बदलती जीवनशैली और अनियमित खानपान के कारण पेट से जुड़ी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। खासतौर पर कब्ज की शिकायत अब केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं रही, बल्कि युवा वर्ग भी इससे परेशान नजर आ रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार लंबे समय तक कब्ज बने रहने से गैस, एसिडिटी और पेट में भारीपन जैसी समस्याएं रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करती हैं। ऐसे में आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा दोनों में उपयोग होने वाला इसबगोल (इसपघोल) एक सुरक्षित और असरदार विकल्प के रूप में सामने आया है।
इसबगोल की भूसी प्राकृतिक घुलनशील फाइबर से भरपूर होती है, जो पाचन तंत्र को बेहतर बनाने में अहम भूमिका निभाती है। यह आंतों में जाकर पानी को अवशोषित करती है, जिससे मल नरम होता है और मलत्याग की प्रक्रिया सहज बनती है। नियमित और सही तरीके से सेवन करने पर यह कब्ज से राहत दिलाने के साथ-साथ पाचन तंत्र को सक्रिय रखने में मदद करती है।
कैसे करता है काम
स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं कि इसबगोल एक बल्क-फॉर्मिंग फाइबर की तरह कार्य करता है। यह आंतों में जमा अपशिष्ट को बाहर निकालने में सहायक होता है और पाचन क्रिया को प्राकृतिक रूप से संतुलित करता है। इसके उपयोग से आंतों की सफाई बेहतर होती है और पेट से जुड़ी पुरानी परेशानियों में भी धीरे-धीरे सुधार देखा जा सकता है।
सेवन का सही तरीका
इसबगोल का अधिकतम लाभ पाने के लिए इसका सही समय और मात्रा जानना जरूरी है। आमतौर पर रात के समय भोजन के बाद एक चम्मच इसबगोल की भूसी को गुनगुने पानी या दूध में मिलाकर लेने की सलाह दी जाती है। इसे मिलाने के तुरंत बाद पीना चाहिए, ताकि यह ज्यादा गाढ़ा न हो। नियमित सेवन से कुछ ही दिनों में पाचन में सुधार महसूस हो सकता है।
दिल और शुगर के लिए भी फायदेमंद
कब्ज से राहत के अलावा इसबगोल का सेवन हृदय स्वास्थ्य के लिए भी उपयोगी माना जाता है। यह शरीर में खराब कोलेस्ट्रॉल के स्तर को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है। वहीं, यह भोजन के बाद ब्लड शुगर के स्तर को संतुलित रखने में भी सहायक होता है, जिससे डायबिटीज के मरीजों को लाभ मिल सकता है। फाइबर की अधिक मात्रा पेट को देर तक भरा रखती है, जिससे अनावश्यक भूख कम होती है और वजन नियंत्रण में मदद मिलती है।
सावधानी भी है जरूरी
विशेषज्ञों का कहना है कि इसबगोल लेते समय पर्याप्त मात्रा में पानी पीना बेहद जरूरी है। पानी की कमी होने पर यह समस्या बढ़ा भी सकता है। किसी गंभीर बीमारी या लंबे समय से दवाइयों का सेवन कर रहे लोग इसे अपनाने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लें।
नोट: यह जानकारी सामान्य स्वास्थ्य जागरूकता के उद्देश्य से दी गई है। किसी भी प्रकार के उपचार से पहले चिकित्सकीय परामर्श आवश्यक है।
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Thyroid Awareness- आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में थायराइड एक ऐसी बीमारी बन चुकी है, जो धीरे-धीरे शरीर को अंदर से कमजोर कर देती है। गले के निचले हिस्से में मौजूद यह छोटी-सी ग्रंथि शरीर की ऊर्जा, वजन, तापमान और दिल की धड़कन को संतुलित रखने में अहम भूमिका निभाती है। अक्सर लोग गले में हल्का भारीपन या सूजन को मामूली समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, जबकि यही थायराइड असंतुलन का पहला संकेत हो सकता है।
