मौसम में तेजी से हो रहे बदलाव के साथ वायरल संक्रमण के मामलों में अचानक बढ़ोतरी देखी जा रही है। दिन में बढ़ती गर्मी और सुबह-शाम की हल्की ठंड शरीर पर असर डाल रही है, जिससे लोग सर्दी, खांसी और बुखार जैसी समस्याओं की चपेट में आ रहे हैं। अस्पतालों और क्लीनिकों में गले में खराश, नाक बंद, छींक और हल्के बुखार की शिकायत लेकर पहुंचने वाले मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक, तापमान में उतार-चढ़ाव शरीर के लिए एक तरह का दबाव (थर्मल स्ट्रेस) पैदा करता है। ऐसे में शरीर को नए मौसम के अनुसार खुद को ढालने में समय लगता है, जिससे इम्यून सिस्टम कमजोर पड़ सकता है। यही स्थिति वायरस को संक्रमण फैलाने का मौका देती है। इसी वजह से मौसम बदलते ही फ्लू, वायरल फीवर और सर्दी-खांसी के मामले तेजी से बढ़ने लगते हैं।
जनरल फिजिशियन डॉ अरविंद शर्मा के अनुसार, पिछले कुछ दिनों में ओपीडी में वायरल संक्रमण के मरीजों की संख्या में काफी इजाफा हुआ है। मरीजों में तेज बुखार, सिरदर्द, बदन दर्द, गले में खराश, खांसी और कमजोरी जैसे लक्षण सामान्य रूप से देखे जा रहे हैं। कई लोगों में स्वाद और गंध की क्षमता अस्थायी रूप से प्रभावित हो रही है, हालांकि ज्यादातर मामलों में यह कुछ दिनों में ठीक हो जाती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अचानक मौसम परिवर्तन वायरस के पनपने के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करता है। इसके अलावा भीड़-भाड़ वाले स्थानों पर जाना, संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आना और स्वच्छता में कमी संक्रमण के खतरे को बढ़ा देती है। बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और कमजोर प्रतिरक्षा वाले लोगों को इस समय विशेष सावधानी बरतने की जरूरत है।
वायरल फीवर मुख्य रूप से इन्फ्लूएंजा जैसे वायरस के कारण फैलता है, जो खांसने-छींकने से निकलने वाली बूंदों या संक्रमित सतहों के संपर्क से तेजी से फैल सकता है। बदलते मौसम में यह संक्रमण ज्यादा सक्रिय हो जाता है।
बचाव के लिए डॉक्टर संतुलित आहार, पर्याप्त नींद और नियमित व्यायाम पर जोर देते हैं। हाथों की सफाई बनाए रखना, भीड़-भाड़ में मास्क पहनना और बीमार लोगों से दूरी रखना भी जरूरी है। अगर बुखार तीन दिन से ज्यादा बना रहे, सांस लेने में दिक्कत हो या अत्यधिक कमजोरी महसूस हो, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि थोड़ी सावधानी और मजबूत इम्युनिटी के जरिए इस मौसमी वायरल संक्रमण से काफी हद तक बचा जा सकता है।
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बदलते मौसम और बढ़ते संक्रमण के दौर में बच्चों की सेहत को लेकर चिंता स्वाभाविक है। विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों की मजबूत इम्युनिटी की नींव दवाओं से नहीं, बल्कि सही खानपान और दिनचर्या से रखी जाती है। अगर बचपन से ही पौष्टिक आहार की आदत डाली जाए, तो बच्चे न सिर्फ बीमारियों से दूर रहते हैं बल्कि उनका संपूर्ण विकास भी बेहतर होता है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार बच्चों का इम्यून सिस्टम काफी नाजुक होता है, इसलिए उन्हें रोजाना ऐसे पोषक तत्वों की जरूरत होती है जो शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमता को बढ़ाएं। विटामिन, मिनरल्स और एंटी-ऑक्सीडेंट से भरपूर आहार बच्चों को अंदर से मजबूत बनाता है और संक्रमण के खतरे को कम करता है।
खट्टे फल बनाएं प्राकृतिक सुरक्षा कवच
संतरा, नींबू और आंवला जैसे खट्टे फल विटामिन-C से भरपूर होते हैं, जो शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करते हैं। ये फल सफेद रक्त कोशिकाओं के निर्माण में मदद करते हैं, जिससे शरीर संक्रमण से बेहतर तरीके से लड़ पाता है। बच्चों को रोजाना ताजे फल या जूस देना बेहद फायदेमंद होता है।
बादाम और अखरोट
बादाम और अखरोट जैसे ड्राई फ्रूट्स बच्चों के लिए ऊर्जा और पोषण का अच्छा स्रोत हैं। इनमें मौजूद विटामिन-E और ओमेगा-3 फैटी एसिड शरीर को अंदर से मजबूत बनाते हैं। रोज सुबह भीगे हुए बादाम खिलाने से बच्चों की याददाश्त और शारीरिक विकास दोनों में सुधार होता है।
