं। जब कारोबारी नफा नुकसान के आगे एक योगी की देशभक्ति कमजोर पड़ जाती है तो फिर एक आम आदमी की बिसात ही क्या। आज के युग में जब युद्ध हथियारों के बजाए अर्थव्यवस्ताओं के सहारे खेला जाता है तो योद्धा देश की सेना नहीं देश का हर नागरिक होता है। इसलिए हलाल के नाम पर एक आर्थिक युद्ध की घोषणा तो की जा चुकी है चुनाव अब आपको करना है कि इस युद्ध में सैनिक बनना है या फिर मूकदर्शक। (विसंकें)
झारखंड की राज्य सरकार ने बहुमत से विधेयक पारित कर घोषित किया कि सरना धर्म को मानने वाले हिन्दू नहीं हैं। सरना, हिन्दू से अलग धर्म है। तभी दूसरी ओर आंध्र प्रदेश की सरकार ने भी निर्णय लिया कि अनुसूचित जनजाति के लोग हिन्दू नहीं हैं और यह मानते हुए 2021 में होने वाली जनगणना के समय उन्हें हिन्दू के स्थान पर अनुसूचित जनजाति श्रेणी के अंतर्गत सूचीबद्ध किया जाएगा। यह दोनों समाचार पढ़कर इन दोनों निर्णय करने वालों में भारतबोध व हिंदुत्व की समझ का अभाव और राजकीय सत्ता के अहंकार का दर्शन हुआ।
हिंदुत्व कोई एक रिलिजन नहीं है। वह एक जीवन दृष्टि है ऐसा सर्वोच्च न्यायालय ने भी मान्य किया है। इस जीवन दृष्टि की विशेषता है कि यह अध्यात्म आधारित है और भारतीय उपखंड में सदियों से रहते आए विभिन्न पद्धति से उपासना करने वाले, विविध भाषा बोलने वाले सभी लोग अपने आप को इसके साथ जोड़ते हैं। इस कारण इसके मानने वालों की, इस भूखंड में रहने वालों की एक अलग पहचान, एक व्यक्तित्व तैयार हुआ है।
उसकी एक विशेषता है – एकं सत् विप्राः बहुधा वदन्ति । सत्य या ईश्वर एक है, उसे अनेक नाम से लोग जानते हैं, उसे जानने के अनेक विभिन्न मार्ग हो सकते हैं। ये सभी समान हैं। इसीलिए यहूदी, पारसी, सिरीयन ईसाई अलग-अलग समय पर अपने देश से प्रताड़ित हो कर आश्रय लेने हेतु भारत के भिन्न-भिन्न भू-भागों में आए। वहां के राजा, लोगों की भाषा, लोगों की उपासना पद्धति अलग-अलग होने पर भी भिन्न वंश, भाषा और उपासना वाले, आश्रयार्थ आए लोगों के साथ यहां के लोगों का व्यवहार समान था, सम्मान का और उदारता का था। इसके मूल में यह कारण है। उस व्यक्तित्व की दूसरी विशेषता है – विविधता में एकता को देखना। एक ही चैतन्य विविध रूपों में अभिव्यक्त हुआ है, इसलिए इन विविध रूपों में अंतर्निहित एकता देखने की दृष्टि भारत की रही है।
इसलिए भारत विविधता को भेद नहीं मानता। विविध रूपों में निहित एकता को पहचानकर उन सब की विशेषताओं को सुरक्षित रखते हुए सब को साथ लेने की विलक्षण क्षमता भारत रखता है। तीसरी विशेषता है – प्रत्येक मनुष्य (स्त्री या पुरुष) में दिव्यत्व विद्यमान है। मनुष्य जीवन का लक्ष्य ही इस दिव्यत्व को प्रकट करते हुए उस परम-दिव्यत्व के साथ एक होने का प्रयत्न करना है। यह दिव्यत्व प्रकट करने का मार्ग प्रत्येक का अलग अलग हो सकता है। वह उसका रिलिजन या उपासना होगी., इन विशेषताओं से युक्त इस व्यक्तित्व को दुनिया अनेक वर्षों से हिंदुत्व के नाते जानती आयी है। उसे कोई भारतीय, सनातन, इंडिक अन्य कोई नाम भी दे सकता है। सभी का आशय एक ही है।
इनमें से कौन सी बात सरना या जनजातीय समाज को स्वीकार नहीं है?
