मुख्य सचिव ओमप्रकाश ने गुरुवार को सचिवालय में बद्रीनाथ-केदारनाथ पुनर्निर्माण कार्यों की समीक्षा की। मुख्य सचिव ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि केदारनाथ पुनर्निर्माण कार्यों को निर्धारित समय सीमा में पूर्ण कर लिया जाए।
उन्होंने केदारनाथ धाम हेतु लोक निर्माण विभाग द्वारा जुलाई, 2021 के प्रथम सप्ताह तक समुचित स्टाफ की तैनाती किए जाने के निर्देश दिए। उन्होंने मंदाकिनी नदी पर निर्मित सुरक्षा दीवार की सुदृढ़ता एवं वर्तमान स्थिति की जांच रिपोर्ट एक माह के भीतर प्रस्तुत करने के भी निर्देश दिए गए। जिलाधिकारी रुद्रप्रयाग ने बताया कि केदारनाथ में सम्बन्धित व्यक्तियों हेतु भूमिधरी के अधिकार का शासनादेश हो गया है। मुख्य सचिव ने निर्देश दिए कि उनके म्यूटेशन की कार्यवाही भी शीघ्र पूर्ण की जाए।
मुख्य सचिव ओमप्रकाश ने बद्रीनाथ धाम में कराए जाने वाले कार्यों को ससमय प्रारम्भ कर निर्धारित समय सीमा के अंतर्गत कार्यों को पूर्ण करने हेतु कार्य योजना तैयार करने के भी निर्देश दिए। उन्होंने सभी कार्यों में गुणवत्ता पर विशेष ध्यान दिए जाने के भी निर्देश दिए।
इस अवसर पर सचिव अमित नेगी, दिलीप जावलकर, एस.ए. मुरुगेशन, आयुक्त गढ़वाल रविनाथ रमन, वीडियो कान्फ्रेंसिंग के माध्यम से सम्बन्धित जनपदों से जिलाधिकारी सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।
वर्ष 2022 में होने वाले उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में सत्ता बरकरार रखने के लिए प्रदेश भाजपा कोई कोर-कसर नहीं छोड़ना चाहती है। विजय का रोड मैप तैयार करने के लिए पार्टी ने कार्बेट नेशनल पार्क के समीप ढिकुली (रामनगर) में तीन दिवसीय चिंतन शिविर आयोजित किया है। शिविर का औपचारिक उद्घाटन रविवार शाम उत्तराखंड भाजपा प्रभारी दुष्यंत गौतम, सह प्रभारी रेखा वर्मा, मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत, प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक व प्रदेश महामंत्री (संगठन) अजेय कुमार ने किया।
शिविर में प्रदेश भाजपा के कोर ग्रुप के सदस्यों के अलावा सरकार के सभी मंत्रियों की उपस्थिति बनी हुई है। चिंतन शिविर का सबसे महत्वपूर्ण पहलु यह है कि सोमवार को दूसरे दिन भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री (संगठन) बी.एल.संतोष इसमें भाग लेने के लिए सुबह ढिकुली पहुंचे। संतोष दो दिन तक शिविर में भाग लेंगे और उत्तराखंड भाजपा के चिंतन को धार देंगे।
संतोष का एक माह के अंतराल में उत्तराखंड का यह दूसरा दौरा है। चिंतन शिविर में भाग लेने से पहले वे मई माह के अंत में राजधानी देहरादून पहुंचे थे। देहरादून के तीन दिनी दौरे में उन्होंने पार्टी संगठन और सरकार के विभिन्न स्तर के नेताओं के साथ ताबड़तोड़ बैठकें की थीं और सरकार व संगठन की थाह ली। इस दौरान उन्होंने विभिन्न स्तर के नेताओं से एक-एक कर भी मुलाकात की। जो भी उनसे मिला उसे पूरी तन्मयता के साथ और जम कर सुना। उनकी इस कार्यशैली के पार्टी कार्यकर्ता कायल भी हुए।
बोम्माराबेट्टु लक्ष्मीजनार्दन संतोष, जिन्हें बी.एल.संतोष के नाम से जाना जाता है, संगठनात्मक कौशल और रणनीतिक प्रबंधन के माहिर समझे जाते हैं। लो प्रोफाइल रहने के बावजूद संतोष को परदे के पीछे का कुशल रणनीतिकार माना जाता है। माना जा रहा है कि चिंतन शिविर में उनकी उपस्थिति से उत्तराखंड भाजपा के रोड मैप में विविध आयाम जुड़ेंगे।
यहां बता दें कि भाजपा में राष्ट्रीय अध्यक्ष के बाद सबसे प्रभावी भूमिका महामंत्री (संगठन) की होती है। महामंत्री (संगठन) के पद पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रचारक की नियुक्ति होती है। संतोष जुलाई, 2019 में भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री (संगठन) नियुक्त हुए थे।

मूल रूप से कर्नाटक के रहने वाले संतोष ने कैमिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है। इंजीनियरिंग की डिग्री लेने के बाद उन्होंने थोड़ा समय के लिए नौकरी की। मगर उनका मन नौकरी में नहीं रमा। अपना आकर्षक करियर छोड़ कर वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ गए। उन्होंने कर्नाटक के विभिन्न क्षेत्रों में पूर्णकालिक कार्यकर्त्ता के रूप में संघ कार्य किया और अंततः संघ के प्रचारक बन कर अपना पूरा जीवन समाज कार्य के लिए समर्पित कर दिया।
अंग्रेजी, हिंदी, कन्नड़, तमिल अदि भाषाओं के जानकार संतोष वर्ष 2006 में कर्नाटक भाजपा के प्रदेश महामंत्री (संगठन) नियुक्त हुए। वर्ष 2008 में पहले दक्षिणी राज्य कर्नाटक में भाजपा की सरकार के गठन में उनकी भूमिका को भी महत्वपूर्ण माना जाता है। कर्नाटक में उन्होंने अपनी पहचान क्षमता वाले जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता देने वाले के रूप में बनाई। संतोष का ध्यान पार्टी के कमजोर क्षेत्रों और पक्षों पर रहा है।