थायराइड ग्रंथि जब जरूरत से ज्यादा हार्मोन बनाने लगती है तो उसे हाइपरथायरायडिज्म कहा जाता है, वहीं हार्मोन की कमी की स्थिति हाइपोथायरायडिज्म कहलाती है। दोनों ही हालात शरीर की सामान्य कार्यप्रणाली को प्रभावित करते हैं। समय रहते इलाज न होने पर यह समस्या हृदय, मानसिक स्वास्थ्य और प्रजनन क्षमता तक पर असर डाल सकती है।
थायराइड से जुड़ा सबसे आम बदलाव वजन में दिखाई देता है। बिना अधिक खाने के वजन बढ़ना हार्मोन की कमी की ओर इशारा करता है, जबकि अचानक वजन कम होना हार्मोन की अधिकता का संकेत हो सकता है। इसके साथ ही दिनभर थकान महसूस होना, सुस्ती और काम में मन न लगना भी इस बीमारी के शुरुआती लक्षण माने जाते हैं।
यह ग्रंथि शरीर के तापमान को नियंत्रित करती है, इसलिए थायराइड बिगड़ने पर किसी को अत्यधिक ठंड लगने लगती है, तो किसी को हल्की गर्मी में भी पसीना आने लगता है। त्वचा का रूखा होना, बालों का तेजी से झड़ना और नाखूनों का कमजोर होना भी इसके आम संकेतों में शामिल है।
थायराइड हार्मोन का सीधा असर दिल और दिमाग पर भी पड़ता है। धड़कन का तेज या धीमा होना, घबराहट, चिड़चिड़ापन, एकाग्रता में कमी और याददाश्त कमजोर होना इसकी पहचान हो सकती है। महिलाओं में पीरियड्स का अनियमित होना भी अक्सर थायराइड असंतुलन से जुड़ा पाया गया है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, अगर गले में सूजन महसूस हो या एक साथ कई लक्षण नजर आएं, तो ब्लड टेस्ट कराना जरूरी है। संतुलित आहार, आयोडीन की पर्याप्त मात्रा और तनाव से दूरी थायराइड को नियंत्रित रखने में मदद करती है। सही समय पर जांच और नियमित इलाज से थायराइड को पूरी तरह कंट्रोल में रखा जा सकता है।
सर्दी का मौसम आते ही खानपान की आदतों में बड़ा बदलाव देखने को मिलता है। ठंड से बचने के लिए जहां लोग गर्म कपड़ों की कई परतें पहनते हैं, वहीं इस मौसम में भूख भी सामान्य से अधिक लगने लगती है। विशेषज्ञों के अनुसार, ठंड के कारण शरीर को अपना तापमान बनाए रखने के लिए ज्यादा ऊर्जा खर्च करनी पड़ती है, जिससे मेटाबॉलिज्म तेज होता है और बार-बार खाने की इच्छा होती है।
सर्दियों में क्यों बढ़ जाती है खाने की चाह
स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं कि सर्दियों में दिन छोटे और रातें लंबी होने से हार्मोनल संतुलन प्रभावित होता है। सेरोटोनिन और मेलाटोनिन जैसे हार्मोन में बदलाव के कारण लोगों में सुस्ती और ‘विंटर ब्लूज’ की स्थिति पैदा हो जाती है। इससे निपटने के लिए अधिकांश लोग हाई कैलोरी, तले-भुने और मीठे खाद्य पदार्थों की ओर आकर्षित हो जाते हैं, जिन्हें आमतौर पर ‘कम्फर्ट फूड’ कहा जाता है।
ओवरईटिंग बन सकती है गंभीर बीमारियों की वजह
हालांकि स्वाद और राहत के चक्कर में की गई ओवरईटिंग सेहत के लिए खतरनाक साबित हो सकती है। यदि इस आदत पर समय रहते नियंत्रण न किया जाए, तो वजन तेजी से बढ़ता है और कई गंभीर बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है, जो आगे चलकर लंबे समय तक परेशान कर सकती हैं।
मेटाबॉलिक सिंड्रोम का बढ़ता खतरा
सर्दियों में शारीरिक गतिविधियां कम हो जाती हैं और कैलोरी का सेवन बढ़ जाता है। इसका सीधा असर वजन पर पड़ता है। पेट के आसपास चर्बी बढ़ने से मेटाबॉलिक सिंड्रोम की आशंका बढ़ जाती है, जिससे फैटी लीवर, जोड़ों में दर्द और चलने-फिरने में परेशानी जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं।
दिल और कोलेस्ट्रॉल पर पड़ता है असर
अधिक तला-भुना और मीठा खाने से शरीर में खराब कोलेस्ट्रॉल (LDL) का स्तर बढ़ जाता है। सर्दियों में नसें पहले से ही संकुचित रहती हैं, ऐसे में बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल धमनियों में रुकावट पैदा कर सकता है। इससे हाई ब्लड प्रेशर, हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। दिल के मरीजों के लिए सर्दियों की ओवरईटिंग खासतौर पर जोखिम भरी मानी जाती है।