दही से दुरुस्त रहे पाचन तंत्र
विशेषज्ञ बताते हैं कि शरीर की इम्युनिटी का बड़ा हिस्सा पाचन तंत्र से जुड़ा होता है। दही में मौजूद अच्छे बैक्टीरिया (प्रोबायोटिक्स) पेट को स्वस्थ रखते हैं और हानिकारक कीटाणुओं को पनपने से रोकते हैं। बच्चों के भोजन में दही या फ्रूट योगर्ट शामिल करना लाभकारी साबित होता है।
हल्दी वाला दूध और स्वस्थ दिनचर्या जरूरी
हल्दी को प्राकृतिक औषधि माना जाता है, जो शरीर की सूजन को कम करने और इम्युनिटी बढ़ाने में मदद करती है। रात में हल्दी वाला दूध देने से बच्चों की नींद बेहतर होती है। इसके साथ ही रोजाना खेल-कूद और पर्याप्त नींद भी उतनी ही जरूरी है, क्योंकि स्वस्थ दिनचर्या ही मजबूत इम्युनिटी की असली कुंजी है।
निष्कर्ष:
बच्चों की सेहत को मजबूत बनाए रखने के लिए महंगे सप्लीमेंट्स नहीं, बल्कि संतुलित आहार, नियमित दिनचर्या और अच्छी आदतें ही सबसे प्रभावी उपाय हैं। सही पोषण ही बच्चों को बीमारियों से बचाने का सबसे मजबूत आधार है।
नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है।
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आज की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में संतुलित आहार सबसे बड़ी ज़रूरत बन चुका है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि अगर डाइट में पोषक तत्वों से भरपूर चीज़ों को शामिल किया जाए, तो कई बीमारियों से बचा जा सकता है। ऐसे में ड्राई फ्रूट्स में शामिल अंजीर को सेहत के लिए बेहद फायदेमंद माना जाता है।
मीठे स्वाद वाला अंजीर न सिर्फ स्वाद बढ़ाता है, बल्कि इसमें मौजूद पोषक तत्व इसे एक संपूर्ण हेल्दी फूड बनाते हैं। सूखे और ताजे दोनों रूपों में खाया जाने वाला अंजीर फाइबर, कैल्शियम, आयरन, पोटैशियम, मैग्नीशियम और एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर होता है, जो शरीर को कई स्तरों पर लाभ पहुंचाता है।
डाइट में अंजीर क्यों है जरूरी?
पोषण विशेषज्ञों के अनुसार, अंजीर में मौजूद फाइटोन्यूट्रिएंट्स और पॉलीफेनॉल्स शरीर में सूजन को कम करने और कोशिकाओं को नुकसान से बचाने में मदद करते हैं। सीमित मात्रा में इसका रोज़ाना सेवन करने से शरीर को जरूरी माइक्रो और मैक्रो न्यूट्रिएंट्स मिलते हैं, जिससे ओवरऑल हेल्थ बेहतर रहती है।
अंजीर में घुलनशील और अघुलनशील दोनों प्रकार का फाइबर पाया जाता है, जो पाचन तंत्र को दुरुस्त रखने में सहायक है। इसके नियमित सेवन से कब्ज, गैस और अपच जैसी समस्याओं से राहत मिलती है। साथ ही इसमें मौजूद पोटैशियम और एंटीऑक्सीडेंट्स ब्लड प्रेशर को संतुलित रखने और हृदय स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मदद करते हैं।
अंजीर का पानी भी है लाभकारी
आयुर्वेद में अंजीर को विशेष महत्व दिया गया है। विशेषज्ञों के अनुसार, रातभर अंजीर को पानी में भिगोकर सुबह उसका सेवन करने से इसके पोषक तत्व बेहतर तरीके से शरीर में अवशोषित होते हैं। अंजीर का पानी मेटाबॉलिज्म को तेज करता है, आंतों की सफाई में मदद करता है और कब्ज जैसी समस्याओं से राहत दिलाता है।
अंजीर के पानी में मौजूद लैक्सेटिव गुण सुबह पेट साफ करने में सहायक होते हैं। इसके नियमित सेवन से भूख नियंत्रित रहती है, जिससे ओवरईटिंग से बचाव होता है और वजन घटाने में भी मदद मिलती है। इसके अलावा इसमें मौजूद आयरन हीमोग्लोबिन बढ़ाने में सहायक है, जिससे थकान और कमजोरी दूर होती है। महिलाओं में हार्मोनल संतुलन बनाए रखने और हड्डियों को मजबूत करने में भी यह पानी फायदेमंद माना जाता है।
अंजीर खाने के अन्य फायदे
अंजीर कैल्शियम, फॉस्फोरस और मैग्नीशियम का अच्छा स्रोत है, जो हड्डियों को मजबूत बनाता है और ऑस्टियोपोरोसिस के खतरे को कम करता है। इसमें मौजूद विटामिन्स और एंटीऑक्सीडेंट्स इम्युनिटी को मजबूत करने के साथ-साथ त्वचा को भी स्वस्थ बनाए रखते हैं। हृदय स्वास्थ्य के लिहाज़ से भी अंजीर को लाभकारी माना जाता है।
डायबिटीज में अंजीर कितना सुरक्षित?