वर्ष 2014 में संतोष को भाजपा का राष्ट्रीय सह-महामंत्री (संगठन) नियुक्त किया गया और उनके जिम्मे दक्षिण के कई राज्य सौपें गए। उन्होंने केरल जैसे राज्य में पार्टी के विस्तार के लिए महत्वपूर्ण कार्य किया।
आमतौर पर परम्परागत दक्षिण भारतीय धोती और आधे बांह का कुर्ता पहनने वाले संतोष अध्ययनशील प्रवृत्ति के हैं। कहा जाता है की उनकी स्मृति गजब की है। अपने सिद्धांतों के प्रति वे सख्त हैं। विभिन्न मुद्दों पर वे अपनी राय मुखरता के साथ रखते हैं। सोशल मीडिया पर भी वे विभिन्न मुद्दों पर मुखर रहते हैं। वे भाजपा में उस पीढ़ी के नेता हैं, जो तकनीकि प्रेमी हैं। तकनीकि का राजनीति में अधिकतम लाभ कैसे लिया जा सकता है, यह वे बखूबी जानते हैं।

- अजेंद्र अजय
पीवी नरसिम्हा राव, एचडी देवगौड़ा, अशोक गहलोत, राबड़ी देवी, चौधरी बंशी लाल, गिरधर गोमांग समेत कई नेता प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री अथवा मंत्री रहते हुए एक वर्ष से कम समयावधि के बावजूद उप चुनाव लड़ चुके हैं।
पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया और मीडिया के एक हिस्से में यह चर्चा बड़ी तेजी से फैलाई जा रही है कि उत्तराखंड में संवैधानिक संकट की स्थिति पैदा होने वाली है। इस चर्चा में लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम के एक प्रावधान का उल्लेख करते हुए राज्य में संवैधानिक संकट की आशंका जताई जा रही है। आश्चर्य की बात तो यह है कि सोशल मीडिया से उठे इस मुद्दे को प्रदेश के मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने ऐसा लपका मानो उसके हाथ कोई जादुई चिराग लग गया हो।
कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह से लेकर कई अन्य वरिष्ठ नेताओं ने बाकायदा बयान जारी कर सितंबर माह में प्रदेश में संवैधानिक संकट की ज्योतिषीय घोषणा तक कर डाल दी है। कांग्रेस नेताओं ने बयानबाजी करने से पहले इस मुद्दे से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों और कानून के तकनीकि पक्षों को जरा सा भी समझने की कोशिश नहीं की और अनाड़ी व नौसिखिये राजनीतिज्ञों की तरह हो-हल्ला मचाना शुरू कर दिया।
दरअसल, प्रकरण प्रदेश के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत के उप चुनाव को लेकर है। भाजपा नेतृत्व ने विगत 11 मार्च को गढ़वाल लोकसभा क्षेत्र से सांसद तीरथ सिंह रावत को प्रदेश के मुख्यमंत्री की कमान सौंपी थी। संवैधानिक प्रावधानों के तहत उन्हें मुख्यमंत्री के पद पर नियुक्ति से छः माह के भीतर अर्थात आगामी 10 सितंबर तक उत्तराखंड विधान सभा का सदस्य निर्वाचित होना है।
कांग्रेस नेता लोक प्रतिनिधित्व अधिनियमम -1951 की धारा- 151 (क) को मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत के लिए उप चुनाव लड़ने में बाधक बता रहे हैं। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम के भाग- 9 में उप निर्वाचन शीषर्क में संसद के दोनों सदनों और राज्यों के विधान मंडलों में आकस्मिक रिक्तियों के चुनावों को लेकर उपबंध तय किये गए हैं। भाग -9 की धारा -151 (क) में किसी कारण से रिक्त हुई सीट पर छः माह की अवधि के भीतर चुनाव करने का प्रावधान है। यह धारा कहती है कि –
151 क. धारा 147, धारा 149, धारा 150 और धारा 151 में निर्दिष्ट रिक्तियों को भरने के लिए समय की परिसीमा – धारा 147, धारा 149, धारा 150 और धारा 151 में किसी बात के होते हुए भी, उक्त धाराओं में से किसी में निर्दिष्ट किसी रिक्ति को भरने के लिए उप निर्वाचन, रिक्त होने की तारीख से छः मास की अवधि के भीतर कराया जाएगा :
परन्तु इस धारा की कोई बात उस दशा में लागू नहीं होगी, जिसमें –
(क) किसी रिक्ति से संबंधित सदस्य की पदावधि का शेष भाग एक वर्ष से कम है ; या
(ख) निर्वाचन आयोग, केंद्र सरकार से परामर्श करके, यह प्रमाणित करता है कि उक्त अवधि के भीतर ऐसा उप निर्वाचन करना कठिन है।
कांग्रेस द्वारा धारा-151क (क) को आधार बना कर तिल का ताड़ बनाया जा रहा है। कांग्रेस का कहना है कि चूंकि उत्तराखंड विधान सभा के आम चुनावों के लिए एक वर्ष से भी कम का समय रह गया है। लिहाजा, अब उप चुनाव नहीं हो सकते हैं और मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत उप चुनाव नहीं लड़ सकते।
यह सही है कि धारा-151क (क) रिक्ति की पदावधि का शेष भाग एक वर्ष से कम होने पर उप चुनाव की अनुमति नहीं देता है। मगर कोई सामान्य समझ वाला व्यक्ति भी धारा-151क (ख) को देख कर कह सकता है की यह उप चुनाव कराने की पूरी गुंजाइश रखती है। यह सोचने वाली बात है कि यदि गुंजाइश नहीं होती तो 151क (क) के बाद अधिनियम में “या” शब्द जोड़ने का क्या औचित्य था ?
“या” शब्द जोड़ने के बाद 151क (ख) में कहा गया है कि निर्वाचन आयोग, केंद्र सरकार से परामर्श करके, यह प्रमाणित करता है कि उक्त अवधि के भीतर ऐसा उप निर्वाचन करना कठिन है। यानी अगर उप चुनाव नहीं कराने होंगे तो चुनाव आयोग केंद्र सरकार से चर्चा करके बताएगा कि चुनाव कराने में क्या कठिनाई है ?
