बारिश और अंधेरे के कारण हुई दो बाइकों की आमने-सामने टक्कर
विकासनगर। यमुनोत्री हाईवे पर बंशीपुर के पास देर रात दो बाइकों की आमने-सामने की टक्कर में तीन युवकों की मौत हो गई, जबकि दो अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए। मृतकों की पहचान लंबरपुर बरोटीवाला निवासी वेदांश (20), आसन पुल वार्ड नंबर-8 निवासी धोनी कश्यप (20) और हरबर्टपुर विवेक विहार निवासी रमनदीप (17) के रूप में हुई है।
सूचना पर पहुंची पुलिस ने सभी घायलों को एंबुलेंस से अस्पताल भिजवाया। हरबर्टपुर अस्पताल में इलाज के दौरान वेदांश और धोनी की मौत हो गई, जबकि रमनदीप को धूलकोट स्थित निजी अस्पताल रेफर किया गया, जहां उसने दम तोड़ दिया। वहीं आसनपुल निवासी विवेक कश्यप और शाहपुर कल्याणपुर निवासी अंकित गंभीर हालत में भर्ती हैं।
वरिष्ठ उप निरीक्षक ने बताया कि घटना के दौरान बारिश हो रही थी और घटनास्थल पर अंधेरा था। उन्होंने बताया कि घटना की जांच की जा रही है।
सामाजिक समरसता सहभोज कार्यक्रम में शामिल हुई कैबिनेट मंत्री
हल्द्वानी: कैबिनेट मंत्री रेखा आर्य ने विकास के लिए सामाजिक समरसता को आवश्यक बताया। रेखा आर्य ने रविवार को हल्द्वानी के गौलापार स्थित पर्वत पब्लिक स्कूल में आयोजित सामाजिक समरसता सहभोज कार्यक्रम में हिस्सा लिया।
कार्यक्रम में पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने कहा कि समाज को जोड़ना सभी की जिम्मेदारी है।

मुख्य अतिथि कैबिनेट मंत्री रेखा आर्या ने कहा कि सामाजिक समरसता हर युग की आवश्यकता रही है और मौजूदा समय में केंद्र और राज्य की भाजपा सरकारों ने अपनी नीतियों के जरिए सामाजिक समरसता को धरातल पर उतारने का काम किया है।
रेखा आर्या ने कहा कि बाबा साहब भीमराव अंबेडकर जी द्वारा रचित संविधान मूलत सामाजिक समरसता स्थापित करने वाला ग्रंथ है और हम सभी को हर तरह के भेदभाव को अस्वीकार करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि महिला सशक्तिकरण की विभिन्न योजनाओं और समान नागरिक संहिता के जरिए प्रदेश सरकार ने महिलाओं से हो रहे भेदभाव को दूर करके सामाजिक समरसता कायम की है।
इस अवसर पर जिलाध्यक्ष प्रताप बिष्ट, विधायक मोहन सिंह बिष्ट, जिला पंचायत अध्यक्ष दीपा दरम्वाल , मेयर हल्द्वानी गजराज सिंह बिष्ट, मुकेश वोरा, शंकर कोरंगा, भगवान गिरी महाराज, दीप्ति रावत, आनन्द दरम्वाल , सुरेन्द्र लोटनी, पान सिंह मेवाड़ी, बचे सिंह आदि उपस्थित रहे।
जब बच्चे के नाम की बात आती है तो माता-पिता अक्सर सोच में पड़ जाते हैं कि आखिर कौन-सा नाम सबसे बेहतर होगा। नाम सिर्फ एक पहचान नहीं, बल्कि बच्चे के व्यक्तित्व और भविष्य से भी जुड़ा होता है। इसी वजह से आजकल लोग ऐसे नाम तलाशते हैं जो अनोखे हों, बदलते समय के साथ ट्रेंड में हों और सुनने में भी हटके लगें। तो आइए जानते हैं कुछ ऐसे ही खास और यूनिक नाम, जो इस समय काफी लोकप्रिय हो रहे हैं।
लड़को के कुछ यूनिक नेम्स
1. आरव (शांति)
2. अद्वैत (अनोखा )
3. अथर्व (पवित्र और शुभ)