अंजीर मीठा होने के कारण डायबिटीज मरीजों के मन में इसे लेकर सवाल रहता है। विशेषज्ञों का कहना है कि सीमित मात्रा में सेवन करने पर इसमें मौजूद फाइबर ब्लड शुगर को धीरे-धीरे बढ़ने में मदद करता है, जिससे अचानक शुगर बढ़ने का खतरा कम होता है। हालांकि अधिक मात्रा में सेवन नुकसानदायक हो सकता है।
पोषण विशेषज्ञ नेहा पठानिया के अनुसार, डायबिटीज, लो ब्लड प्रेशर, किडनी स्टोन, इरिटेबल बाउल सिंड्रोम या लेटेक्स एलर्जी से पीड़ित लोगों को अंजीर या इसके पानी का सेवन चिकित्सकीय सलाह के बाद ही करना चाहिए।
नोट: यह लेख डॉक्टरों की सलाह और विभिन्न मेडिकल रिपोर्ट्स पर आधारित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है।
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तेज रफ्तार जिंदगी, बढ़ता तनाव और बिगड़ी दिनचर्या आज लोगों को कई गंभीर बीमारियों की ओर धकेल रही है। इन्हीं में से एक है हाई ब्लड प्रेशर, जो बिना किसी स्पष्ट चेतावनी के शरीर को अंदर ही अंदर नुकसान पहुंचाता रहता है। अधिकांश लोग इसे सामान्य थकान या रोजमर्रा का तनाव मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन यही लापरवाही आगे चलकर जानलेवा साबित हो सकती है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि हाई ब्लड प्रेशर केवल उम्र बढ़ने की बीमारी नहीं है, बल्कि यह हमारी रोजमर्रा की आदतों का नतीजा है। गलत खानपान, शारीरिक निष्क्रियता और मानसिक तनाव धीरे-धीरे रक्तचाप को असंतुलित कर देते हैं। लंबे समय तक बढ़ा हुआ बीपी हृदय, मस्तिष्क और किडनी जैसे अहम अंगों पर गंभीर असर डालता है, जिससे हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
शुरुआत में नहीं दिखते लक्षण, इसलिए बढ़ता है जोखिम
हाई ब्लड प्रेशर की सबसे खतरनाक बात यह है कि इसके लक्षण शुरुआती दौर में बेहद सामान्य होते हैं या कई बार दिखाई ही नहीं देते। इसी वजह से इसे ‘साइलेंट किलर’ कहा जाता है। समय रहते अगर जीवनशैली में सुधार नहीं किया गया, तो यह समस्या जीवनभर साथ चलने वाली बीमारी बन सकती है।
ज्यादा नमक और जंक फूड बन रहे दुश्मन
विशेषज्ञों के अनुसार, अधिक नमक का सेवन बीपी बढ़ने की सबसे बड़ी वजहों में से एक है। सोडियम की ज्यादा मात्रा शरीर में पानी को रोकती है, जिससे रक्त की मात्रा बढ़ जाती है और धमनियों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। जंक फूड, पैकेट वाले स्नैक्स और प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों में नमक छिपे रूप में बहुत ज्यादा होता है। डॉक्टरों की सलाह है कि रोजाना नमक की मात्रा सीमित रखनी चाहिए।
शारीरिक गतिविधि की कमी से बिगड़ता संतुलन
आज की व्यस्त जीवनशैली में घंटों बैठकर काम करना आम हो गया है। शारीरिक गतिविधि की कमी से वजन तेजी से बढ़ता है और दिल को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है। खासतौर पर पेट के आसपास जमा चर्बी हाई बीपी को बढ़ावा देती है। रोजाना हल्की एक्सरसाइज, तेज चाल से चलना या योग करने से रक्त प्रवाह बेहतर होता है और ब्लड प्रेशर नियंत्रण में रहता है।
तनाव और नींद की कमी भी बड़ा कारण
लगातार तनाव में रहना और पूरी नींद न लेना भी हाई ब्लड प्रेशर को बढ़ाता है। तनाव के कारण शरीर में ऐसे हार्मोन सक्रिय हो जाते हैं जो दिल की धड़कन और रक्तचाप को तेज कर देते हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि 7 से 8 घंटे की गहरी नींद और ध्यान-प्राणायाम जैसे उपाय तनाव को कम करने में सहायक होते हैं।
नियमित जांच और सतर्कता ही बचाव का रास्ता
हाई ब्लड प्रेशर से बचने का सबसे कारगर तरीका है समय पर जांच और अनुशासित जीवनशैली। नियमित रूप से बीपी चेक कराना, संतुलित आहार लेना और नशे से दूरी बनाए रखना बेहद जरूरी है। पोटेशियम से भरपूर फल और हरी सब्जियां ब्लड प्रेशर को संतुलित रखने में मदद करती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि आज बरती गई थोड़ी सी सावधानी भविष्य की बड़ी स्वास्थ्य समस्या से बचा सकती है।