डायबिटीज का भी बढ़ सकता है जोखिम
विशेषज्ञों का कहना है कि बार-बार ज्यादा मात्रा में कार्बोहाइड्रेट और शुगर लेने से शरीर में इंसुलिन रेजिस्टेंस विकसित हो सकता है। लगातार इंसुलिन स्पाइक होने से ब्लड शुगर अनियंत्रित हो जाता है, जिससे टाइप-2 डायबिटीज का खतरा बढ़ जाता है। सर्दियों में कई लोगों में शुगर लेवल अचानक बढ़ने के पीछे यही कारण माना जाता है।
सर्दियों में ओवरईटिंग से कैसे बचें
स्वास्थ्य विशेषज्ञ सर्दियों में संतुलित खानपान पर विशेष ध्यान देने की सलाह देते हैं।
डाइट में सूप, सलाद और हरी सब्जियों को शामिल करें, जिससे पेट लंबे समय तक भरा रहे।
पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं, क्योंकि कई बार प्यास को भूख समझ लिया जाता है।
भोजन धीरे-धीरे और अच्छी तरह चबाकर करें, ताकि दिमाग को समय पर पेट भरने का संकेत मिल सके।
स्वाद और पोषण के बीच संतुलन बनाए रखें, ताकि सेहत के साथ सर्दियों का आनंद भी लिया जा सके।
नोट: यह खबर विभिन्न मेडिकल रिपोर्ट्स और विशेषज्ञों की राय के आधार पर तैयार की गई है।
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रसोई में आसानी और सुविधा के नाम पर इस्तेमाल होने वाला एल्युमिनियम फॉयल आज लगभग हर घर का हिस्सा बन चुका है। खाना पैक करना हो, गर्म रखना हो या फिर बेकिंग—हर जगह इसका इस्तेमाल आम है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह आदत धीरे-धीरे सेहत के लिए खतरा बन सकती है, खासकर तब जब गर्म या खट्टे खाद्य पदार्थ सीधे एल्युमिनियम फॉयल के संपर्क में आते हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों और विभिन्न शोध रिपोर्ट्स के अनुसार, एल्युमिनियम फॉयल में रखा या पकाया गया भोजन इसके सूक्ष्म कणों को अपने अंदर सोख सकता है। यह समस्या तब और गंभीर हो जाती है जब भोजन गर्म हो या उसमें नींबू, टमाटर, सिरका और मसाले जैसे अम्लीय तत्व मौजूद हों। ऐसे में एल्युमिनियम भोजन के जरिए शरीर में पहुंच जाता है, जो लंबे समय में स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।
मस्तिष्क और नर्व सिस्टम पर पड़ सकता है असर
एल्युमिनियम को एक न्यूरोटॉक्सिक तत्व माना जाता है। शरीर में इसकी अधिक मात्रा मस्तिष्क की कोशिकाओं पर असर डाल सकती है। कुछ वैज्ञानिक अध्ययनों में यह संकेत मिला है कि मस्तिष्क में एल्युमिनियम का जमाव अल्जाइमर जैसी न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों के जोखिम को बढ़ा सकता है। हालांकि इस पर अभी और शोध की जरूरत बताई जाती है, लेकिन खतरे से इनकार नहीं किया जा सकता।
हड्डियों और किडनी के लिए भी नुकसानदेह
अत्यधिक एल्युमिनियम शरीर में कैल्शियम और फॉस्फोरस के अवशोषण को प्रभावित कर सकता है, जिससे हड्डियों का घनत्व कम होने का खतरा रहता है। इसके अलावा, किडनी को शरीर से अतिरिक्त एल्युमिनियम बाहर निकालने का काम करना पड़ता है। लंबे समय तक अधिक मात्रा में एल्युमिनियम जमा होने से किडनी की कार्यक्षमता पर भी दबाव पड़ सकता है।
गर्म और खट्टे खाने से बढ़ता है रिसाव
विशेषज्ञों के अनुसार, एल्युमिनियम का रिसाव तापमान और भोजन की प्रकृति पर निर्भर करता है। गर्म भोजन या अम्लीय खाद्य पदार्थ जब फॉयल में लपेटे जाते हैं या उसमें पकाए जाते हैं, तो एल्युमिनियम के कण तेजी से भोजन में मिल सकते हैं। बार-बार ऐसा करने से शरीर में इसकी मात्रा धीरे-धीरे बढ़ती जाती है।
क्या हैं सुरक्षित विकल्प