4. देवांश (दिव्य अंश)
5. एकांश (एकमात्र अंश या पूर्ण)
6. गगन (स्वतंत्रता और दिव्यता का प्रतीक)
7. इन्द्रजीत ( इंद्र को जीतने वाला )
8. ओजस (जीवन शक्ति या उर्जा )
9. विहान (आशा और नई शुरुआत का प्रतीक )
10. विवान (जीवन से भरपूर)
लड़कियों के कुछ यूनिक नेम्स
1. आध्या (माता दुर्गा)
2. अवनि (पृथ्वी)
3. भव्या (माता पार्वती)
4. ईशा (देवी पार्वती)
5. चैताली (चैत्र के महीने में जन्मी)
6. इनाया (भगवान का उपहार)
7. जानवी (माँ गंगा )
8. कश्वी (प्रकाशमान)
9. लीला (दिव्य खेल)
10. नम्रता (विनयशील)
11. ओमिषा (जन्म और मृत्यु की देवी )
12.रचिता (सृजनकर्ता)
13. त्विषा ( उज्जवल)
हर नाम की अपनी एक पहचान होती है। इसलिए जब भी आप कोई नाम चुनें, तो सोच-समझकर चुनें। साथ ही, अपने बच्चों को जीवन की हर चुनौती का सामना करने के लिए तैयार करें। उनमें विनम्रता ज़रूर होनी चाहिए। वे सभी का सम्मान करना और इज़्ज़त देना जानें, यही असली पहचान है।
लम्बे समय से गैरहारिज 56 बाॅण्डधारी डाॅक्टरों की सेवाएं समाप्त
कहा, लापरवाह चिकित्सकों के भरोसे नहीं छोड़ सकते हेल्थ सिस्टम
देहरादून: चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग में 300 और चिकित्सकों की शीघ्र भर्ती की जायेगी। इसके लिये विभागीय अधिकारियों को राज्य चिकित्सा सेवा चयन बोर्ड को अधियाचन भेजने के निर्देश दे दिये हैं। इसके अलावा विभाग में लम्बे समय से गैरहाजिर चल रहे 56 बाॅण्डधारी डाॅक्टरों की सेवाएं समाप्त कर दी गई है। सेवा से बर्खास्त इन चिकित्सकों से मेडिकल काॅलेज को अनुबंध के अनुरूप बाॅंड की धनराशी वसूलने के निर्देश भी दे दिये गये हैं।
सूबे के चिकित्सा स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा मंत्री डाॅ. धन सिंह रावत ने मीडिया को जारी बयान में बताया कि हाल ही में स्वास्थ्य विभाग के अंतर्गत प्रांतीय चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवा संवर्ग में चिकित्साधिकारी (बैकलॉग) के 220 पदों पर डाॅक्टरों की भर्ती की गई, जिनको प्रदेश के सुदूरवर्ती स्वास्थ्य केन्द्रों पर तैनाती भी दे दी गई है। इसके अलावा विभाग में चिकित्सकों के करीब 300 पद रिक्त पड़े हैं। इन पदों पर शीघ्र भर्ती के लिये विभागीय अधिकारियों को रोस्टर तैयार कर उत्तराखंड चिकित्सा सेवा चयन बोर्ड को अधियाचन भेजने के निर्देश दे दिये गये हैं, ताकि चयन बोर्ड समय पर भर्ती प्रक्रिया सम्पन्न कर विभाग को नये चिकित्सक उपलब्ध करा सके।
विभागीय मंत्री ने कहा कि राज्य सरकार प्रदेश में बेहतर हेल्थ सिस्टम तैयार करने में जुटी है, जिसके तहत सरकार सुदूरवर्ती क्षेत्रों की स्वास्थ्य इकाईयों में ढ़ांचागत व्यवस्थाओं से लेकर चिकित्सकों की तैनाती भी कर रही है, ताकि आमजन को निकटतम अस्पतालों में बेहतर उपचार सुनिश्चित किया जा सके। इसके अलावा सरकार ऐसे कार्मिकों को बाहर का रास्ता भी दिखने से गुरेज नहीं कर ही है जो अपनी जिम्मेदारियों के प्रति लापरवाह हैं। इसी क्रम में सरकार ने विगत माह राजकीय मेडिकल