नोट: यह लेख विभिन्न मेडिकल रिपोर्ट्स और विशेषज्ञों की सलाह के आधार पर तैयार किया गया है।
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आज के स्मार्टफोन और डिजिटल गैजेट्स के दौर में इयरफोन और हेडफोन हमारी रोजमर्रा की जरूरत बन चुके हैं। कामकाज, पढ़ाई, मनोरंजन या सफर—हर जगह इनका इस्तेमाल आम हो गया है। लेकिन जिस सुविधा ने जीवन को आसान बनाया है, वही आदत अगर लापरवाही से अपनाई जाए तो सुनने की क्षमता के लिए गंभीर खतरा बन सकती है।
तेज आवाज से बढ़ता बहरापन का खतरा
चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि लंबे समय तक तेज आवाज में इयरफोन या हेडफोन लगाने से कान के अंदर मौजूद बेहद संवेदनशील कोशिकाएं क्षतिग्रस्त हो सकती हैं। खासतौर पर 85 डेसिबल से अधिक की आवाज को लगातार सुनना सुनने की शक्ति को धीरे-धीरे कमजोर करता है। इस स्थिति को ‘नॉइज-इंड्यूस्ड हियरिंग लॉस’ कहा जाता है, जो अक्सर स्थायी होती है।
धीरे-धीरे उभरते हैं लक्षण
बहरापन किसी एक दिन में नहीं होता। शुरुआत में कान में भारीपन, सीटी जैसी आवाज, या बातचीत के दौरान शब्द साफ न सुनाई देना जैसे संकेत दिखते हैं। अगर इन चेतावनियों को नजरअंदाज किया गया, तो कम उम्र में ही गंभीर श्रवण समस्या का सामना करना पड़ सकता है।
इयरफोन से कानों को कैसे पहुंचता है नुकसान
इयरबड्स सीधे कान की नली में फिट होते हैं, जिससे ध्वनि और कान के पर्दे के बीच कोई दूरी नहीं रहती। तेज आवाज का सीधा दबाव अंदर मौजूद तरल और नसों को प्रभावित करता है। लगातार ऐसा होने पर सुनने वाली नसें कमजोर हो जाती हैं और सामान्य आवाजें भी अस्पष्ट लगने लगती हैं।
कानों की सुरक्षा का आसान उपाय: 60/60 नियम
विशेषज्ञों की सलाह है कि हेडफोन या इयरफोन का इस्तेमाल करते समय ‘60/60 नियम’ अपनाना चाहिए। यानी, वॉल्यूम को अधिकतम 60 प्रतिशत से ऊपर न रखें और लगातार 60 मिनट से ज्यादा इस्तेमाल न करें। हर घंटे के बाद 10–15 मिनट का ब्रेक देना कानों के लिए जरूरी है, ताकि वे खुद को रिकवर कर सकें।
इयरफोन या हेडफोन—कौन सा बेहतर?
स्वास्थ्य के लिहाज से ओवर-द-इयर हेडफोन को इयरबड्स से थोड़ा सुरक्षित माना जाता है, क्योंकि वे कान के पर्दे से कुछ दूरी पर रहते हैं और बाहरी शोर को भी कम करते हैं। इससे तेज वॉल्यूम की जरूरत कम पड़ती है। हालांकि, गलत इस्तेमाल दोनों ही मामलों में नुकसानदायक हो सकता है।
इन संकेतों को न करें नजरअंदाज
अगर कान में दर्द, झनझनाहट, बार-बार आवाज समझने में परेशानी या बातचीत के दौरान शब्द गुम हो जाने जैसी दिक्कत महसूस हो, तो तुरंत इयरफोन का इस्तेमाल कम करें और विशेषज्ञ से सलाह लें। याद रखें, सुनने की शक्ति एक बार चली जाए तो उसे वापस पाना बेहद मुश्किल होता है।
निष्कर्ष:
डिजिटल दुनिया में रहते हुए तकनीक से दूरी बनाना मुश्किल है, लेकिन थोड़ी सावधानी और सही आदतें अपनाकर हम अपनी सुनने की अनमोल शक्ति को लंबे समय तक सुरक्षित रख सकते हैं।
(यह लेख सामान्य मेडिकल जानकारियों और विशेषज्ञ सलाह पर आधारित है।)
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आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग ऐसी डाइट की तलाश में रहते हैं, जो कम मात्रा में अधिक पोषण दे सके। इसी कड़ी में कीवी फल को सेहत के लिए बेहद लाभकारी माना जा रहा है। पोषण विशेषज्ञों के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति रोजाना एक कीवी का सेवन करता है, तो इससे इम्युनिटी मजबूत होने के साथ-साथ पाचन, हृदय और त्वचा से जुड़ी कई समस्याओं से राहत मिल सकती है। विटामिन और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर कीवी को अब सुपरफूड की श्रेणी में गिना जाने लगा है।
इम्युनिटी मजबूत करने में कारगर