डॉ. राधाकृष्णन ने हिंदुत्व को Common Wealth of all Religions कहा। स्वामी विवेकानंद ने 1893 के अपने शिकागो व्याख्यान में हिंदुत्व को Mother of all Religions बताया। सर्वसमावेशकता, सर्वस्वीकार्यता, विविध मार्ग और विविध रूपों का स्वीकार करने की दृष्टि ही हिंदुत्व है दस हजार वर्षों से भी प्राचीन इस समाज में समय-समय पर लोगों के उपास्य देवता बदलते गए हैं। ऐसे परिवर्तन को स्वीकार करना यही हिंदुत्व है।
स्वामी विवेकानन्द ने 1893 के अपने सुप्रसिद्ध शिकागो व्याख्यान में यह श्लोक उद्धृत किया था।
त्रयी साङ्ख्यं योगः पशुपतिमतं वैष्णवमिति प्रभिन्ने प्रस्थाने परमिदमदः पथ्यमिति च।
रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिल नानापथजुषां नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव॥
अर्थ– हे परमपिता!!! आपको पाने के अनगिनत मार्ग हैं – सांख्य मार्ग, वैष्णव मार्ग, शैव मार्ग, वेद मार्ग आदि। लोग अपनी रुचि के अनुसार कोई एक मार्ग पसंद करते हैं। मगर अंत में जैसे अलग अलग नदियों का पानी बहकर समुद्र में जा मिलता है, वैसे ही, ये सभी मार्ग आप तक पहुंचते हैं। सच, किसी भी मार्ग का अनुसरण करने से आपकी प्राप्ति हो सकती है।
इस भारत के विचार की सुंदरता और सार यह है कि नए नए देवताओं का उद्भव होता रहेगा। पुराने देवताओं को साथ रखते हुए नए को भी समाविष्ट करने की प्रवृत्ति – यही हिंदुत्व है।
गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर ने स्पष्ट कहा – अनेकता में एकता देखना और विविधता में ऐक्य प्रस्थापित करना यही है भारत का अन्तर्निहित धर्म। भारत विविधता को भेद नहीं मानता और पराये को दुश्मन नहीं मानता। इसलिए नए मानव समूह के संघात से हम भयभीत नहीं होंगे। उनकी (नए लोगों की) विशेषता पहचान कर उन्हें अपने साथ लेने की विलक्षण क्षमता भारत की है। इसलिए भारत में हिन्दू, मुस्लिम, बौद्ध, ईसाई परस्पर लड़ते हुए दिखेंगे, पर वे लड़ कर मर नहीं जाएंगे। वे एक सामंजस्य स्थापित करेंगे ही। यह सामंजस्य अहिन्दु नहीं होगा। वह होगा विशेष भाव से हिन्दू।
यह सामंजस्य की, एकता की दृष्टि हिंदुत्व की है। अब कोई सरना या अनुसूचित जनजाति के बंधु यह कहें कि वे हिंदुत्व से कैसे अलग है। क्योंकि हिंदुत्व किसी एक रूप (form) की बात नहीं करता, बल्कि जिस एक ही चैतन्य के ये सभी रूप हैं, उस एकता या एकत्व की दृष्टि माने हिंदुत्व है।
कुछ वर्ष पूर्व पूर्वोत्तर (असम) के जनजाति बहुल क्षेत्र में एक प्रयोग हुआ। वहां के विभिन्न राज्यों की 18 जनजातियों के सम्मेलन में ये कुछ प्रश्न पूछे गए थे। 1- ईश्वर के बारे में हमारी संकल्पना। 2- धरती के बारे में हमारी अवधारणा? 3- हम प्रार्थना में क्या मांगते हैं? 4- पाप और पुण्य की संकल्पना? 5- दूसरों की पूजा पद्धति के बारे में हमारा अभिमत क्या है? 6- क्या आप दूसरी पूजा परंपरा वालों को उनकी पूजा छुड़वाकर अपनी पूजा वालों में मिला लेना चाहते हैं?