स्पष्ट है कि किसी विशेष प्रकार की परिस्थितियों के मद्देनजर ही “या” शब्द जोड़ा गया होगा और अधिनियम बनाने वालों ने भविष्य में किसी संभावित समस्या को देखते हुए यह प्रावधान किया होगा। कोई नियम अथवा अधिनियम संवैधानिक संकट पैदा ना हो, इस उद्देश्य से बनाया जाता है, ना कि संकट पैदा करने के लिए। यहां यह स्पष्ट है कि धारा-151 चुनाव आयोग को उप चुनाव नहीं कराने को लेकर किसी प्रकार से बाध्य नहीं करता है। आयोग उप चुनाव करा सकता है।
अब बारी आती है संविधान की। भारतीय संविधान का अनुच्छेद-75(5) बिना किसी सदन की सदस्यता के छः माह तक किसी भी व्यक्ति को केंद्र सरकार में मंत्री अथवा प्रधानमंत्री और अनुच्छेद-164 (4) किसी भी व्यक्ति को प्रदेश का मुख्यमंत्री अथवा मंत्री नियुक्त होने की अनुमति देता है। अर्थात अगर कोई व्यक्ति संसद के किसी भी सदन का सदस्य निर्वाचित हुए बगैर प्रधानमंत्री अथवा केंद्रीय मंत्री बनता है तो, उसे छः माह के भीतर संसद के किसी भी सदन का सदस्य चुना जाना आवश्यक है। इसी प्रकार की बाध्यता मुख्यमंत्री व राज्य के मंत्रियों के लिए भी है। उन्हें विधान सभा अथवा जिन राज्यों में विधान परिषद् है, में से किसी एक सदन का सदस्य निर्वाचित होना आवश्यक है।
यानी बिना किसी सदन के सदस्य हुए बगैर छः माह तक किसी प्रदेश का मुख्यमंत्री, मंत्री या देश का प्रधानमंत्री बनने का किसी भी भारतीय नागरिक को भारतीय संविधान पूरा अधिकार देता है। अब सवाल यह है की क्या किसी मुख्यमंत्री अथवा मंत्री को संविधान प्रदत्त इस अधिकार से कैसे आसानी से वंचित किया जा सकता है ? चुनाव आयोग भी संविधान प्रदत्त अधिकारों को सरंक्षण देते हुए ही अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करता है। तमाम ऐसे उदाहरण हैं जब चुनाव आयोग ने आकस्मिकताओं को ध्यान में रख कर एक वर्ष अथवा छह माह की अवधि से भी कम समय में उप चुनाव कराएं हैं।
चुनाव मामलों की जानकारी देने वाली इलेक्शन लॉज़, प्रैक्टिस एंड प्रोसीजर पुस्तक के अनुसार चुनाव आयोग ने, सुसंगत नीति के मामले में, हमेशा मंत्री के रूप में नियुक्त व्यक्ति को, जो उसकी ऐसी नियुक्ति के समय उपयुक्त विधायिका का सदस्य नहीं है, को संवैधानिक आवश्यकता को पूरा करने का अवसर प्रदान किया है। आयोग ने संबंधित व्यक्ति द्वारा पद ग्रहण करने के छह माह के भीतर उप-चुनाव कराकर मंत्री के रूप में अपनी नियुक्ति के संबंध में मतदाताओं को अपना निर्णय देने का अवसर प्रदान किया है।
पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हाराव, एच.डी. देवेगौड़ा समेत वर्ष 1999 में राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, वर्ष 1997 में बिहार की मुख्यमंत्री राबड़ी देवी, वर्ष 1993 में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री विजय भास्कर रेड्डी एक वर्ष से कम अवधि के दौरान चुनाव लड़ चुके हैं।
वर्ष 1999 में उड़ीसा के तत्कालीन मुख्यमंत्री गिरधर गोमांग ने प्रदेश की अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित लक्ष्मीपुर विधानसभा क्षेत्र से उप चुनाव लड़ा। प्रदेश की लक्ष्मीपुर समेत कुछ अन्य विधान सभा सीटें खाली पड़ीं थीं। राज्य विधानसभा का शेष कार्यकाल उस रिक्ति की तारीख से एक वर्ष से कम के लिए था। मगर चुनाव आयोग ने मुख्यमंत्री की इच्छा को देखते हुए केवल लक्ष्मीपुर विधानसभा क्षेत्र में ही उप चुनाव आयोजित किया।
उड़ीसा की तरह का मामला वर्ष 1987 में हरियाणा में भी सामने आया था। यहां भी उड़ीसा की तरह चौधरी बंशी लाल तोशम विधान सभा क्षेत्र से उप चुनाव लड़े, जबकि यहां भी विधानसभा का कार्यकाल एक वर्ष से कम था और अन्य कुछ सीटें भी रिक्त थीं। मगर चुनाव आयोग ने चौधरी बंशी लाल को उनके संवैधानिक अधिकार की पूर्ति एक ही सीट पर उप चुनाव कराया। इस मामले को किसी ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। मगर कोर्ट ने कोई हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया था। यहां तक कि सर्वोच्च न्यायालय ने भी चुनाव आयोग के उस निर्णय में हस्तक्षेप नहीं किया।
उत्तराखंड के सन्दर्भ में विपक्षी दलों द्वारा विभिन्न न्यायालयों के जिन भी मामलों का उल्लेख किया जा रहा है, वे यहां कतई प्रासंगिक नहीं हैं। उन प्रकरणों की प्रकृति अलग तरह की थी। उत्तराखंड से कुछ अंश मात्र मिलते-जुलते मामलों की चर्चा की जाए तो देखा जा सकता है की सभी न्यायालयों ने सकारात्मक निर्णय ही दिए हैं। न्यायालयों ने चुनाव आयोग के आदेशों में हस्तक्षेप नहीं किया है।
कर्नाटक हाईकोर्ट ने एपी रंगनाथ बनाम मुख्य चुनाव आयोग, 2018 केस में उस याचिका को ख़ारिज कर दिया था, जिसमें लोकसभा सीट पर उप चुनाव के लिए एक वर्ष से थोड़ी ही अधिक अवधि थी। इसमें कोर्ट ने कहा की किसी क्षेत्र को एक वर्ष से अधिक समय के लिए बिना जनप्रतिनिधि के खाली नहीं रखा जा सकता। इस निर्णय का सबसे महत्वपूर्ण पहलु यह था की कोर्ट ने चुनाव आयोग को कहा कि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा-151क की व्याख्या के संबंध में कोई अस्पष्टता उत्पन्न होती है, तो चुनाव सुधार समिति, 1990 की रिपोर्ट का सहारा लिया जाना चाहिए।
ऐसे ही एक मिलते-जुलते मामले प्रमोद लक्ष्मण गुड़धे बनाम भारत निर्वाचन आयोग व अन्य में सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की, कि ऐसी व्याख्या लोकतंत्र के पवित्र सिद्धांत के अनुरूप है कि किसी निर्वाचन क्षेत्र को बिना प्रतिनिधित्व के नहीं रखना है। उप चुनाव पर होने वाले खर्च के संबंध में व्यक्त की गई चिंता को आधार नहीं माना जा सकता। ऐसा इसलिए है क्योंकि लोकतंत्र को निर्वाचित प्रतिनिधियों के द्वारा खुद को बनाए रखना होता है।
Содержание
Мы также собрали данные о том, насколько вырастут зарплаты программистов в 2022 году. Изначально PHP являлся языком функционального программирования. Созданные на нем сценарии представляли собой наборы функций, код которых выполнялся последовательно по мере их вызова. Существенным недостатком такого подхода к реализации приложений является сложность чтения кода и, соответственно, внесения исправлений или добавления функционала в дальнейшем.
В дополнение к Python, наибольшей популярностью среди инженеров программирования пользуются Java, JavaScript, C#, HTML/CSS», — сказал он. Реализация 6-й версии была признана провальной из-за проблем с поддержкой Юникода. В 2014 году было принято решение начать разработку обновленной версии языка, получившей название PHP 7. Значительные изменения в движке позволили добиться существенного прироста производительности и снижения потребления памяти.
От выбора зависит скорость разработки, стоимость, но главное, результативность. Планируется интенсивный трафик клиентов, например, вы хотите открыть интернет-магазин. Библиотека Node.js хорошо документирована и организована. Разработчики имеют мгновенный доступ к узлам пакета, что облегчает использование технологии. Иногда приходится ждать решения ответа на вопросы, но стоит отметить, что хорошие ответы сразу попадают в базу знаний. Выбирая Node или Python с целью дальнейшего масштабирования, стоит отдать предпочтение первому.