काॅलेजों से पासआउट 234 गैरहाजिर बाॅण्डधारी चिकित्सकों के विरूद्ध वसूली के साथ ही बर्खास्तगी की कार्रवाई के निर्देश अधकारियों को दिये थे। जिसके फलस्वरूप गयाब चल रहे 178 चिकित्सकों ने वापस विभाग में ज्वाइनिंग दे दी है। जबकि 56 चिकित्सकों ने अंतिम चेतावनी को नजरअंदाज कर दिया। इन सभी गैरहाजिर 56 चिकित्सकों को बर्खास्त कर दिया गया है, साथ ही निदेशक चिकित्सा शिक्षा को गैरहाजिर सभी चिकित्सकों से बाण्ड की शर्तों के अनुरूप बाण्ड की धनराशि वसूलने के निर्देश भी दिये हैं।
डाॅ. रावत ने बताया कि बताया कि प्रदेश के राजकीय मेडिकल काॅलेजों में एक अनुबंध के तहत छात्र-छात्राओं को न्यूनतम फीस में एमबीबीएस पढ़ाई कराई जाती है। इस अनुबंध के तहत इन छात्र-छात्राओं को एमबीबीएस की पढ़ाई सम्पन्न होने के बाद सूबे के पर्वतीय जनपदों के चिकित्सा इकाईयों में 5 वर्षों की सेवाएं देना अनिवार्य है। ऐसा न करने की स्थिति में इन चिकित्सकों को बाण्ड में निर्धारित धनराशि जमाकर विभाग से एनओसी लेनी होती है, तभी इन्हें इनके शैक्षिक प्रमाण पत्र लौटाये जाते हैं। अनुबंध की शर्तों का पालन न करने पर चिकित्सकों से बांड में निर्धारित धनराशि वसूलने का प्रावधान है।
नशा मुक्ति के संकल्प के साथ युवाओं ने लगाई दौड़ : कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी ने किया मैराथन का शुभारंभ
देहरादून: कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी ने आज परेड ग्राउंड देहरादून में दून यूथ फाउंडेशन द्वारा नशे के खिलाफ थीम पर आयोजित मैराथन का शुभारंभ किया। उन्होंने 10 किमी दौड़ को फ्लैग ऑफ करते हुए युवाओं में उत्साह का संचार किया।
इस अवसर पर मंत्री जोशी ने कहा कि स्वस्थ समाज के लिए प्रत्येक व्यक्ति का निरोगी होना अनिवार्य है। जीवन के सभी सुख और सफलता निरोगी काया से ही संभव हैं। उन्होंने कहा कि स्वस्थ मन, वचन और कर्म के लिए शरीर का तंदुरुस्त होना जरूरी है।

मंत्री जोशी ने युवाओं से “ड्रग्स फ्री उत्तराखंड” का संकल्प लेने का आह्वान किया और कहा कि नशा न केवल व्यक्ति बल्कि पूरे समाज को कमजोर करता है। उन्होंने शारीरिक व्यायाम को दैनिक दिनचर्या का हिस्सा बनाने की सलाह दी और नशे के दुष्प्रभावों के बारे में प्रतिभागियों को जागरूक किया।

कार्यक्रम के अंत में कैबिनेट मंत्री ने मैराथन में विजेताओं को सम्मानित कर उनका उत्साहवर्धन भी किया। इस अवसर पर कैंट विधायक सविता कपूर, सिकंदर, पूनम नौटियाल, गौरव डंगवाल सहित कई लोग उपस्थित रहे।
जौनसार एसटी क्षेत्र नहीं, नेताओं की ठगी से ठगा जौनसार, बेरोज़गारों के हक पर पड़ा डाका – एडवोकेट विकेश सिंह नेगी का खुलासा
राष्ट्रपति के 24 जून 1967 के आदेश का हो रहा खुल्ला उलंघन, जारी हो रहे गैरकानूनी तरीके से ST सर्टिफिकेट – एडवोकेट विकेश सिंह नेगी