कीवी में भरपूर मात्रा में विटामिन-C पाया जाता है, जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह फल मौसमी सर्दी-खांसी, वायरल संक्रमण और फ्लू से बचाव में मदद करता है। नियमित सेवन से शरीर अंदर से मजबूत बनता है और थकान भी कम महसूस होती है।
प्लेटलेट्स बढ़ाने में सहायक
डेंगू और मलेरिया जैसी बीमारियों के दौरान प्लेटलेट्स कम होने की समस्या आम है। ऐसे समय में डॉक्टर कीवी खाने की सलाह देते हैं। इसमें मौजूद फोलेट और विटामिन-C नई कोशिकाओं के निर्माण में मदद करते हैं, जिससे प्लेटलेट्स का स्तर तेजी से सुधर सकता है।
त्वचा और आंखों के लिए फायदेमंद
कीवी में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स त्वचा को समय से पहले बूढ़ा होने से बचाते हैं। यह झुर्रियों को कम करने और चेहरे पर प्राकृतिक चमक लाने में सहायक है। वहीं, इसमें पाए जाने वाले ल्यूटिन और जेक्सैन्थिन आंखों की रोशनी बनाए रखने और उम्र से जुड़ी दृष्टि समस्याओं से बचाव में मदद करते हैं।
पाचन तंत्र को रखे दुरुस्त
पाचन संबंधी समस्याओं से जूझ रहे लोगों के लिए कीवी काफी लाभकारी माना जाता है। इसमें मौजूद फाइबर और एक्टिनिडिन एंजाइम भोजन को आसानी से पचाने में मदद करता है। इससे कब्ज, गैस और एसिडिटी जैसी समस्याओं में राहत मिल सकती है।
वजन घटाने में भी उपयोगी
कम कैलोरी और अधिक फाइबर होने के कारण कीवी वजन कम करने वालों के लिए एक अच्छा विकल्प है। यह लंबे समय तक पेट भरा होने का एहसास कराता है, जिससे बार-बार खाने की आदत कम होती है और अनहेल्दी स्नैकिंग से बचाव होता है।
हृदय को देता है सुरक्षा
कीवी में पोटेशियम और ओमेगा फैटी एसिड पाए जाते हैं, जो ब्लड प्रेशर को संतुलित रखने और दिल को स्वस्थ बनाए रखने में मदद करते हैं। नियमित सेवन से रक्त संचार बेहतर होता है और हार्ट से जुड़ी बीमारियों का खतरा कम हो सकता है।
निष्कर्ष
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि रोजमर्रा की डाइट में कीवी को शामिल करना एक छोटा लेकिन असरदार बदलाव हो सकता है। यह न केवल शरीर को अंदर से मजबूत बनाता है, बल्कि लंबे समय तक सक्रिय और ऊर्जावान बनाए रखने में भी सहायक है।
नोट: यह लेख विभिन्न स्वास्थ्य विशेषज्ञों और मेडिकल रिपोर्ट्स पर आधारित जानकारियों के अनुसार तैयार किया गया है।
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आज की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में लोग अक्सर पेट की समस्याओं को मामूली समझकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं, लेकिन विशेषज्ञों की मानें तो यही लापरवाही आगे चलकर जानलेवा साबित हो सकती है। हाल के वर्षों में पाचन तंत्र से जुड़े कैंसर, खासतौर पर कोलोरेक्टल यानी बाउल कैंसर के मामलों में दुनिया भर में चिंताजनक बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। इसका सीधा असर स्वास्थ्य सेवाओं पर भी पड़ रहा है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक, कोलोरेक्टल कैंसर दुनिया में तीसरा सबसे आम कैंसर बन चुका है और कैंसर से होने वाली मौतों के मामलों में यह दूसरे स्थान पर है। कुल कैंसर मामलों में इसकी हिस्सेदारी करीब 10 प्रतिशत बताई जाती है। पहले यह बीमारी मुख्य रूप से 50 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में देखी जाती थी, लेकिन अब कम उम्र के लोग भी इसकी चपेट में आ रहे हैं।
आंतों की पुरानी बीमारी बढ़ा सकती है कैंसर का जोखिम
कोलन या कोलोरेक्टल कैंसर बड़ी आंत या मलाशय में विकसित होता है। शौच की आदतों में बदलाव, मल में खून, पेट में लगातार दर्द या ऐंठन जैसे लक्षण इसके शुरुआती संकेत माने जाते हैं। विशेषज्ञों ने हाल ही में चेतावनी दी है कि आंतों से जुड़ी एक आम लेकिन गंभीर बीमारी इस कैंसर के खतरे को कई गुना बढ़ा सकती है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज (IBD) से पीड़ित लोगों में आगे चलकर बाउल कैंसर का खतरा सामान्य लोगों की तुलना में करीब 600 प्रतिशत तक अधिक हो सकता है। IBD के मरीजों में लंबे समय तक आंतों में सूजन बनी रहती है, जो कैंसर के लिए अनुकूल स्थिति बना देती है।