Но для внесения правок в материалы или их добавления нужно было дописывать и переписывать эти страницы, что часто вело к тому, что приходилось вручную переделывать весь сайт. Затем ситуацию поправил CSS и клиентские скриптовые языки, которые позволили внести в браузер немного динамики. Появились активное меню, более сложные структуры, «всплывающие» окна и т.д. А автоматическим созданием страниц со стороны сервера занимались CGI-программы (скрипты). Чтобы писать хороший код, недостаточно владеть только языком программирования. По-настоящему крутой и талантливый программист разбирается и в других вещах.
Рейтинг Языков Программирования По Сферам Использования
Месячная минимальная зарплата для квалифицированных рабочих увеличилась до 260 тыс. Прибавка составляет 50% от стоимости жилья и проезда работника в месяц. Форинтов (около 5,2 тыс. грн) на одного работника, а также дополнительных 12 тыс.
Но однозначно можно спрогнозировать, за что будут платить в Украине больше всего в 2022 году. Карьерный рост программиста напрямую зависит от объёма знаний и стремлений. Важно умение работать в команде, владение иностранными языками, усидчивость, упорство и нежелание сдаваться.
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Основные функции SEO и лидогенерации присутствуют даже в самом дешевом плане. Сколько бы в рекламе ни говорили о создании бесплатных сайтов, но в реальности Wix – неплохой, многофункциональный, но далеко не бесплатный сервис. Чтобы помочь вам разобраться с этим богатством вариаций, мы подготовили статью о лучших конструкторах сайтов в 2022 году.
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Это гибкий и безопасный язык программирования, который работает с 1994 года и до сегодня является актуальным. Java – второй в списке популярных языком программирования в 2022 году. По сравнению с другими языками он очень популярный уже достаточно долгое время, поэтому то, что остался востребованным и в новом году – ничего удивительного. Уровень заработной платы программистов, которые работают на Java, всегда был и есть самый высокий среди специалистов.
«Украинцы, которые просят о предоставлении статуса международной защиты, смогут работать в равных с румынами условиях через три месяца после подачи заявления. У них будет право на трудоустройство, а также на социальную помощь и медицинское страхование», — говорит Иван Ромашов, руководитель отдела аналитики в robota.ua. С января минимальная почасовая ставка в Польше выросла до 14,97 злотых «чистыми». «За месяц при минимальной оплате труда можно заработать 2500 злотых (17 тыс. грн). В среднем месяц — это 2800−3800 злотых (19−26 тыс. грн) для низкоквалифицированных рабочих.
Вернее, для фронтэнда применяется Javascript, но так как Node.js работает на Javascript, то все приложение получается на одном языке. Поэтому можно создавать веб-продукты для бизнеса, делать десктопные программы, мобильные приложения, гибридные приложения и даже IoT-инструменты. Сравнивая Node.js vs Python стоит отметить, что второй является языком программирования, а не фреймворком. Он интерпретированный, интерактивный, объектно-ориентированный.
Стоит отметить, что сфера IT сегодня не ограничивается только программистами. Ежегодно появляются десятки новых направлений и профессий на любой вкус. Некоторые выбирают самостоятельное обучение с помощью пособий и прикладных программ. Такие новички следят за развитием отрасли, посещают бесплатные лекции, берут участие в интересных проектах. Специалисты советуют выбирать наиболее востребованный на рынке язык программирования. Например, курсы, которые организуют крупные IT-компании, предлагая ученикам дальнейшую стажировку.
Рейтинг наиболее комфортных языков, то есть таких, которые разработчики при возможности выбрали бы для работы, возглавил Dart. В топе также разместились Clojure, Kotlin, Rust и Swift. В этой категории C# попал на 6-е место, Java — на 10-е, JavaScript — на 17-е. Прежде всего это язык для тех, кто непосредственно работает с продуктами от Microsoft. Язык C Sharp также востребован в игровой разработке, поэтому он и является популярным в 2022 году. PHP – кроссплатформенный, он делает страницы HTML «живыми», плюс является еще и серверным языком и позволяет выполнять команды на удаленном сервере.
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Сегодня он все чаще применяется для создания сложных продуктов с машинным обучением, большими вычислениями. Престижность и востребованность ІТ-профессионалов на рынке труда неоспорима. Тем не менее, не стоит выбирать данную профессию только из-за популярности и высокого дохода. В школьника должна проглядывать склонность к точным наукам, аналитико-синтетический тип мышления, упорство в изучении языков программирования и желание постоянно совершенствоваться.
Это язык программирования с открытыми исходными кодами, над развитием которого работают программисты-энтузиасты со всего мира. Он имеет простой синтаксис, частично похожий на Java и С++. Это постоянно развивающийся проект, на данный момент актуальной является 7-я версия https://deveducation.com/ языка. По статистике, каждый шестой программный продукт создан на PHP. Получение одной профессии раз и на всю жизнь не гарантирует стопроцентный успех в карьере. Мир и технологии меняются настолько быстро, что знания, которые вы получили 10 лет назад сегодня устаревают.
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Потому что этот язык имеет большой набор инструментов, позволяющих расширить возможности продукта. Стандартная библиотека за эти годы обросла большим количеством готовых решений, благодаря чему типовые участки кода можно быстро сформировать. Главная особенность Node.js – использование неблокирующей модели ввода/вывода данных. Как раз за ее счет веб-приложение получается легким, быстрым, продвинутым, и способно работать сразу на нескольких устройствах. Если есть необходимость работать с нескольких компьютеров над одним проектом, реализовать это поможет как раз Node.js.
Даже специалисты с небольшим опытом найдут работу в престижной компании. Трудоустройство – java – один из наиболее востребованных языков, java-разработчик – один из наиболее востребованных специалистов. Две вещи волнующие любого, и о которых не стоит, сильно беспокоится, так как известно, что хороший специалист всегда найдёт работу, а пройдя этот курс с самоотдачей вы очень приблизитесь к этому. С каждым годом курсы программирования становятся все более популярными. Это и не удивительно, ведь сейчас IT-индустрия одно из ведущих направлений в мире. За счет этого айтишники могут создавать и тестировать части кода быстрее и с меньшими затратами.
Эти форматы также можно совмещать с работой или вторым образованием. В 2022 году программирование останется самым популярным и денежным направлением в IT-индустрии. Раньше для получения новой профессии нужно было учиться пять лет, а в современных условиях все нюансы можно усвоить от шести месяцев, в зависимости от программы. Изначально PHP представлял собой Perl/CGI-скрипт, использовавшийся для обработки HTML-шаблонов.
Это язык для быстрого создания GUI приложений для Windows. Где-то слышал, что собираются портировать на Linux, т.к. Дать точный прогноз, какие профессии будут самыми «денежными» через 5-15 лет, сложно.