देहरादून: आरटीआई एक्टिविस्ट एडवोकेट विकेश नेगी ने दावा किया है कि जौनसार अनुसूचित जनजाति क्षेत्र नहीं है। इस क्षेत्र को कोई एसटी का दर्जा नहीं दिया गया है। उन्होंने कहा कि प्रदेश में महज पांच ही जनजातियां हैं। ऐसे में जौनसार के ब्राह्मण, राजपूत और खस्याओं को आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए। इन जातियों को निर्गत किये गये अनुसूचित जनजाति के प्रमाणपत्र अवैध हैं। एडवोकेट नेगी कहा कि जौनसार के नेताओं वहां की जनता को छला है। इसका खमियाजा प्रदेश के बेरोजगार भुगत रहे हैं। नेताओं की जालसाजी के कारण प्रदेश के सामान्य वर्ग के युवाओं के हकों पर डाका पड़ा है।
“लोकुर समिति रिपोर्ट” के अनुसार
आरटीआई एक्टिविस्ट एडवोकेट विकेश नेगी ने दस्तावेजों के आधार पर कहा है कि जौनसार को अनुसूचित जनजाति का दर्जा हासिल नहीं है। उन्होंने कहा कि 1965 में भारत सरकार द्वारा डेप्लवमेंट ऑफ सोशल सोसायटी दिनांक 25 अगस्त 1965 में बीएन लोकुर की अध्यक्षता में लोकुर समिति का गठन किया गया। इसे सामान्यतः “लोकुर समिति रिपोर्ट” कहा जाता है। भारत सरकार ने 1965 में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की सूची का पुनरीक्षण करने के लिए एक समिति गठित की थी। इस समिति का कार्य था कि 1950 के राष्ट्रपति आदेशों (अनुसूचित जाति आदेश 1950 एंव अनुसूचित जनजाति आदेश 1950) की समीक्षा करे और यह देखे कि किन जातियों/जनजातियों को सूची में शामिल या बाहर किया जाना चाहिए। समिति ने अपने कार्य में भौगोलिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक आधारों पर विचार किया। उत्तर प्रदेश (जिसमें उस समय उत्तराखंड भी सम्मिलित था) के संदर्भ में लोकुर समिति ने स्पष्ट किया कि उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जनजातियों की स्थिति बहुत सीमित है। समिति ने कुछ ही जनजातियों को मान्यता देने की संस्तुति की, क्योंकि बाकी जनसंख्या सामान्य जातियों में आती थी। राष्ट्रपति के 24 जून 1967 के आदेश में उत्तर प्रदेश (वर्तमान उत्तराखंड सहित) के लिए केवल पाँच जनजातियों को अनुसूचित जनजाति घोषित किया गया। 24 जून 1967 के आदेश के अनुसार उत्तर प्रदेश (उत्तराखंड सहित) में केवल पाँच जनजातियाँ (भोटिया, बुक्सा, जनसारी, राजी और थारू) एसटी हैं। अतः राजस्व अधिकारी इन्हीं पाँच जातियों को प्रमाणपत्र जारी करने की अनुशंसा कर सकते हैं।
उत्तराखंड में एसटी के रूप में पाँच जनजातियाँ मान्य
वर्तमान उत्तराखंड के परिप्रेक्ष्य में जब 2000 में उत्तराखंड राज्य बना तो अनुसूचित जनजातियों की वही सूची लागू हुई जो पहले उत्तर प्रदेश में लागू थी। यानी आज भी उत्तराखंड में एसटी के रूप में यही पाँच जनजातियाँ मान्य हैं। बाद में कुछ केंद्र सरकार की समितियों (जैसे कर्मा आयोग, 2002 और अन्य सामाजिक न्याय मंत्रालय की सिफारिशें) ने एसटी सूची विस्तार पर विचार किया, परंतु संसद द्वारा संविधान (अनुसूचित जनजातियाँ) आदेश में संशोधन किए बिना कोई नई जाति इसमें नहीं जुड़ सकती। किसी नई जाति/उपजाति को एसटी मानने के लिए संसद में विधेयक पारित करना आवश्यक है।

ब्राह्मण, राजपूत और खस्याओं को नहीं मिलना चाहिए लाभ-नेगी