सेहत को सुरक्षित रखने के लिए एल्युमिनियम फॉयल के बजाय कांच, सिरेमिक या स्टेनलेस स्टील के बर्तनों का उपयोग बेहतर माना जाता है। यदि फॉयल का इस्तेमाल जरूरी हो, तो उसमें ठंडा और सूखा भोजन ही रखें। अम्लीय खाद्य पदार्थों को सीधे फॉयल में लपेटने से बचें और पहले बटर पेपर या फूड-ग्रेड शीट का इस्तेमाल करें।
नोट: यह लेख विभिन्न मेडिकल स्टडीज़ और विशेषज्ञों की रिपोर्ट्स पर आधारित है। किसी भी स्वास्थ्य संबंधी बदलाव से पहले डॉक्टर की सलाह अवश्य लें।
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सर्दियों की शुरुआत होते ही बच्चों में सर्दी-जुकाम, खांसी, बुखार और कान दर्द जैसी दिक्कतों के मामले तेजी से सामने आने लगे हैं। डॉक्टरों का कहना है कि ठंड का मौसम संक्रमणों के प्रसार के लिए अनुकूल माहौल तैयार करता है, जिससे छोटे बच्चे सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। उनकी प्रतिरक्षा प्रणाली अभी पूरी तरह विकसित नहीं होती, ऐसे में तापमान में मामूली गिरावट भी उन्हें बीमार कर सकती है।
माता-पिता के लिए यह चिंता का विषय इसलिए भी है क्योंकि इस मौसम में बच्चों की त्वचा रूखी हो जाती है, होंठ फटने लगते हैं और बार-बार सर्दी लगने की समस्या आम हो जाती है। विशेषज्ञ बताते हैं कि ठंड और शुष्क हवा नाक की म्यूकस लाइनिंग को कमजोर कर देती है, जिससे वायरस शरीर में आसानी से प्रवेश कर पाते हैं। साथ ही बच्चे स्कूल और घर जैसे बंद स्थानों में ज्यादातर समय बिताते हैं, जहाँ एक-दूसरे से संक्रमण फैलने की संभावना अधिक होती है।
क्यों बार-बार बीमार पड़ते हैं बच्चे?
बाल रोग विशेषज्ञों के अनुसार, ठंड और शुष्क हवा ऐसे हालात पैदा कर देती है जो वायरस को सक्रिय रखने में मदद करते हैं।
कम तापमान में फ्लू जैसे कई वायरस लंबे समय तक जीवित रहते हैं।
बच्चे बार-बार हाथ-मुंह-नाक को छूते हैं, जिससे संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है।
प्रतिरक्षा प्रणाली विकसित होने की प्रक्रिया में होने के कारण बच्चे वयस्कों की तुलना में ज्यादा संवेदनशील होते हैं।
घरों में लगातार हीटर चलने से हवा सूख जाती है, जो श्वसन तंत्र पर असर डालती है।
सर्दियों में कमजोर हो जाती है इम्यूनिटी
विशेषज्ञ बताते हैं कि सर्दियों में शरीर को पर्याप्त धूप नहीं मिल पाती, जिससे विटामिन-D का स्तर घट जाता है। ठंड के कारण बच्चे बाहर कम खेलते हैं, जिससे शारीरिक गतिविधि कम हो जाती है। यही वजह है कि इस मौसम में इम्यून सिस्टम धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है और बच्चे तेजी से संक्रमण की चपेट में आते हैं।
कैसे रख सकते हैं बच्चों को सुरक्षित?
1. पोषक आहार सबसे जरूरी
फल, सब्जियां और विटामिन-C से भरपूर खाद्य पदार्थ जैसे संतरा, कीवी, अमरूद आदि बच्चों की इम्यूनिटी बढ़ाते हैं। जिंक से भरपूर ड्राई फ्रूट्स और दालें भी संक्रमण से रक्षा करने में मदद करती हैं।
2. नियमित शारीरिक गतिविधि
हल्की एक्सरसाइज या खेलकूद बच्चे के रक्त संचार और प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाते हैं।
3. स्वच्छता के नियम सख्ती से अपनाएं
– हाथ कम से कम 20 सेकंड तक साबुन से धोना
– चेहरे और नाक-मुंह को छूने से बचना
– स्कूल से लौटने के बाद हाथ और चेहरा धोना
छोटे बच्चों के लिए माता-पिता को विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।
4. गर्म कपड़े और सही तापमान का ध्यान रखें
विशेषज्ञ कहते हैं कि ठंड में बच्चों को लेयरिंग में कपड़े पहनाना सबसे प्रभावी तरीका है।
बाहर जाते समय टोपी, दस्ताने और मफलर जरूर पहनाएं।
घर के अंदर हवा अधिक सूखी न हो, इसके लिए ह्यूमिडिफायर का उपयोग फायदेमंद है।