अगर किसी व्यक्ति को बार-बार दस्त या कब्ज, पेट में तेज दर्द, बार-बार शौच जाने की जरूरत या बिना कारण वजन घटने जैसी समस्याएं हो रही हैं, तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। ये IBD के संकेत हो सकते हैं।
विशेषज्ञों की चेतावनी
ब्रिटेन के किंग्स कॉलेज लंदन की न्यूट्रिशन साइंटिस्ट प्रोफेसर सारा बेरी का कहना है कि IBD से पीड़ित लोगों में कम उम्र में ही कोलोरेक्टल कैंसर विकसित होने का खतरा ज्यादा रहता है। उनके अनुसार, आंतों में लंबे समय तक बनी रहने वाली सूजन कैंसर को ट्रिगर कर सकती है।
उन्होंने बताया कि IBD एक अम्ब्रेला टर्म है, जिसके अंतर्गत क्रोहन रोग और अल्सरेटिव कोलाइटिस जैसी बीमारियां आती हैं। ये दोनों ही आंतों को गंभीर नुकसान पहुंचाती हैं और समय के साथ कैंसर का खतरा बढ़ा देती हैं।
भारत में भी बढ़ रहे मामले
भारत में भी बाउल कैंसर के मामलों में लगातार इजाफा हो रहा है। यह देश के टॉप-पांच कैंसर में शामिल हो चुका है। शहरी क्षेत्रों में इसके मामले अधिक सामने आ रहे हैं। वर्ष 2022 में भारत में कोलन कैंसर के 64 हजार से ज्यादा नए मामले दर्ज किए गए, जिनमें 15 से 20 प्रतिशत मरीज 50 साल से कम उम्र के थे।
विशेषज्ञों के अनुसार, मोटापा, शारीरिक गतिविधि की कमी, शराब का सेवन और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स का अधिक उपयोग इस बीमारी के जोखिम को बढ़ाने वाले प्रमुख कारण हैं।
बचाव ही सबसे बेहतर उपाय
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर बाउल कैंसर के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। प्रोसेस्ड फूड्स और मीठे पेय पदार्थों से दूरी बनाना, पेट से जुड़ी समस्याओं को समय रहते गंभीरता से लेना और नियमित जांच कराना इस जानलेवा बीमारी से बचाव में अहम भूमिका निभा सकता है।
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आंखों से धुंधला दिखना अक्सर लोग थकान, मोबाइल स्क्रीन के ज्यादा इस्तेमाल या उम्र बढ़ने का सामान्य असर मानकर टाल देते हैं। कई लोग सीधे चश्मा लगवाने को ही इसका समाधान समझ लेते हैं। लेकिन चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, अचानक या लगातार धुंधला दिखना सिर्फ आंखों की कमजोरी नहीं, बल्कि शरीर में छिपी किसी गंभीर बीमारी का शुरुआती संकेत भी हो सकता है।
डॉक्टरों का कहना है कि आंखें सीधे तौर पर मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र से जुड़ी होती हैं। ऐसे में शरीर के अंदर चल रही कई बीमारियों का असर सबसे पहले आंखों की रोशनी पर दिखाई देता है। खासकर जब बिना किसी स्पष्ट कारण के नजर कमजोर होने लगे, तो यह चेतावनी का संकेत हो सकता है।
डायबिटीज से जुड़ी आंखों की बीमारियां
विशेषज्ञों के अनुसार, धुंधली नजर का एक बड़ा कारण अनियंत्रित डायबिटीज हो सकती है। खून में शुगर का स्तर बढ़ने पर आंखों के लेंस में सूजन आ जाती है, जिससे दिखाई देना धुंधला हो जाता है। लंबे समय तक शुगर कंट्रोल में न रहने पर डायबिटिक रेटिनोपैथी की आशंका बढ़ जाती है। इस स्थिति में रेटिना की बारीक रक्त वाहिकाएं क्षतिग्रस्त हो जाती हैं, जो आगे चलकर स्थायी अंधेपन का कारण बन सकती हैं।
हाई ब्लड प्रेशर और स्ट्रोक का खतरा
हाई ब्लड प्रेशर का असर भी आंखों की नसों पर पड़ता है। डॉक्टर बताते हैं कि अचानक नजर का कम होना, एक आंख से दिखाई न देना या दोहरी छवि दिखना स्ट्रोक का लक्षण हो सकता है। मस्तिष्क के जिस हिस्से से दृष्टि नियंत्रित होती है, वहां रक्त प्रवाह बाधित होने पर यह समस्या सामने आती है। ऐसी स्थिति को मेडिकल इमरजेंसी मानते हुए तुरंत इलाज जरूरी है।