राष्ट्रपति के अध्यादेश में स्पष्ट किया गया है कि 24 जून 1967 से पहले जौनसार में रहने वाले ब्राह्मण, राजपूत और खस्याओं को छोड़कर अन्य जौनसर जाति को ही अनुसूचित जनजाति का लाभ मिलेगा। एडवोकेट नेगी के अनुसार अध्यादेश में जानसर टाइपिंग मिस्टेक होने का लाभ उठाते हुए इसे जौनसारी कर दिया दिया गया और इसका लाभ वहां के समस्त लोग उठा रहे हैं। जबकि यह गैर कानूनी है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार को किसी भी क्षेत्र को अनुसूचित जनजाति क्षेत्र घोषित करने का अधिकार नहीं है। सरकार इसके लिए प्रस्ताव बनाकर केंद्र को भेजेगी और यह प्रस्ताव संसद से पास होने के बाद ही राष्ट्रपति को मंजूरी के बाद अस्तित्व में आएगा। उन्होंने कहा कि प्रदेश के नेता इस मामले में जनता को अब तक भ्रमित करते चले आ रहे हैं।
ब्राह्मणों और स्वर्ण राजपूतों को जारी हो रहे हैं सर्टिफिकेट गैरकानूनी
एडवोकेेट नेगी का तर्क है कि 1967 के बाद कोई भी अध्यादेश जारी नहीं किया गया है। इसके अलावा संसद में भी अनुसूचित जनजाति क्षेत्र का कोई विधेयक पारित नहीं हुआ है। आर्टिकल 244 में शेड्यूल पांच और छह में उत्तराखंड को कही भी एसटी का दर्जा नहीं दिया गया है। ऐसे में जौनसार क्षेत्र में जितने भी सर्टिफिकेट ब्राह्मणों और स्वर्ण राजपूतों को जारी हो रहे हैं वो गैरकानूनी हैं। इसका खमियाजा प्रदेश के सामान्य श्रेणी के अभ्यर्थियों को भुगतना पड़ रहा है। आरक्षण के नाम पर जौनसार के नेता जनता को गुमराह कर राजनीतिक रोटियां सेंक रहे हैं।
1982 में तैयार की गई पुस्तिका में दिशा-निर्देश बिस्तार से
भारत सरकार कार्मिक और प्रशासनिक सुधार विभाग गृह मंत्रालय नई दिल्ली द्वारा 1982 में तैयार की गई पुस्तिका (ब्रोशर) विशेष रूप से सरकारी सेवाओं में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण से संबंधित दिशा-निर्देश विस्तार से दिये गये हैं। लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि राज्य में उनका किसी भी प्रकार से कोई पालन नहीं हो रहा है। इसमें कहा गया है कि अनुसूचित जाति/जनजाति का प्रमाणपत्र केवल वही अधिकारी जारी कर सकते हैं जिन्हें राज्य सरकार द्वारा “सक्षम प्राधिकारी” घोषित किया गया है (जैसे उपजिलाधिकारी/तहसीलदार)। प्रमाणपत्र जारी करने से पहले यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि आवेदनकर्ता का नाम/जाति राजस्व अभिलेखों या अन्य प्रामाणिक दस्तावेज़ों में दर्ज हो। राजस्व अधिकारियों की भूमिका लेखपाल, पटवारी, राजस्व निरीक्षक आदि की जिम्मेदारी है कि वे आवेदक के अभिलेखों की पड़ताल करें और यह प्रमाणित करें कि संबंधित व्यक्ति वास्तव में अधिसूचित जाति या जनजाति से संबंध रखता है। दि राजस्व रिकॉर्ड उपलब्ध न हों तो अन्य विश्वसनीय साधनों से जाँच की जाए। प्रमाणपत्र उसी व्यक्ति को मिलेगा जो राष्ट्रपति की अधिसूचना 24 जून 1967 का आदेश में उल्लिखित जाति/जनजाति से संबंध रखता हो और उसी राज्य/क्षेत्र का स्थायी निवासी हो। यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे राज्य में रहता है, तो वहाँ उसे केवल उसी स्थिति में एससी/एसटी माना जाएगा यदि उस राज्य की अधिसूचना में उसकी जाति सूचीबद्ध है।