5. सूप और गरम पेय से मिलेगी अतिरिक्त सुरक्षा
अदरक, शहद, तुलसी और लहसुन जैसे प्राकृतिक तत्व वाली चीजें शरीर को गर्म रखती हैं और इम्यूनिटी मजबूत करती हैं।
सर्दियों में गरम सूप, दाल और हर्बल टी बच्चों के लिए बेहद लाभकारी मानी जाती है।
6. नींद पूरी होनी चाहिए
नींद की कमी सीधा इम्यून सिस्टम को प्रभावित करती है। डॉक्टरों के अनुसार:
शिशु: 12–16 घंटे
बच्चे (6–12 वर्ष): 9–12 घंटे
किशोर: 8–10 घंटे
नींद बच्चों की रोज़मर्रा की प्रतिरोधक क्षमता में अहम भूमिका निभाती है।
भीड़भाड़ से दूरी रखें: विशेषज्ञ की सलाह
मौलाना आज़ाद मेडिकल कॉलेज, दिल्ली के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. दीपक कुमार का कहना है कि मौसम बदलते ही बच्चों की दिनचर्या और आहार में छोटे-छोटे बदलाव बहुत ज़रूरी हैं।
वे सलाह देते हैं कि—
बच्चों को गुनगुना पानी दें
पोषण का खास ध्यान रखें
मौसम के अनुसार गर्म कपड़े पहनाएं
घर में बीमार व्यक्ति से बच्चों को दूर रखें
भीड़भाड़ वाले स्थानों पर कम ले जाएं
डॉ. दीपक कहते हैं कि यदि बच्चे लगातार बीमार पड़ रहे हों, तो तुरंत विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए, क्योंकि यह कमजोर प्रतिरक्षा का संकेत हो सकता है।
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सर्दियों के शुरू होते ही तापमान नीचे जाने लगता है और इसके साथ ही सर्दी-जुकाम, वायरल संक्रमण और प्रदूषण से जुड़ी परेशानियाँ भी बढ़ जाती हैं। ऐसे मौसम में शरीर को अंदर से मजबूत रखना बेहद जरूरी हो जाता है। भारतीय खानपान और आयुर्वेद में कई ऐसे प्राकृतिक काढ़े बताए गए हैं, जो शरीर को गर्माहट देने के साथ–साथ रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाते हैं। ये घरेलू नुस्खे न केवल सर्दी के मौसमी संक्रमणों से बचाव करते हैं, बल्कि शरीर को स्वस्थ और ऊर्जावान बनाए रखने में भी मददगार साबित होते हैं।
इन काढ़ों में मौजूद तत्व एंटी-वायरल और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुणों से भरपूर होते हैं, जो शरीर को स्वाभाविक रूप से संक्रमण से लड़ने की क्षमता प्रदान करते हैं। आइए जानते हैं ऐसे पाँच प्रभावी काढ़ों के बारे में, जिन्हें सर्दियों में अपनी दिनचर्या में शामिल करना फायदेमंद है।
तुलसी–अदरक का काढ़ा
तुलसी और अदरक का संयोजन सर्दी-जुकाम में बेहद कारगर माना जाता है। तुलसी के पत्तों में जीवाणुरोधी और वायरस-रोधी गुण पाए जाते हैं, जबकि अदरक सूजन कम करने में सहायक होता है। पानी में तुलसी और कूटा हुआ अदरक उबालकर बनाया गया यह काढ़ा गले की जलन, खांसी और जुकाम में जल्दी राहत देता है और प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है।
हल्दी वाला काढ़ा
हल्दी अपने औषधीय गुणों के लिए जानी जाती है। इसमें मौजूद करक्यूमिन एक शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट है, जो संक्रमण से बचाव में मदद करता है। गर्म दूध या पानी में थोड़ी हल्दी और काली मिर्च मिलाकर उबालने से यह काढ़ा सूजन कम करने, शरीर को गर्म रखने और दर्द से राहत देने में सहायक साबित होता है।
गुड़–अदरक का काढ़ा
सर्दियों में शरीर को गर्म रखने और ऊर्जा बढ़ाने के लिए यह काढ़ा बहुत उपयोगी है। गुड़ आयरन से भरपूर होता है और अदरक शरीर में गर्माहट पहुंचाता है। पानी में गुड़ और अदरक को अच्छी तरह उबालकर तैयार किया गया यह पेय रक्तसंचार सुधरने, थकान दूर करने और कमजोरी कम करने में मदद करता है।
नींबू–अदरक–शहद काढ़ा