Чтобы понять, что лучше выбрать для своего бизнеса – Node или Python, необходимо провести сравнение и определить, какая из технологий соответствует критериям. Мы выбрали несколько категорий, по которым стоит сравнивать оба инструмента. Давайте рассмотрим, в каких областях лучше Node.js, а для каких подойдет Python. Shopify – популярный конструктор сайтов, рассчитанный в первую очередь на сервисы электронной коммерции и интернет-магазины. Сегодня Shopify поддерживает более полумиллиона интернет-магазинов по всему миру.
Node.js считается более гибким и подходит для создания креативных решений и нестандартных инструментов для бизнеса. Но если вам нужны обычные, но функциональные модули, решающие бизнес-задачи, можно выбирать Пайтон. Python нуждается во фреймворке для работы бэкенда. Но он сочетается с большим количеством решений, среди них Django, Flask, Pyramids, Tkinter/PySide и прочие. Отлично подходит для крупных проектов и сложных веб-решений.
बड़ी जिम्मेदारी : उत्तराखंड की दीप्ति रावत भारद्वाज भाजपा महिला मोर्चा की राष्ट्रीय महामंत्री नियुक्त
भाजपा महिला मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष वानथी श्रीनिवासन ने मोर्चा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की घोषणा कर दी है। कार्यकारिणी में उत्तराखंड उच्च शिक्षा उन्नयन सलाहकार समिति की उपाध्यक्ष रहीं दीप्ति रावत भारद्वाज को राष्ट्रीय महामंत्री नियुक्त किया गया है। पहली बार भाजपा महिला मोर्चा की राष्ट्रीय टीम में उत्तराखंड को यह बड़ी जिम्मेदारी मिली है।
श्रीमती @deeptirawatbjp जी को @BJPMahilaMorcha की राष्ट्रीय महामंत्री मनोनित होने पर बहुत-बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं।
मुझे पूर्ण विश्वास है कि आप पूरी निष्ठा के साथ अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए महिला हित में कार्य करेंगी।
— Tirath Singh Rawat (मोदी का परिवार) (@TIRATHSRAWAT) June 22, 2021
दीप्ति रावत भारद्वाज को राष्ट्रीय महामंत्री नियुक्त किये जाने पर उत्तराखंड भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने केंद्रीय नेतृत्व का आभार जताते हुए उन्हें बधाई दी है। प्रदेश के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत, केंद्रीय शिक्षा मंत्री डॉ रमेश पोखरियाल ‘निशंक’, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक, पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत, प्रदेश महामंत्री (संगठन) अजेय कुमार, प्रदेश महामंत्री सुरेश भट्ट, कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज, अरविन्द पांडेय, राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ धन सिंह रावत, रेखा आर्य समेत अनेक नेताओं ने ट्विटर पर बधाई दी है।
भाजपा कार्यकर्ताओं की मेहनत, समर्पण एवं उनकी प्रतिभा का सम्मान करने वाली पार्टी है। हमारे राष्ट्रीय अध्यक्ष मा.श्री @JPNadda जी द्वारा देवभूमि की विदुषी बेटी श्रीमती @deeptirawatbjp जी को भाजपा महिला मोर्चा में राष्ट्रीय महामंत्री नियुक्त करने पर कोटि-कोटि बधाई एवं शुभकामनाएं! pic.twitter.com/EZCHulFqXg
— Dr. Ramesh Pokhriyal Nishank (@DrRPNishank) June 21, 2021
दीप्ति ने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् (एबीवीपी) से अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की। उन्होंने परिषद् में विभिन्न दायित्वों का निर्वहन किया। वे वर्ष 2002-03 में दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ की महासचिव चुनी गईं। वर्ष 2007 में दीप्ति ने मात्र 25 वर्ष की आयु में उत्तराखंड की तत्कालीन वीरोंखाल (वर्तमान में चौबट्टाखाल) विधान सभा क्षेत्र से बतौर भाजपा प्रत्याशी चुनाव लड़ा था।
उत्तराखंड से श्रीमती @deeptirawatbjp जी को भारतीय जनता पार्टी, महिला मोर्चा की राष्ट्रीय महामंत्री मनोनित होने पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं। pic.twitter.com/YFv0NhBlXE
— Madan Kaushik (@madankaushikbjp) June 21, 2021
वे भाजपा युवा मोर्चा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की सदस्य भी रही हैं। इसके अलावा उन्होंने उत्तराखंड भाजपा की प्रदेश प्रवक्ता व प्रदेश मंत्री की जिम्मेदारी भी संभाली है। उन्होंने अमेरिका में आयोजित इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस ऑफ़ एशियन पॉलिटिकल पार्टीज समेत कई अन्य अंतर्राष्ट्रीय कांफ्रेंस में भाग लिया है। उन्होंने प्रतिष्ठित टीवी चैनल आईबीएन-7 में एंकर के रूप में भी कार्य किया है। इसके अलावा वे सामाजिक क्षेत्र में भी सक्रिय हैं और सामाजिक गतिविधियों के लिए ऊर्जा फाउंडेशन का संचालन करती हैं।
हमारी देवभूमि की बेटी और एक ओजस्वी वक्ता श्रीमती @deeptirawatbjp जी को भारतीय जनता पार्टी महिला मोर्चा में राष्ट्रीय महामंत्री नियुक्त होने पर हार्दिक शुभकामनाएं व आशीर्वाद। आप अपनी जिम्मेदारियां निभाने में सफल हों, यही कामना है। माननीय @jpnadda जी का भी साधुवाद ।
— Trivendra Singh Rawat (@tsrawatbjp) June 21, 2021
मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने गुरूवार को अपनी सरकार के 100 दिन पूरे होने पर सचिवालय में आयेाजित एक संक्षिप्त कार्यक्रम में ‘सेवा, समर्पण और विश्वास के 100 दिन’ विकास पुस्तिका का विमोचन किया। पुस्तिका का प्रकाशन सूचना एवं लोक सम्पर्क विभाग द्वारा किया गया है। पुस्तिका के विमोचन से पूर्व दो मिनिट का मौन रख कर 2013 की केदारनाथ आपदा व कोविड में प्राण गंवाने वाले लोगों को श्रद्धांजलि दी गई।
इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने अपने सम्बोधन में कहा कि पिछले 100 दिन में सरकार ने कोविड से सफलतापूर्वक संघर्ष किया। उन्होंने कहा कि 10 मार्च को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के कुछ दिन में ही वे स्वयं कोविड संक्रमित हो गए। इस पर गाईडलाईन का पूरी तरह से पालन करते हुए उन्हें एक कक्ष में ही कई दिनों तक रहना पड़ा। परंतु इस अवधि में भी उन्होंने अधिकारियों से वर्चुअल मीटिंग कीं। दूर-दराज के क्षेत्रों की समस्याओं का मौके पर निस्तारण के लिए वर्चुअल चौपालों का आयेाजन किया। इनमें वर्चुअल प्रतिभाग करते हुए लोगों की समस्याओं को सुना और उनका निदान करने के लिए अधिकारियों को निर्देशित किया।
तीरथ ने कहा कि वे गांव की मिट्टी से जुड़े हैं और ग्रामीणों व आम जन के दुःख-दर्द को भली भांति जानते हैं। यही कारण है कि मुख्यमंत्री बनते ही उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों से विकास प्राधिकरणों को हटाया ताकि ग्रामीणों को अनावश्यक औपचारिकताओं के लिए परेशान न होना पड़े।
उन्होंने कहा कि वे जब विकास की रणनीति बना रहे थे तो कोविड की दूसरी लहर पूरे देश में आ गई। किसी को पता नहीं था कि कोविड की दूसरी लहर इस तरह का रूप लेगी। परंतु जल्द ही हमने स्थिति को पूरी तरह से सम्भाल लिया। पिछले लगभग तीन माह में हमने आईसीयू बेड, आक्सीजन बेड, वेंटिलेटर आदि की संख्या कई गुना तक बढ़ा दी। प्रत्येक जिला अस्पताल में आक्सीजन प्लांट स्थापित किए। सीएससी तक भी आक्सीजन प्लांट लगा रहे हैं। प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री के निर्देशों पर डीआरडीओ ने ऋषिकेश में 500 बेड का कोविड अस्पताल 14 दिन में तैयार कर दिया जबकि हल्द्वानी में 21 दिन में तैयार कर दिया। हमने राज्य में काफी तैयारी कर ली हैं। हम कोविड की तीसरी लहर के लिए पूरी तरह से तैयार हैं।
मुख्यमंत्री ने 18-44 वर्ष वालों को निशुल्क टीकाकरण और गरीबों को मुफ्त खाद्यान्न देने पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी का आभार व्यक्त किया। मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रदेश में 45 से अधिक उम्र वालों में लगभग 65 फीसदी का वैक्सीनेशन किया जा चुका है। कोविड को देखते हुए प्रदेश में हम विशेष खाद्यान्न सहायता दे रहे हैं। साढ़े सात किलो प्रति राशन कार्ड खाद्यान्न मिलता था जिसको बढ़ाकर बीस किलो प्रतिमाह कर दिया है। आपदा में पहली बार चीनी उपलब्ध कराई गई।
मुख्यमंत्री ने कहा कि हाल ही में उन्होंने प्रधानमंत्री और अनेक केंद्रीय मंत्रियों से भेंट कर राज्य के विकास पर विचार विमर्श किया। उन्हें राज्य की आवश्यकताओं से अवगत कराया। प्रधानमंत्री का देवभूमि उत्तराखण्ड के प्रति विशेष लगाव है। प्रधानमंत्री ने कहा है कि उत्तराखण्ड को लेकर किसी प्रकार की कमी नहीं रहेगी।
इस अवसर पर कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल, गणेश जोशी, राज्यसभा सदस्य नरेश बंसल, विधायक हरबंस कपूर, विनोद चमोली, मुन्ना सिंह चौहान, उमेश शर्मा काउ, खजानदास, सहदेव सिंह पुंडीर, राजकुमार ठुकराल, रामसिंह कैड़ा, विनोद कण्डारी, सूचना महानिदेशक रणबीर सिंह चौहान व अन्य उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन अपर निदेशक डा.अनिल चंदोला ने किया।
नरेंद्रनगर स्थित पुलिस ट्रेनिंग सेंटर (पीटीसी) में प्रशिक्षण प्राप्त कर उत्तराखंड पुलिस सेवा (यूपीएस) संवर्ग के १७ अधिकारी गुरूवार को उत्तराखंड पुलिस का हिस्सा बन गए। पीटीसी में पुलिस उपाधीक्षक आधारभूत प्रशिक्षण दीक्षांत समारोह में मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत बतौर मुख्य अतिथि शामिल हुए।
इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने प्रशिक्षण के दौरान विभिन्न क्षेत्रों में बेहतर प्रदर्शन करने वाले अधिकारियों को सम्मानित भी किया। सम्मानित होने वाले पुलिस उपाधीक्षकों में रीना राठोर, नताशा सिंह, अभिनय चौधरी, स्वप्निल मुयाल, सुमित पाण्डे शामिल थे। इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि पीटीसी में ऑडिटोरियम का निर्माण किया जायेगा। साइबर क्राइम को रोकने हेतु प्रशिक्षण दिया जाएगा। उन्होंने पुलिस प्रशिक्षण संस्थानों में कार्यरत प्रशिक्षकों को प्रशिक्षण भत्ता देने की घोषणा भी की।
तीरथ ने प्रशिक्षण के उपरांत पास आउट होने वाले सभी पुलिस उपाधीक्षकों को बधाई देते हुए कहा कि किसी विशेष उद्देश्य की प्राप्ति के लिए दी जाने वाली शिक्षा ही प्रशिक्षण है। प्रशिक्षण कोई एक दिन में पूर्ण होने वाला वन टाइम टास्क नहीं है, अपितु उसके अनुरूप खुद को बदलना पड़ता है। प्रशिक्षण ही वह माध्यम है जिसके द्वारा हम अपने पेशेवर कार्यों को तेजी व दक्षता से करने में सक्षम होते हैं। उन्होंने कहा कि प्रशिक्षुओं को कानूनों की जानकारी के अलावा शस्त्र संचालन आदि अनेक प्रकार के जरूरी कौशल का प्रशिक्षण भी दिया गया होगा, परंतु क्षमताओं का वास्तविक आंकलन तो तभी होगा जब हम अपने सीखे हुए ज्ञान एवं कौशल को अपने व्यवहारिक जीवन सही व सहज तरीके से प्रयोग करेंगे।