यह भी बता दें कि संसद में 2003 और 2022 में पूछे गये एक सवाल के जवाब में केंद्र सरकार ने भी माना है कि जौनसार एसटी क्षेत्र नहीं है। उन्होंने लोकसभा में 12 दिसम्बर 2022 को पूछे गये प्रश्न संख्या 786 का हवाला देते हुए कहा कि सरकार ने इसके जवाब में कहा कि पूरे भारत में 700 प्लस अनुसूचित जनजातियां अधिसूचित हैं। सदन में जानकारी दी गयी कि 1967 के बाद भी उत्तराखंड में सिर्फ भोटिया, बुक्सा, जौनसारी, राजी, थारू ही जनजाति हैं और इसमें कोई अन्य नई प्रविष्टि नहीं हुई है। एडवोकेट विकेश नेगी के मुताबिक 2003 में लोकसभा में भी इस संबंध में पूछे गये सवाल में यही उत्तर मिला था। लोकसभा में स्पष्ट कहा गया है कि उत्तराखंड में कोई भी अनुसूचित जनजाति क्षेत्र नहीं है। स्पष्ट है कि जौनसार में रहने वाले ब्राह्मणों और क्षत्रियो को आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए।
यह एक बड़ी राजनीतिक ठगी- विकेश सिंह नेगी
एडवोकेट नेगी के मुताबिक यह एक बड़ी राजनीतिक ठगी है। नेताओं ने जहां एक ओर जौनसार की जनता को ठगकर राजनीतिक सत्ता हासिल की तो वहीं प्रदेश के अन्य योग्य अभ्यर्थियों को सरकारी नौकरी से वंचित रखा। उन्होंने कहा कि जौनसार क्षेत्र को अनुसूचित जनजाति क्षेत्र नहीं कहा जा सकता है और न ही इसे यह दर्जा हासिल है। उन्होंने कहा कि एसटी श्रेणी से मिले सरकारी रोजगार वालों की जांच होनी चाहिए और यह नौकरियां योग्य अभ्यर्थियों को मिलनी चाहिए।
एडवोकेट नेगी ने कहा कि इस मामले की लड़ाई कानूनी रूप से लड़ी जायेगी, जरूरत पड़ी तो पूरे मामले को लेकर हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक जायेंगे। इसके साथ वह जल्द संबंधित विभागों और केंद्र सरकार को भी शिकायत करेंगे, ताकि इस घोटाले की जांच हो सके।
उत्तरकाशी: दयारा बुग्याल में इस वर्ष पारंपरिक अंडुड़ी मेला (बटर फेस्टिवल) धराली आपदा के कारण तय तिथि से 20 दिन बाद आयोजित किया गया। रैथल और आसपास के ग्रामीणों ने परंपरा निभाते हुए दूध-दही, मक्खन की होली खेली और राधा-कृष्ण बने पात्रों ने दही की हांडी फोड़कर उत्सव का शुभारंभ किया।
परंपरा से जुड़ा पर्व
आमतौर पर दयारा पर्यटन समिति और ग्रामीण हर साल भाद्रपद संक्रांति के दिन यह मेला मनाते हैं। सावन में बुग्यालों में मवेशियों के साथ रहने वाले लोग दूध-दही और मक्खन एकत्र करते हैं, जिन्हें बाद में देवताओं और वनदेवियों को भोग स्वरूप अर्पित किया जाता है। इस बार आपदा के कारण केवल गांव के लोगों ने ही सीमित रूप से यह पर्व मनाया।
उत्सव और श्रद्धांजलि
शनिवार को आयोजित मेले में ढोल-दमाऊं की थाप पर ग्रामीणों ने रासो-तांदी किया और क्षेत्र की खुशहाली की कामना की। समिति अध्यक्ष मनोज राणा और सदस्य पृथ्वीराज राणा ने बताया कि आयोजन से पहले शुक्रवार शाम धराली आपदा में मारे गए लोगों की आत्मा की शांति के लिए श्रद्धांजलि सभा रखी गई।