यह मिश्रण इम्यूनिटी बढ़ाने के साथ शरीर को डिटॉक्स करने में भी मदद करता है। गर्म पानी में नींबू का रस, शहद और अदरक मिलाकर तैयार किया गया यह पेय विटामिन C प्रदान करता है, गले को आराम देता है और पाचन में भी सुधार करता है। कब्ज और एसिडिटी जैसे लक्षणों में भी यह लाभदायक माना जाता है।
अजवाइन का काढ़ा
अजवाइन में मौजूद थाइमोल कफ को ढीला करने और सांस संबंधी दिक्कतों में राहत देने वाला तत्व है। पानी में अजवाइन और हल्की काली मिर्च उबालकर बनाया गया यह काढ़ा छाती में जमाव, बंद नाक और कफ की परेशानी में उपयोगी है। यह सर्दी के मौसम में श्वसन तंत्र को मजबूत बनाता है।
नोट:
यह लेख सामान्य जानकारी पर आधारित है और किसी भी उपचार का विकल्प नहीं है। किसी भी प्रकार की स्वास्थ्य समस्या या एलर्जी की स्थिति में विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लें।
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How to Add Vitamin B12 in Diet: विटामिन B12 शरीर के लिए उन पोषक तत्वों में शामिल है, जिनकी कमी कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं की जड़ बन सकती है। इसे कोबालामिन भी कहा जाता है और यह लाल रक्त कोशिकाओं का निर्माण, नसों की सुरक्षा और डीएनए बनने की प्रक्रिया के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब शरीर में इसकी मात्रा कम होने लगती है तो हाथ-पैरों में झनझनाहट, लगातार थकान, याददाश्त कमजोर होना और एनीमिया जैसे लक्षण सामने आने लगते हैं।
चूंकि यह विटामिन मुख्य रूप से पशु-आधारित खाद्य पदार्थों में पाया जाता है, इसलिए शाकाहारी और वीगन लोगों में इसकी कमी का खतरा ज्यादा रहता है। लेकिन अच्छी बात यह है कि बी12 की कमी दूर करने के लिए हमेशा महंगे सप्लीमेंट्स पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं पड़ती। हमारे रोजमर्रा के खाने में भी कई ऐसे विकल्प मौजूद हैं, जो इस पोषक तत्व की जरूरत को पूरा कर सकते हैं।
दूध और डेयरी उत्पाद शाकाहारियों के लिए बी12 के सर्वोत्तम प्राकृतिक स्रोत हैं। गाय का दूध, दही, पनीर और छाछ न केवल आसानी से उपलब्ध हैं, बल्कि इनमें बी12 की मात्रा भी काफी अच्छी होती है। फुल-फैट या टोन्ड दूध इस विटामिन के अवशोषण के लिए अधिक फायदेमंद माना जाता है।
मांसाहारी लोगों के लिए अंडा विटामिन बी12 का बेहद प्रभावी और किफायती विकल्प है। इसके अलावा मछली—खासकर सैल्मन और टूना—चिकन और रेड मीट भी इस विटामिन की कमी को तेजी से पूरा करने में मदद करते हैं।
वहीं, वीगन और सख्त शाकाहारी लोग फोर्टिफाइड खाद्य पदार्थों की मदद ले सकते हैं। आजकल बाजार में कई उत्पाद ऐसे उपलब्ध हैं, जिनमें बी12 को अतिरिक्त रूप से मिलाया जाता है—जैसे फोर्टिफाइड सोया दूध, बादाम दूध, ओट्स और नाश्ते में खाए जाने वाले कई प्रकार के सीरियल।
इसके अलावा न्यूट्रिशनल यीस्ट भी बी12 का एक लोकप्रिय विकल्प बनकर उभरा है। इसे अक्सर वीगन डाइट में चीज जैसा स्वाद देने और पोषण बढ़ाने के लिए शामिल किया जाता है।
यदि टेस्ट में कमी गंभीर पाई जाती है, तो डॉक्टर की सलाह से ही सप्लीमेंट (टैबलेट या इंजेक्शन) शुरू करना चाहिए, क्योंकि केवल आहार के जरिए गंभीर कमी को पूरा करना मुश्किल हो सकता है।
सर्दियों का मौसम अस्थमा से पीड़ित लोगों के लिए हर साल नई चुनौतियां लेकर आता है। तापमान गिरते ही अस्थमा के अटैक का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार ठंडी और शुष्क हवा सांस की नलियों को संकुचित कर देती है, जिससे उनमें सूजन बढ़ने लगती है। इसके अलावा जीवनशैली से जुड़ी कुछ सामान्य गलतियां भी अस्थमा को गंभीर रूप से ट्रिगर करती हैं।