मुख्यमंत्री ने कहा कि भविष्य में साईबर एवं डिजिटल तकनीकी के माध्यम से होने वाले आर्थिक अपराधों, साईबर अपराधों एवं सामाजिक अपराधों से निपटना पुलिस के लिए प्रमुख चुनौती है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि पुलिस अन्य अपराधों के अलावा साइबर और संगठित अपराधों पर रोक लगाकर राज्य में चौतरफा सुरक्षा का माहौल तैयार करेंगे। कोरोना संकट के इस दौर में उत्तराखण्ड पुलिस ने कई नई-नई चुनौतियों का सामना किया है।
आज पी.टी.सी. नरेन्द्र नगर, टिहरी में पुलिस उपाधीक्षक आधारभूत प्रशिक्षण दीक्षांत समारोह में शामिल हुआ।
इस दौरान प्रशिक्षणरत पुलिस उपाधीक्षकों को प्रशिक्षण के दौरान विभिन्न क्षेत्रों में बेहतर प्रदर्शन करने पर बधाई दी व सम्मानित भी किया। pic.twitter.com/j3WfRd7rpR
— Tirath Singh Rawat (मोदी का परिवार) (@TIRATHSRAWAT) June 17, 2021
पुलिस महानिदेशक अशोक कुमार ने कहा कि पुलिस के सामने अनैक चुनौतियां हैं। पुलिस को नई-नई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इसलिए यह कठिन प्रशिक्षण दिया जाता है। उन्होंने कहा कि पुलिस में जन सेवक के गुण होने बहुत जरूरी हैं। हमारा मकसद पीड़ित केन्द्रित होना चाहिए। हमारा प्रयास होना चाहिए कि समाज के ऐसे लोगों को न्याय दिलाया जाए जो सुविधाओं से वंचित हैं। पुलिस के पास यूनिफार्म के साथ ही कानूनी अधिकार भी है।
इस अवसर पर कृषि मंत्री सुबोध उनियाल, अपर पुलिस महानिदेशक डॉ. पी.वी.के.प्रसाद, पुलिस महानिरीक्षक (प्रशिक्षण) पूरन सिंह रावत, निदेशक पीटीसी राजीव स्वरूप, टिहरी की जिलाधिकारी ईवा आशीष श्रीवास्तव व वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक तृप्ति भट्ट आदि उपस्थित थे।
साइबर अपराध रोकने हेतु ई-सुरक्षा चक्र हेल्पलाईन नंबर 155260 का शुभारंभ
मुख्यमंत्री तीरथ ने पीटीसी में आयोजित एक अन्य कार्यक्रम में साइबर अपराधों में रोकने हेतु ई-सुरक्षा चक्र हेल्पलाईन नंबर 155260 का शुभारंभ किया। यह नंबर विशेषकर वित्तीय साइबर अपराधों में त्वरित सहायता के लिए है। मुख्यमंत्री ने कहा कि साईबर अपराध एक उभरती हुई चुनौती है। इस चुनौती से लड़ने हेतु उत्तराखण्ड पुलिस द्वारा यह अच्छा प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि इस हेल्पलाईन नम्बर की जानकारी सबको हो, इसलिए इसका व्यापक स्तर पर प्रचार-प्रसार किया जाय। मुख्यमंत्री ने ई-सुरक्षा चक्र बुकलेट का विमोचन भी किया।
कृषि मंत्री सुबोध उनियाल ने उत्तराखण्ड पुलिस के अधिकारियों को बधाई देते हुए कहा कि दिन-प्रतिदिन साइबर अपराध तेजी से बढ़ रहे हैं। इसको रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाने जरूरी है। हेल्पलाईन नम्बर जारी करने वाला उत्तराखण्ड देश का तीसरा राज्य बना इसके लिए उत्तराखण्ड पुलिस बधाई की पात्र है।
इस अवसर पर जानकारी दी गई कि विगत कुछ वर्षो में साईबर अपराध के मामलो मे लगातार बढोत्तरी हुई है। वित्तीय एवं गैर वित्तीय मामले सामने आ रहे है। हाल ही मे गृह मंत्रालय भारत सरकार द्वारा पीड़ितो की त्वरित सहायता प्रदान कराने हेतु एक साईबर हेल्प लाईन नम्बर 155260 जारी किया गया है। उत्तराखण्ड देश का तीसरा राज्य बना जिसे गृह मंत्रालय से साईबर हेल्पलाईन नम्बर 155260 के संचालन की अनुमति प्राप्त हुयी। इस नम्बर पर किसी भी प्रकार के वित्तीय साईबर अपराध की सूचना दी जा सकती है तथा पीड़ित को अतिशीघ्र राहत देने का प्रयास किया जायेगा। इस नई प्रणाली के लिये स्पेशल टास्क फोर्स के अधीन साईबर क्राईम पुलिस स्टेशन में एक ई-सुरक्षा चक्र कन्ट्रोल रुम की स्थापना की गयी है।
इस अवसर पर पुलिस महानिदेशक अशोक कुमार, महानिदेशक सतर्कता, वी. विनय कुमार, अपर पुलिस महानिदेशक पी.वी.के. प्रसाद, पुलिस महानिरीक्षक अमित सिन्हा, संजय गुंज्याल, पूरन सिंह सिंह रावत, मुख्तार मोहसिन, पुलिस उप महानिरीक्षक, नीलेश आनन्द भरणे आदि उपस्थित थे।
मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने नई दिल्ली में केंद्रीय पंचायती राज, कृषि एवं किसान कल्याण, ग्रामीण विकास मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर से भेंट की। मुख्यमंत्री ने राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम द्वारा सहायतित और कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा अनुदानित राज्य समेकित सहकारी विकास परियोजना में अनुमन्य अनुदान को हिमालयी और पूर्वोत्तर राज्यों के लिए 20 प्रतिशत से बढ़ाकर 40 प्रतिशत करने का अनुरोध किया।
मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार द्वारा उत्तराखण्ड को आर्गेनिक स्टेट बनाने के लिए गम्भीरता से प्रयास किए जा रहे हैं। परम्परागत कृषि विकास योजना के अंतर्गत राज्य में 10 हजार जैविक क्लस्टरों की अनुमति दी गई थी। पहले चरण में आवंटित 3900 क्लस्टरों में जैविक कृषि संबंधी कार्य पूरे कर लिए गए हैं। जिससे लगभग 78 हजार हैक्टेयर कृषि भूमि को जैविक के अंतर्गत लाया गया तथा 1.5 लाख कृषकों की आय में वृद्धि हुई है। मुख्यमंत्री ने केंद्रीय मंत्री से जैविक प्रदेश की अवधारणा को मूर्त रूप देने के लिए स्वीकृति के सापेक्ष अवशेष 6100 क्लस्टर आवंटित करने का अनुरोध किया।
परम्परागत कृषि विकास योजना के अंतर्गत राज्य में 10 हजार जैविक क्लस्टरों की अनुमति दी गई थी। पहले चरण में आवंटित 3,900 क्लस्टरों में जैविक कृषि संबंधी कार्य पूरे कर लिए गए हैं। स्वीकृति के सापेक्ष अन्य 6,100 क्लस्टर आवंटित करने का अनुरोध भी किया।
— Tirath Singh Rawat (मोदी का परिवार) (@TIRATHSRAWAT) June 15, 2021