सांस्कृतिक संध्या का आयोजन
मेले के समापन पर रैथल में सांस्कृतिक संध्या आयोजित हुई, जिसमें स्थानीय कलाकारों ने पारंपरिक प्रस्तुतियों से माहौल को भक्तिमय और सांस्कृतिक रंगों से सराबोर कर दिया।
दुबई में आयोजित SIIMA अवॉर्ड्स 2025 इस बार पूरी तरह से पुष्पा 2: द रूल के नाम रहे। निर्देशक सुकुमार की इस फिल्म ने पांच बड़ी कैटेगिरी में जीत हासिल की। कार्यक्रम के सबसे बड़े सरप्राइज में सुकुमार ने मंच से ही घोषणा कर दी कि पुष्पा 3: द रैम्पेज भी जल्द ही बनने जा रही है।
पांच बड़े अवॉर्ड्स एक ही फिल्म के नाम
अल्लू अर्जुन को बेस्ट एक्टर, रश्मिका मंदाना को बेस्ट एक्ट्रेस, सुकुमार को बेस्ट डायरेक्टर, देवी श्री प्रसाद को बेस्ट म्यूजिक डायरेक्टर और शंकर बाबू कंदुकुरी को बेस्ट प्लेबैक सिंगर (मेल) का सम्मान मिला। लगातार तीसरी बार SIIMA अवॉर्ड जीतने के बाद अर्जुन ने सोशल मीडिया पर लिखा – “यह मेरे डायरेक्टर, टीम और सबसे बढ़कर फैन्स के लिए है।”
पुष्पा 3 की आधिकारिक घोषणा
अवार्ड फंक्शन के दौरान होस्ट ने मजाकिया अंदाज में पूछा – “पार्टी नहीं है पुष्पा? और क्या तीसरा पार्ट बनेगा?” इस पर सुकुमार ने अर्जुन और प्रोड्यूसर की ओर देखकर हंसते हुए कहा – “बिल्कुल, पुष्पा 3 आ रही है।” यह वीडियो अब सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रहा है।
कमाई के रिकॉर्ड
2021 में आई पुष्पा: द राइज ने 350 करोड़ रुपये की कमाई कर महामारी के दौर में ब्लॉकबस्टर साबित हुई थी। इसके बाद 2024 में रिलीज पुष्पा 2: द रूल ने 1871 करोड़ रुपये की वर्ल्डवाइड कमाई कर नया इतिहास रचा। यह फिल्म तेलुगु सिनेमा की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बनी और ऑल इंडिया स्तर पर सिर्फ दंगल से पीछे रही।
कहानी का अगला अध्याय
पुष्पा 2 का अंत एक बड़े क्लिफहैंगर पर हुआ था, जिसने फैन्स के बीच तीसरे पार्ट की मांग को और बढ़ा दिया। पहले कयास थे कि अर्जुन की व्यस्तता और सुकुमार की अन्य फिल्मों की वजह से पुष्पा 3 शायद टल जाए, लेकिन अब आधिकारिक ऐलान ने दर्शकों की उम्मीदों को पंख दे दिए हैं।
अमृतसर: पंजाब इस समय इतिहास की सबसे भीषण बाढ़ त्रासदी का सामना कर रहा है। अमृतसर जिले के सीमांत गांव दंगई सहित अजनाला क्षेत्र के 45 से अधिक गांवों में चार फीट तक पानी भरा हुआ है। गांव की गलियों से लेकर घरों तक हर तरफ पानी फैला है। सैकड़ों एकड़ फसलें बर्बाद हो चुकी हैं, कई मकान जर्जर होकर मलबे में तब्दील हो गए हैं और ग्रामीण राहत टेंटों में रहने को मजबूर हैं।
गांव दंगई के निवासी दिलबाग सिंह, हरजोत सिंह, सुखदेव सिंह और सुखजीत ने बताया कि उनकी पूरी फसल डूब चुकी है। कारोबार भी चौपट हो गया है। पशुओं में बीमारियां फैल रही हैं और अस्थायी झोपड़े बारिश की मार नहीं सह पा रहे। गांव वालों का कहना है कि चोरी की घटनाओं के डर से वे दिन-रात बेचैनी में हैं।
पूरे पंजाब में तबाही
