लेख

कोरोना काल, गांधी जी का ग्राम स्वराज और आम नागरिक की भूमिका

  • सुयश त्यागी
    स्वतंत्र पत्रकार व लेखक

कोरोना संक्रमण की बढ़ती रफ्तार से ना केवल भारत अपितु सम्पूर्ण विश्व एक गंभीर संकट झेल रहा है। भारत में पिछली लहर के मुकाबले इस लहर से संकट कई अधिक गहरा गया है। संकट गहराने की मुख्य वजह संक्रमण का शहरों के साथ ग्रामों की ओर रुख करना है। लगातार बढ़ते मरीजों के अनुपात में बढ़ती स्वास्थ्य जरूरतों का एक बड़ा अभाव समाज में दिखता है। शासन प्रशासन की पुरजोर कोशिशों के बाद भी शहरों से लेकर ग्रामों तक नागरिकों की पीड़ा उमड़ रही है।

महामारी के प्रकोप से चरमराती व्यवस्था में भारत के अनेक ग्रामों से नागरिकों का शासन से प्रश्न उठना जायज है, पर उन उठते प्रश्नों में गांधी जी की ग्राम स्वराज की अवधारणा से फलीभूत नागरिकों से भी कुछ प्रश्नों का स्वतः समरण हो उठता है। गांधी जी का मानना था भारत का विकास यहां के ग्रामों को केंद्र में रखे बिना संभव नही। उनका चिंतन ग्रामों का भौतिक रूप से पुनर्निर्माण का नही अपितु उन्हें आत्मनिर्भर बनाना था।

कोरोना संक्रमण शहरों की तरह ग्रामों में भी तेजी से पांव पसार रहा है, वहां की स्वास्थ्य सुविधाओं का शहरों से मुकाबला करना ही एक बेमानी सी होगीl गांधी जी की ग्राम स्वराज के माध्यम से ग्राम में निवासरत प्रत्येक ग्रामवासी की भारत के शासन में कैसे सहभागिता हो इसकी कल्पना थी, पर वर्तमान परिदृश्य में वो कल्पना अधूरी सी प्रतीत होती है।

आज हर दूसरा व्यक्ति स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार के लिए राज्य से लेकर केंद्र सरकार तक दोषारोपण करता है। बड़े नेताओं को सड़कों पर कोसता है, किंतु स्वयं के कर्तव्यों का विश्लेषण नहीं करता। अपने दायित्व का कभी बोध नही करता। प्रश्न भी तब करता है, जब बात हाथ से निकल चुकी होती है और उसके वो प्रश्न समाज में एक तनाव, अराजक व नकारात्मक वातावरण की स्तिथि उत्पन्न करने के सिवाय कुछ बड़ा बदलाव नही कर पाते।

उसे कभी स्वयं के मूलभूत अधिकारों की भी विवेचना करनी चाहिए कि उसने अपने ग्राम में होने वाली ग्राम सभाओं में कितनी बार ग्राम के विकास की योजना में सहभागिता ली होगी? कितनी बार अपने ग्राम के सरपंचों से वहां के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों या विद्यालयों की स्थिति पर ध्यान केंद्रित करवाया होगा? कितनी बार वहां पर साक्षरता, स्वच्छ्ता, कोरोना से बचने के लिए जनजागरण जैसे मुद्दों को उठाया होगा? कितनी बार वहां के विकास कार्य, निर्माण कार्य में लगी राशि का जनपद और खंड कार्यालयों में जाकर सत्यापन करवाया होगा? कितनी बार उसने ग्राम में कार्य कर रहे शासकीय कर्मचारियों से काम को गंभीरता व समय के पाबंदी से करने का आग्रह किया होगा?