ब्रेन ट्यूमर और तंत्रिका तंत्र की समस्याएं
मस्तिष्क में ट्यूमर या किसी असामान्य वृद्धि के कारण भी आंखों की नसों पर दबाव बन सकता है। इसके चलते धुंधली नजर के साथ तेज सिरदर्द, उलझन, चक्कर आना या उल्टी जैसी शिकायतें हो सकती हैं। इसके अलावा मल्टीपल स्केलेरोसिस जैसी न्यूरोलॉजिकल बीमारियां भी दृष्टि को प्रभावित कर सकती हैं। समय रहते इलाज न मिलने पर नुकसान स्थायी हो सकता है।
डॉक्टरों की सलाह
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि दृष्टि में किसी भी तरह का अचानक बदलाव गंभीरता से लिया जाना चाहिए। नियमित रूप से आंखों की जांच कराने के साथ-साथ ब्लड शुगर और ब्लड प्रेशर की भी निगरानी जरूरी है। संतुलित आहार, विटामिन-ए और ओमेगा-3 फैटी एसिड से भरपूर भोजन आंखों की सेहत के लिए लाभकारी माना जाता है। अगर धुंधली नजर के साथ आंखों में दर्द, जलन या लालिमा हो, तो तुरंत नेत्र विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए।
नोट: यह रिपोर्ट विभिन्न मेडिकल रिसर्च और विशेषज्ञों की सलाह पर आधारित है।
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अक्सर यह माना जाता है कि धूम्रपान न करने वाले लोग फेफड़ों की बीमारियों और कैंसर जैसी घातक समस्याओं से सुरक्षित रहते हैं, लेकिन यह धारणा पूरी तरह सही नहीं है। सिगरेट या बीड़ी न पीने के बावजूद यदि कोई व्यक्ति दूसरे के धुएं के संपर्क में आता है, तो वह भी गंभीर स्वास्थ्य जोखिम झेल सकता है। इसी खतरे को चिकित्सा भाषा में पैसिव स्मोकिंग कहा जाता है, जो धीरे-धीरे शरीर को नुकसान पहुंचाती है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार सिगरेट के धुएं में करीब 7,000 से अधिक जहरीले रसायन पाए जाते हैं, जिनमें से दर्जनों तत्व सीधे कैंसर का कारण बन सकते हैं। यह धुआं लंबे समय तक हवा में बना रहता है, जिससे बंद कमरे, दफ्तर या वाहन में इसका असर और भी खतरनाक हो जाता है।
हृदय और रक्त वाहिकाओं पर तुरंत असर
अध्ययनों से सामने आया है कि पैसिव स्मोकिंग के संपर्क में आने के 30 मिनट के भीतर ही हृदय और रक्त वाहिकाओं पर नकारात्मक प्रभाव शुरू हो जाता है। धुएं में मौजूद निकोटीन और कार्बन मोनोऑक्साइड धमनियों की भीतरी सतह को क्षतिग्रस्त कर देती हैं, जिससे रक्त संचार बाधित होता है। लंबे समय तक संपर्क में रहने से हार्ट अटैक और कोरोनरी हार्ट डिजीज का खतरा 25 से 30 प्रतिशत तक बढ़ सकता है।
फेफड़ों का कैंसर और सांस की बीमारियां
जो लोग स्वयं धूम्रपान नहीं करते, उनमें भी फेफड़ों के कैंसर का एक बड़ा कारण पैसिव स्मोकिंग मानी जाती है। यह धुआं फेफड़ों की संवेदनशील कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाता है, जिससे शरीर में ऑक्सीजन की आपूर्ति प्रभावित होती है। इसके परिणामस्वरूप अस्थमा, ब्रोंकाइटिस और क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (COPD) जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। साथ ही, यह धुआं फेफड़ों की प्राकृतिक सफाई प्रणाली को भी निष्क्रिय कर देता है।
बच्चों और गर्भवती महिलाओं के लिए सबसे ज्यादा जोखिम
चिकित्सकों का कहना है कि पैसिव स्मोकिंग का सबसे गंभीर असर बच्चों और गर्भवती महिलाओं पर पड़ता है। बच्चों के फेफड़े पूरी तरह विकसित नहीं होते, ऐसे में यह धुआं उनके लिए धीमे ज़हर की तरह काम करता है। इसके संपर्क में रहने वाले बच्चों में कान के संक्रमण, निमोनिया और अचानक शिशु मृत्यु सिंड्रोम (SIDS) का खतरा बढ़ जाता है। वहीं गर्भवती महिलाओं में समय से पहले प्रसव और नवजात का वजन कम होने जैसी जटिलताएं देखी गई हैं।
धुआं मुक्त वातावरण ही है बचाव का उपाय