इन प्रश्नों के पूछने पर सभी के उत्तर वही थे जो देश के किसी भी भाग में बसा हिंदू देता है। इनकी प्रस्तुति के पश्चात् यह सभी के लिए आश्चर्यजनक था कि अलग-अलग भाषाएं बोलने वाली इन सभी जनजातियों के विचार में सभी विषयों पर साम्य है और इन का भारत की आध्यात्मिक परंपरा से परस्पर मेल है।
इस भू-सांस्कृतिक इकाई में पूजा या उपासना के विविध रूपों में अन्तर्निहित एकता का आधार हिंदुत्व और भारत की अध्यात्म आधारित एकात्म, सर्वांगीण, सर्व-समावेशक हिन्दू जीवन दृष्टि ही है।
ऐतिहासिक, सामाजिक, राजनैतिक दृष्टि से जनजाति समाज हिन्दू ही है। राजनैतिक, सांस्कृतिक और उपासना की दृष्टि से वे अनादि काल से हिन्दू समाज का अभिन्न अंग रहे हैं।
सेमेटिक मूल के होने के कारण ईसाई और मुस्लिम रिलीजन्स में यह सामंजस्य की दृष्टि नहीं है। वे मानवता को दो हिस्सों में बाँटते हैं। और दोनों एक साथ नहीं रह सकते हैं। इसीलिए इनका कन्वर्जन का इतिहास रक्तरंजित तथा हिंसा, लालच और धोखे का रहा है। ईशान्य भारत के जनजातियों में भी ईसाई चर्च द्वारा वहां के जनजातीय लोग हिन्दू नहीं हैं ऐसा झूठा प्रचार करने का प्रयास पहले ब्रिटिश शासक और बाद में भारतीय शासकों की सहायता से वर्षों से चलते आए हैं। इसी कारण वहां अलगाववादी शक्तियां भी अधिक सक्रिय हुईं यहां भी नयी और अलग पहचान देने के नाम पर उनकी सांस्कृतिक जड़ों को गहराई से धीरे-धीरे उखाड़ना और फिर आत्माओं की खेती, यानि soul harvesting, करने की योजना चल रही थी। परन्तु अब वहां के जनजातियों को यह आभास हो गया है कि ईसाई के साथ रहकर हमारी सांस्कृतिक और पूजा पद्धति की पहचान खोने का संकट दिखता है। वे यह भी अनुभव कर रहे हैं कि हिन्दू समाज में, इसके साथ रहेंगे तो उनकी अलग सांस्कृतिक और पूजा की पहचान बनी रहेगी, सुरक्षित रहेगी। यह उनका विश्वास दिनों दिन बढ़ता जा रहा है। इसलिए वहां डोनी पोलो, सेंग खासी जैसे भारतीय आस्था अभियान शुरू हो गए हैं और बढ़ रहे हैं। सरना आदि अन्य जनजाति के नेताओं को भी एक बार इन भारतीय आस्था अभियान (indigenous faith movements) के लोगों के अनुभव से सीख लेनी चाहिए। और अपनी संस्कृति और पूजा पद्धति की विशेष पहचान सुरक्षित बचाकर उन्हें और अधिक समृद्ध करने की दृष्टि से हिंदुत्व से अपना नाता बनाये रखना चाहिए।
जब देवताओं के कोई रूप (forms) या नाम भी नहीं थे, तब निर्गुण निराकार ईशत्व की चर्चा, आराधना और उपासना सभी करते थे। ईशावास्यं इदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् यही उसका आधार था।
फिर तरह तरह के विभिन्न देवताओं के रूप के माध्यम से उसी परम तत्व की उपासना और आराधना शुरू हुई। परन्तु ये सभी प्रकृति की पूजा, पंच-महाभूत की पूजा तो करते ही थे। आगे भी अनेक अवतारी पुरुषों के माध्यम से नए नए उपासना मार्ग जुड़ते चले गए। ये सभी फिर भी भूमि, अग्नि, वृक्ष, पहाड़, सागर के माध्यम से प्रकृति पूजा करते ही हैं। इसलिए प्रकृति पूजा तो आरम्भ से ही है। उसके आगे कालक्रमानुसार नित नयी बातें जुड़ती चली गयीं। पर अन्यान्य माध्यम से प्रकृति पूजा तो हिन्दू समाज के सभी वर्गों में आज भी चल रही है। इसलिए केवल प्रकृति पूजा करने वालों के साथ सम्पूर्ण हिन्दू समाज का तादात्म्य वैसा ही बरकरार है। केवल कुछ तत्व विविधता को भेद बता कर बुद्धि भ्रम का प्रयास कर रहे हैं, उनसे सभी को सावधान रहना होगा।