आखिर करे भी तो क्यों! हर कार्यरत्त व्यक्ति ग्राम स्तर पर उसका कहीं ना कहीं परिचित या रिश्तेदार ही होगा। अपने आस-पड़ोस ग्राम और शहर का हाल देख वो पीड़ित भी होता है और लोगों की जवाबदेही तय करने से भी डरता है। हालांकि गलती उसकी भी नही है, ये मानव स्वभाव होता ही ऐसा है, अपनी व समाज की गलतियों को दूसरों पर मढ़ने के लिए हमेशा व्यक्ति सॉफ्ट टारगेट ही चुना करते हैं। गांव में बैठा कोई व्यक्ति राज्य के मुख्यमंत्री या देश के प्रधानमंत्री को कोस कर अपनी कुंठा निकाल लेगा, जमघट लगाकर उसकी निंदा कर लेगा, किंतु स्थानीय स्तर पर जायज लोगों से कभी प्रश्न नही करेगा और ना ही कभी कोई बड़ा बदलाव ला पायेगा।

वो गांव के पंच, सरपंच, जनपद और प्रतिनिधियों से संवाद नही करेगा। उनका उपयोग शायद वो बस अपने घर में होने वाले सामाजिक कार्यक्रमों में शोभा बढ़ाने के लिए ही करेगा। उसे अपने गांव के विकास से ज्यादा इस बात की चिंता रहेगी कि जनप्रतिनिधि सबसे पहले उसके घर पर आकर विराजमान हो, जिससे उसका व उसके परिवार का उसके गांव व आसपास के क्षेत्र में सम्मान बढ़े।

वो परिवर्तन जरूर लाना चाहता है पर उसका वो परिवर्तन सिर्फ विचारों तक ही सीमित है। जब बात वास्तविकता के धरातल पर आएगी तो प्रश्न कभी उसके परिजन पर उठेंगे तो कभी उसके परिचितों पर, जिससे उसकी क्रांति क्षणभर में शून्य होकर अधूरी रह जाएगी। उसे दूसरों राज्य में या किसी शहर में हुए चुनाव दिखेंगे। हरिद्वार में हुआ कुंभ दिखेगा, पर जब वो उनका असर अपने ग्राम पर देखेगा तो उसे दिखेगा की वहां ना अभी चुनाव थे, ना ही कुंभ और ना उन कारणों से वहां संक्रमण फैला, फिर आखिर क्यों उस ग्राम में ऐसी परिस्तिथि का निर्माण हो गया। मूल बात को छोड़कर वो हर अनर्गल बात करेगा, स्वयं तो भ्रमित बैठा ही है दूसरों को भी निरंतर भ्रमित करेगा।

अगर वास्तव में आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी ग्रामों में जमीनी स्तर पर ऐसे बड़े बदलाव आये होते तो यकीनन उनका असर आज ऊपर तक दिखता। वास्तविकता में क्क्त अभी खामियां निकालने की नहीं, ग्राम स्तर से लेकर केंद्र स्तर तक एकजुट होकर इस महामारी से लड़ने का है। आज इस महामारी से पीड़ा की घड़ी में जिला अस्पताल और ब्लॉक स्तर पर बने अस्पतालों की व्यस्तता किसी से छुपी नही है। ऐसे में इस देश में कितने ऐसे गांव होंगे जिन्होंने स्वयं के क्वारंटाइन सेन्टर निर्मित किए होंगे?

प्रदेश और देश की चुनी हुई सरकार आपकी है, तो आपके ग्राम, आपके क्षेत्र का चुना हुआ सरपंच या प्रतिनिधि भी आपका ही है। वहां अनेक-अनेक दायित्वों पर बैठे विभिन्न अधिकारी भी आपके ही हैं, जिनसे सवाल जवाब करना ना सिर्फ आपका अधिकार है, अपितु गांव व क्षेत्र के समग्र विकास के लिए आपका कर्तव्य भी है। बहरहाल, जिस दिन ग्रामों की सहभागिता जब कार्य योजना में बढ़ेगी तो गांधी जी की 150वी जन्मशताब्दी पार चुका भारत और उसे आत्मनिर्भर बनाने का संकल्प लिए देश के वर्तमान प्रधानमंत्री का स्वप्न वास्तव में सच हो जाएगा।

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