आपदा की इस घड़ी में अब तक 46 लोगों की जान जा चुकी है। 1.74 लाख हेक्टेयर फसल पूरी तरह बर्बाद हो गई है। सभी 23 जिलों के लगभग 1500 गांव और करीब 3.87 लाख लोग बाढ़ की चपेट में हैं। हजारों परिवार बेघर हो गए हैं और लाखों पशुधन बह चुके हैं।
नदियों का उफान और डैमों का दबाव
रावी, व्यास और सतलुज जैसी नदियों के उफान ने पंजाब में कहर बरपाया है। सामान्य से अधिक बारिश के चलते भाखड़ा, रणजीत सागर, शाहपुरकंडी और पौंग डैम के गेट कई बार खोलने पड़े। इसका सीधा असर पंजाब के निचले इलाकों पर पड़ा। नदियों का जलस्तर बढ़ने से तटबंध कमजोर होकर टूट रहे हैं और पानी गांवों में घुस रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस साल 30 अगस्त तक ही 14.11 लाख क्यूसेक पानी डिस्चार्ज हो चुका था, जबकि 1988 में आई भीषण बाढ़ के दौरान यह स्तर 11.20 लाख क्यूसेक था।
राहत कार्यों में जुटा प्रशासन
अमृतसर, तरनतारन, कपूरथला, पठानकोट, गुरदासपुर, मोगा, फिरोजपुर, फाजिल्का और होशियारपुर जैसे जिलों में हालात गंभीर बने हुए हैं। डीसी साक्षी साहनी के नेतृत्व में सेना, एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, बीएसएफ और स्थानीय प्रशासन की टीमें राहत और बचाव कार्यों में जुटी हैं। प्रभावितों तक दवाइयां, राशन, टेंट और अन्य जरूरी सामग्री पहुंचाई जा रही है। हालांकि ग्रामीणों का कहना है कि मदद अभी भी पर्याप्त नहीं है और पानी घटने के बाद गांवों से मलबा हटाने में महीनों लगेंगे।
देहरादून: आज लगने वाले चंद्रग्रहण के चलते चारों धाम बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री सहित प्रदेशभर के प्रमुख मंदिरों के कपाट निर्धारित समय पर बंद कर दिए जाएंगे। ग्रहण काल के दौरान पूजा-अर्चना और दर्शन पूरी तरह से स्थगित रहेंगे।
बीकेटीसी के मीडिया प्रभारी डॉ. हरीश चंद्र गौड़ ने बताया कि चंद्रग्रहण रविवार रात 9:56 बजे शुरू होगा। सूतक काल नौ घंटे पहले से प्रभावी हो जाने के कारण बदरीनाथ और केदारनाथ धाम के कपाट रविवार दोपहर 12:58 बजे ही बंद कर दिए जाएंगे। इस अवधि में सांयकालीन आरती भी नहीं होगी।
सोमवार से फिर शुरू होंगे दर्शन
ग्रहण समाप्त होने के बाद सोमवार को गर्भगृह की शुद्धि और धार्मिक परंपराओं के निर्वहन के बाद श्रद्धालु पुनः पूजा-अर्चना और दर्शन कर सकेंगे। ज्योतिर्मठ के नृसिंह मंदिर, पांडुकेश्वर स्थित योग बदरी, भविष्य बदरी, पंचकेदार गद्दीस्थल ओंकारेश्वर, विश्वनाथ मंदिर, त्रियुगीनारायण और कालीमठ मंदिर भी ग्रहणकाल तक बंद रहेंगे।
गंगोत्री और यमुनोत्री धाम भी रहेंगे बंद
गंगोत्री धाम मंदिर समिति के सचिव सुरेश सेमवाल ने बताया कि गंगोत्री और यमुनोत्री धाम के कपाट भी सूतक काल से बंद कर दिए जाएंगे। इसी तरह काशी विश्वनाथ मंदिर के महंत अजय पुरी ने कहा कि वाराणसी में भी कपाट सोमवार सुबह तक बंद रहेंगे।
हरिद्वार में दोपहर को ही गंगा आरती
हरिद्वार की हरकी पैड़ी पर रविवार दोपहर में ही गंगा आरती सम्पन्न करा दी जाएगी। इसके बाद मंदिरों के कपाट बंद रहेंगे और सोमवार को पुनः आरती आयोजित होगी।