अस्थमा मरीजों की सांस नलियां पहले से ही अत्यंत संवेदनशील होती हैं, ऐसे में हल्का सा ट्रिगर भी तीव्र प्रतिक्रिया उत्पन्न कर सकता है। चिकित्सकों का कहना है कि सर्दियों में इन छोटी-छोटी आदतों पर ध्यान न देने से अस्थमा अनियंत्रित हो सकता है, जो लंबे समय में फेफड़ों को स्थायी क्षति पहुंचाने तक का जोखिम पैदा करता है।
प्रदूषण और संक्रमण बन रहे मुख्य कारक
सर्दियों के महीनों में वायु प्रदूषण तेजी से बढ़ता है, जो अस्थमा के प्रमुख ट्रिगर्स में से एक है। विशेषज्ञों के अनुसार उच्च AQI में बिना मास्क के बाहर निकलना, घर के अंदर धूपबत्ती या मच्छर कॉइल का उपयोग करना फेफड़ों में सीधे सूजन बढ़ाता है। वहीं सर्दी-ज़ुकाम और फ्लू जैसे वायरल संक्रमण भी अस्थमा को गंभीर कर देते हैं।
अचानक तापमान परिवर्तन से बढ़ता जोखिम
ठंड में गर्म कमरे से सीधे बाहर निकलना या बहुत गर्म पानी से नहाकर तुरंत ठंडी हवा में जाना सांस नलियों को झटका देता है, जिससे अटैक का खतरा बढ़ जाता है। डॉक्टर सलाह देते हैं कि बाहर निकलते समय नाक और मुंह को स्कार्फ या मास्क से ढकना जरूरी है।
इन्हेलर और दवाओं में अनियमितता से स्थिति बिगड़ती है
अस्थमा से पीड़ित कई लोग लक्षणों में सुधार महसूस होते ही निवारक इन्हेलर या नियमित दवाओं का उपयोग कम कर देते हैं। विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि ऐसा करने से फेफड़ों की सूजन फिर से बढ़ सकती है और मामूली प्रदूषण या ठंड भी गंभीर अटैक का कारण बन सकती है।
कम पानी पीना और व्यायाम की कमी भी हानिकारक
सर्दियों में पानी का सेवन कम होने से डिहाइड्रेशन होता है, जिससे बलगम गाढ़ा होकर सांस की नलियों में जमने लगता है। घर के अंदर हल्का व्यायाम, योग या वॉक न करने से फेफड़ों की क्षमता भी प्रभावित होती है।
नोट: यह रिपोर्ट मेडिकल रिसर्च और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह के आधार पर तैयार की गई है।
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आज की डिजिटल लाइफस्टाइल में स्मार्टफोन लोगों की दिनचर्या का सबसे बड़ा हिस्सा बन गया है। यही कारण है कि कई लोग टॉयलेट पर भी फोन लेकर बैठ जाते हैं—जहाँ वे मिनटों का काम घंटों तक खींच देते हैं। चिकित्सकों के मुताबिक यह seemingly harmless आदत अब स्वास्थ्य के लिए खतरा बन चुकी है। अमेरिका स्थित बेथ इजराइल डिकॉनेस मेडिकल सेंटर द्वारा की गई एक नई स्टडी ने बताया कि टॉयलेट सीट पर बैठकर स्मार्टफोन चलाना पाइल्स (हेमोरॉयड्स) के बढ़ते मामलों का बड़ा कारण बन रहा है।
पाइल्स एक ऐसी स्थिति है जिसमें गुदा क्षेत्र की नसों में सूजन आ जाती है, जिससे दर्द, खुजली और कभी-कभी रक्तस्राव तक हो सकता है। शोध के अनुसार, अकेले अमेरिका में हर साल करीब 40 लाख लोग इस समस्या के कारण डॉक्टर के पास पहुंचते हैं। नई स्टडी में पाया गया कि स्मार्टफोन उपयोग की वजह से लोग टॉयलेट में जरूरत से ज्यादा देर बैठे रहते हैं, जिससे गुदा क्षेत्र पर लगातार दबाव पड़ता है और जोखिम बढ़ जाता है—विशेषकर युवा वर्ग में।
स्टडी का निष्कर्ष: स्मार्टफोन यूजर्स में 46% तक बढ़ा खतरा
125 वयस्कों पर किए गए सर्वे में यह सामने आया कि 66% प्रतिभागी टॉयलेट पर फोन इस्तेमाल करते हैं। इन लोगों में पाइल्स का खतरा उन लोगों की तुलना में 46% अधिक पाया गया जो टॉयलेट में फोन नहीं ले जाते। यह विश्लेषण उम्र, फाइबर सेवन और शारीरिक गतिविधि जैसे कारकों को ध्यान में रखकर किया गया।
समस्या फोन नहीं, टॉयलेट पर बढ़ता समय
अध्ययन के अनुसार, असली समस्या है—अनावश्यक रूप से टॉयलेट पर लंबे समय तक बैठना। विशेषज्ञों का कहना है कि फोन स्क्रॉल करते-करते व्यक्ति यह भूल जाता है कि वह टॉयलेट पर बैठा है। इससे गुदा क्षेत्र के ऊतकों और नसों पर दबाव बढ़ जाता है, जो पाइल्स जैसी समस्या को जन्म देता है।