केवल सरना या अनुसूचित जनजाति बंधु ही नहीं, भारत में विविध समाज वर्गों में गत कुछ वर्षों से यह प्रचलित करने का योजनाबद्ध प्रयास चल रहा है कि हम हिन्दू नहीं हैं। हिंदुत्व की जो विविधता में एकता देखने की विशेष दृष्टि है उसे भुला कर इस विविधता को भेद नाते बता कर, उभारकर हिन्दू समाज में विखंडन निर्माण करने के अंतर्राष्ट्रीय षड्यंत्र हो रहे हैं। हिन्दू एक रहेगा तो समाज एक रहेगा, देश एक रहेगा। देश एक रहेगा तभी देश आगे बढ़ेगा। ऐसा ना हो, इसमें जिनके स्वार्थ निहित हैं वे सभी तत्व भारत विखंडन के कार्य में लिप्त हैं।
भारत विखंडन के प्रयास कैसे चल रहे हैं, इस पर अनेक शोधपरक पुस्तकें उपलब्ध हैं। इसमें एक शक्ति ईसाई चर्च की भी है। उन्हें भारत में धर्मांतरण कर ईसाई संख्या बढ़ानी है। उनकी धर्मांतरण करने वाली सभी संस्थाओं की वेबसाइट पर इसका स्पष्ट उल्लेख है। कुछ ईसाई संस्था छद्म रूप से विभिन्न नामों से समाज में पहले भ्रम, फिर विरोध, फिर विखंडन और बाद में अलगाववाद निर्माण करने के कार्य में लगी हैं। कन्वर्जन के प्रयास को वे फसल काटना (harvesting) संज्ञा देते हैं। यह फसल काटने के प्रयास ब्रिटिश शासन के समय से ही चल रहे हैं। पर भारत की सांस्कृतिक जड़ें बहुत गहरी हैं और अनेक साधु-संतों द्वारा समय समय पर आध्यात्मिक और सांस्कृतिक चेतना जगाने के प्रयास यहां पीढ़ियों से चल रहे हैं। ऐसी कोई जाति या जनजाति भारत में नहीं है, जिसमें ऐसे संत-साधु पैदा नहीं हुए. इसलिए ईसाई कन्वर्जन के सभी प्रयास अन्य देशों की तुलना में भारत में कम सफल होते दिखते हैं। तभी नए-नए हथकंडे भी अपनाये जा रहे हैं। भारत विखंडन के प्रयास करने वाले सभी तत्व आपस में अच्छा तालमेल बनाकर अपना अपना एजेंडा चलाने का प्रयास कर रहे हैं।
प्रत्येक जाति और जनजाति में आध्यात्मिक-सांस्कृतिक जागरण का काम पीढ़ी दर पीढ़ी चलते रहने से इन सभी समाज में सांस्कृतिक जड़ें गहरी उतर चुकी है। कन्वर्जन आसानी से हो इस हेतु आवश्यक हैं कि जिनका कन्वर्जन करना है, उनकी सांस्कृतिक जड़ें जिस गहराई तक पहुंची है, वहां से उखाड़ना। जब जड़ें कमजोर और उथली होंगी तो उनकी (harvesting) फसल काटना आसान होगा। इसलिए तरह तरह के तर्क देकर और हथकंडे अपनाकर भ्रम फैलाने का षड्यंत्र चल ही रहा है। इसे सभी को समझना होगा, चेतना होगा, जागृत रहना होगा। प्रसिद्ध कवि प्रसून जोशी की एक कविता है –
उखड़े उखड़े क्यों हो वृक्ष सूख जाओगे।
जितनी गहरी जड़ें तुम्हारी उतने ही तुम हरियाओगे।
जिन दो राज्यों में ये निर्णय लिए गए, वे राज्य अनेक वर्षों से ईसाई गतिविधि और कन्वर्ज़न के केंद्र रहे हैं, यह महज संयोग नहीं मानना चाहिए। harvesting के लिए जड़ों की गहराई कम करना उपयोगी होता है।
तरह-तरह के भ्रम फैलाकर, उसके लिए बहुत बड़ी मात्रा में धन का प्रयोग करने के व्यापक षड्यंत्र का ही यह हिस्सा है। देश भर में जड़ों से उखाड़ने के ऐसे जितने भी प्रयास चल रहे हैं, उनके पीछे के तत्व और उनकी फंडिंग को देखेंगे तो यह समझ आएगा। (विसंकें)