पैसिव स्मोकिंग से बचने का सबसे प्रभावी तरीका धुआं मुक्त माहौल बनाना है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि घर, कार्यस्थल और सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान पर सख्ती से रोक लगाई जाए। परिवार के किसी भी सदस्य को घर के अंदर सिगरेट या बीड़ी पीने की अनुमति न देना स्वास्थ्य सुरक्षा की दिशा में एक जरूरी कदम है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि दूसरे के धुएं को नजरअंदाज करना भविष्य में गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है। समय रहते जागरूकता और सावधानी ही आने वाली पीढ़ियों को स्वस्थ और सुरक्षित जीवन दे सकती है।
नोट: यह लेख विभिन्न मेडिकल रिपोर्ट्स और स्वास्थ्य अध्ययनों पर आधारित है।
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आज के डिजिटल युग में घंटों एक ही मुद्रा में बैठकर काम करना, शारीरिक गतिविधियों की कमी और गलत लाइफस्टाइल ने कमर दर्द को आम लेकिन गंभीर समस्या बना दिया है। पहले यह परेशानी बढ़ती उम्र से जुड़ी मानी जाती थी, लेकिन अब युवा वर्ग भी इसकी चपेट में तेजी से आ रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार गलत बैठने की आदत, अचानक भारी वजन उठाना और नियमित व्यायाम न करना रीढ़ की हड्डी पर अतिरिक्त दबाव डालता है, जिससे मांसपेशियों में सूजन और तेज दर्द शुरू हो जाता है।
चिकित्सकीय भाषा में इसे मस्कुलोस्केलेटल पेन कहा जाता है। यदि समय रहते इसका समाधान न किया जाए तो यह दर्द लंबे समय तक बना रह सकता है और व्यक्ति की रोजमर्रा की गतिविधियों को प्रभावित कर सकता है। हालांकि राहत की बात यह है कि शुरुआती अवस्था में कमर दर्द को घरेलू और प्राकृतिक तरीकों से काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। विशेषज्ञ भी मानते हैं कि सही देखभाल, हल्का व्यायाम और जीवनशैली में बदलाव से बिना दवाओं के भी दर्द से राहत मिल सकती है।
गर्म और ठंडी सिकाई से मिलेगी राहत
कमर दर्द में सिकाई को सबसे प्रभावी उपाय माना जाता है। यदि दर्द किसी ताजा चोट या खिंचाव के कारण हुआ है, तो पहले 48 से 72 घंटे तक ठंडी सिकाई करना फायदेमंद होता है। बर्फ की सिकाई सूजन को कम करने में मदद करती है। इसके बाद गर्म पानी की थैली या हीटिंग पैड का उपयोग मांसपेशियों की जकड़न को खोलता है। गर्म सिकाई से रक्त संचार बेहतर होता है, जिससे दर्द में कमी आती है।
पूरी तरह आराम नहीं, हल्की सक्रियता जरूरी
दर्द होने पर अक्सर लोग पूरी तरह बिस्तर पर आराम करने लगते हैं, लेकिन विशेषज्ञ इसे गलत मानते हैं। लंबे समय तक निष्क्रिय रहने से मांसपेशियां और कमजोर हो सकती हैं। इसके बजाय हल्की सैर, स्ट्रेचिंग या तैराकी को दिनचर्या में शामिल करना चाहिए। योग में भुजंगासन और मर्कटासन जैसे आसन रीढ़ की हड्डी को लचीला बनाते हैं और दर्द को कम करने में सहायक होते हैं। हल्की शारीरिक गतिविधि से शरीर में एंडोर्फिन हार्मोन रिलीज होता है, जो प्राकृतिक रूप से दर्द को कम करता है।
मालिश से मांसपेशियों को मिले आराम
कमर दर्द में सही तेल से हल्की मालिश भी काफी लाभकारी मानी जाती है। सरसों के तेल में लहसुन की कलियां डालकर गर्म किया गया तेल पारंपरिक रूप से असरदार माना जाता है। तिल के तेल से की गई मालिश भी मांसपेशियों के तनाव को कम करती है। ध्यान रहे कि मालिश हमेशा हल्के हाथों से करें और रीढ़ की हड्डी पर सीधा दबाव न डालें।
पोस्चर सुधारना है सबसे जरूरी
विशेषज्ञों के अनुसार कमर दर्द से स्थायी राहत तभी संभव है, जब व्यक्ति अपनी बैठने और उठने की आदतों में सुधार करे। काम करते समय पीठ सीधी रखें, पैरों को जमीन पर टिकाकर बैठें और बहुत नरम गद्दे से बचें। भारी सामान उठाते समय कमर झुकाने के बजाय घुटनों को मोड़ें। छोटे-छोटे बदलाव भविष्य में गंभीर रीढ़ संबंधी समस्याओं से बचा सकते हैं।
नोट: यह लेख विभिन्न मेडिकल रिपोर्ट्स और विशेषज्ञों की सलाह के आधार पर तैयार किया गया है। किसी भी गंभीर या लंबे समय तक बने रहने वाले दर्द की स्थिति में डॉक्टर से परामर्श अवश्य लें।
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