सोशल मीडिया स्क्रॉलिंग बनी मुख्य वजह
सर्वे में प्रतिभागियों ने बताया कि टॉयलेट पर किए जाने वाले कामों में सबसे आम हैं:
सोशल मीडिया स्क्रॉल करना
न्यूज़ या आर्टिकल पढ़ना
ये आदतें अनजाने में टॉयलेट टाइम को कई गुना बढ़ा देती हैं, जिससे जोखिम और बढ़ जाता है। स्टडी के शोधकर्ता बताते हैं कि यह परिणाम भविष्य में चिकित्सकीय सलाह और बचाव उपाय तय करने में मददगार होंगे।
कैसे बचें इस जोखिम से—विशेषज्ञों की सलाह
टॉयलेट पर 5–10 मिनट से ज्यादा न बैठें
फोन को बाथरूम में न ले जाएं
डाइट में फाइबर और पानी की मात्रा बढ़ाएं
नियमित व्यायाम करें
कब्ज से बचने की कोशिश करें
इन उपायों से टॉयलेट पर समय स्वतः कम होगा और पाइल्स का खतरा भी काफी घटेगा।
नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्ट्स और विशेषज्ञ अध्ययन पर आधारित है।
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पेट दर्द को अक्सर लोग सामान्य गैस, अपच या खानपान की गड़बड़ी का परिणाम समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन हर बार होने वाला पेट दर्द उतना सामान्य नहीं होता। कई बार यह दर्द शरीर के भीतर चल रही गंभीर समस्याओं का शुरुआती संकेत हो सकता है, जिन पर समय रहते ध्यान न दिया जाए तो स्थिति खतरनाक भी बन सकती है। पेट वह केंद्र है जहां लिवर, किडनी, पित्ताशय, अग्न्याशय और आंत जैसे कई महत्वपूर्ण अंग मौजूद होते हैं, इसलिए इनमें किसी भी तरह की गड़बड़ी पेट दर्द के रूप में दिखाई दे सकती है। ऐसे में जरूरी है कि व्यक्ति दर्द की प्रकृति को समझे और समय पर चिकित्सकीय सलाह ले।
1. पित्ताशय में पथरी का संकेत
अगर पेट के ऊपरी दाहिने हिस्से में अचानक तेज दर्द उठे, जो तली-भुनी या भारी चीजें खाने के बाद बढ़ जाए और दर्द कंधे या पीठ तक पहुंचने लगे, तो यह पित्ताशय की पथरी की ओर इशारा करता है। पथरी जब पित्त नलिकाओं में फंस जाती है, तो तीव्र दर्द के साथ मतली और उल्टी भी हो सकती है। ऐसे मामलों में तुरंत चिकित्सा जरूरी है।
2. अपेंडिसाइटिस और आंत्र संबंधी रोग
नाभि के आसपास महसूस होने वाला दर्द यदि धीरे-धीरे दाहिने निचले हिस्से की ओर बढ़कर तेज हो जाए, तो यह अपेंडिसाइटिस हो सकता है—जो एक मेडिकल इमरजेंसी है और त्वरित सर्जरी की मांग करता है।
इसके अलावा, लंबे समय तक लगातार दस्त, कब्ज, या पेट में ऐंठन रहना इर्रिटेबल बाउल सिंड्रोम (IBS) या इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज (IBD) जैसी गंभीर आंत्र बीमारियों का लक्षण हो सकता है।
3. किडनी स्टोन और पेट के अल्सर का दर्द
तेज, लहरों जैसा और कमर से पेट की ओर फैलने वाला दर्द किडनी स्टोन की ओर संकेत करता है। यह दर्द बेहद तीव्र हो सकता है और कई बार पेशाब में जलन या खून के साथ भी दिखाई देता है।
इसके विपरीत, पेट के ऊपरी हिस्से में खाली पेट बढ़ने वाला जलनयुक्त दर्द अक्सर पेट के अल्सर का लक्षण होता है, जिसे अनदेखा करने पर स्थिति बिगड़ सकती है।
4. कब तुरंत डॉक्टर से मिलें?
यदि पेट दर्द के साथ इनमें से कोई लक्षण दिखे, तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लें:
तेज बुखार
उल्टी में खून
मल या पेशाब में खून
लगातार दस्त
अचानक वजन घटना
दर्द का लंबे समय तक बना रहना
सामान्य अपच से होने वाला दर्द जल्द ठीक हो जाता है, लेकिन लगातार या असहनीय दर्द शरीर में किसी गंभीर समस्या की चेतावनी है, जिसे अनदेखा करना खतरनाक साबित हो सकता है।
नोट:
यह लेख चिकित्सकीय रिपोर्टों और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है।
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