मुख्यमंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा ट्रूथफूल बीज (टी.एल. सीड्स) खाद्य सुरक्षा मिशन के अंतर्गत अनुदान पर वितरित करने की अनुमति प्रदेश को दी गई थी। उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्रों में बीजों पर अनुदान अनुमन्य करने एवं गुणवत्तायुक्त बीज की उपलब्धता सुनिश्चित कराने के लिए वर्ष 2021-22 में भी ट्रुथफूल बीजों पर प्रमाणित बीजों के समकक्ष अनुदान दिए जाने का भी आग्रह मुख्यमंत्री ने केंद्रीय मंत्री से किया।
मुख्यमंत्री ने कहा कि राष्ट्रीय बागवानी मिशन योजना के अंतर्गत राजकीय क्षेत्र के सुदृढ़ीकरण के लिए वर्ष 2021-22 की 280 करोड़ रूपए परिव्यय की अतिरिक्त कार्ययोजना बनाई गई है। केंद्र से इसकी स्वीकृति की जानी है। उन्होंने केंद्रीय मंत्री से प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण के तहत 16472 के लक्ष्य का आवंटन ग्राम पंचायतवार एवं श्रेणीवार ‘आवास साॅफ्ट’ में कराने का अनुरोध किया।
केंद्रीय मंत्री तोमर ने मुख्यमंत्री को उनके मंत्रालय की ओर से हर सम्भव सहयोग के प्रति आश्वस्त किया। इस अवसर पर मुख्य सचिव ओमप्रकाश, सचिव राधिका झा, शैलेश बगोली व अन्य अधिकारी उपस्थित थे।

- प्रवीण गुगनानी
लेखक व स्तंभकार
अब जबकि गांव-गांव, गली-गली और खेतोखेत खरीफ फसल बुआई की तैयारी हो रही है और देश में लॉकडाऊन का दौर ढलान पर है तब सभी को खरीफ कृषि के संदर्भ यह कहावत स्मरण कर लेनी चाहिए –
असाड़ साउन करी गमतरी, कातिक खाये, मालपुआ।
मांय बहिनियां पूछन लागे, कातिक कित्ता हुआ॥
अर्थात – आषाढ़ और सावन मास में जो गांव-गांव में घूमते रहे तथा कार्तिक में मालपुआ खाते रहे (मौज उड़ाते रहे) वे लोग पूछते हैं कि कार्तिक की फसल में कितना अनाज पैदा हुआ? अर्थात जो खेती में व्यक्तिगत रुचि नहीं लेते हैं उन्हें कुछ प्राप्त नहीं होता है। भारत सरकार एवं प्रदेशों की सरकारों को भी चाहिए कि वह लॉकडाऊन के इस दौर में भारतीय कृषि के कार्तिक तत्व अर्थात खरीफ उत्पादन हेतु पर्याप्त व्यवस्थाएं करके किसानों को सहयोग दें।
सर्वविदित है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के साथ-साथ भारतीय जनमानस भी कृषिनिर्भर ही रहता है। यदि कृषि सफल, सुचारू व सार्थक हो रही है तो भारतीय ग्राम प्रसन्न रहते हैं अन्यथा अवसादग्रस्त हो जाते हैं और यह अवसाद समूचे राष्ट्र को दुष्प्रभावित करता है। यदि भारतीय कृषि को छोटे व निर्धन कृषकों की दृष्टि से देखें तो खरीफ की फसल ही भारत की महत्वपूर्ण फसल है क्योंकि इस मौसम में सिंचाई के साधनों की अनुपलब्धता वाले छोटे-छोटे करोड़ों कृषक भी फसल उपजाने में सफल हो पाते हैं।
लगभग राष्ट्रव्यापी लॉकडाऊन के इस कालखंड में जबकि जून के प्रथम सप्ताह से देश भर में अनलॉकका क्रम प्रारंभ हो रहा है तब बहुत कुछ ऐसा है जिसे खरीफ की फसल और छोटे, मध्यम व सीमान्त किसानों की दृष्टि से समायोजित किया जाना चाहिए। छोटा किसान दूध, सब्जी, पशुपालन आदि-आदि छोटी कृषि आधारित इकाइयों से प्राप्त आय से जीवन यापन भी करता है तथा खरीफ फसल को बोने बिरोने के खर्चे भी निकालता है। स्वाभाविक है कि दो माह के लॉकडाऊन के मध्य ये छोटे कृषक अत्यधिक प्रभावित हुए हैं। उनके पास न तो परिवार के भरण-पोषण हेतु समुचित नगदी है और न ही उसकी जीवन रेखा खरीफ फसल को बोने बखरने हेतु नगदी है।
यद्यपि मोदी सरकार ने निर्धन परिवारों को निःशुल्क राशन, आयुष योजना व अन्य माध्यमों से सुरक्षित रखने की अनेक योजनाओं की झड़ी लगा दी है तथापि निर्धन, छोटे व सीमान्त किसानों का एक बड़ा वर्ग अब भी संकट में है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता है। निस्संदेह कोविड-19 ने जब समूचे अर्थतंत्र को दुष्प्रभावित कर दिया है तब किसान भी इससे अछूता नहीं रहा है, बल्कि कृषक वर्ग तो इकोनामिक बैकअप न होने के कारण बेहद असहाय, निर्बल व लाचार हो गया है। देश की केंद्र व प्रदेश सरकारों ने यदि कृषि तंत्र को महंगाई, बेरोजगारी व लॉकडाऊन के इस भीषण दौर में अपना सहारा नहीं दिया तो केवल कृषक समाज नहीं, अपितु समूचे देश को इसके दुष्परिणाम भुगतने होंगे।
पिछले वर्ष जब कोरोना महामारी ने भारत में पांव पसारे थे तब संपूर्ण भारत का उत्पादन तंत्र सिमट गया था और बड़े ही निराशाजनक परिणाम मिले थे। किंतु कृषि एकमात्र ऐसा क्षेत्र था जिसने जीवटतापूर्वक आशाओं से कहीं बहुत अच्छा उत्पादन करके देश की आर्थिक व्यवस्था को संबल प्रदान किया था।
बारिश अच्छी, समय पर व पर्याप्त होने की संभावनाओं के आ जाने के बाद स्वाभाविक ही है कि किसान खरीफ फसल बोने हेतु अत्यधिक उत्सुक व उत्साहित है। किंतु संकट भी है। इस वर्ष बीज बहुत महंगा रहने की आशंका है। खरीफ की प्रमुख फसल धान, सोयाबीन व मक्का के बीज मूल्य तो किसान की पहुंच से बाहर होते जा रहे हैं। देशव्यापी लॉकडाऊन के कारण उर्वरकों का उत्पादन व विपणन तंत्र गड़बड़ा गया है। अतः उर्वरकों के मूल्य भी बढ़ रहे हैं।
अंतरराष्ट्रीय मूल्य तंत्र के कारणों से भी मोदी सरकार उर्वरकों के मूल्य तंत्र को संभालने में असफल रही, किंतु आभार है इस संवेदनशील सरकार का कि उसने उर्वरकों पर सरकारी सहायता (सब्सिडी) बढ़ाकर उर्वरकों की मूल्यवृद्धि को निष्प्रभावी कर दिया है। केंद्र सरकार ने डीएपी खाद पर सब्सिडी 140 प्रतिशत बढ़ा दी है। इस हेतु 1475 करोड़ रूपये की अतिरिक्त सबसिडी जारी कर देश भर के कृषकों को एक बड़ी समस्या से बचा लिया है। निस्संदेह यदि केंद्र की संवेदनशील मोदी सरकार समय पर डीएपी के संदर्भ में यह सटीक निर्णय नहीं लेती तो देश में बुआई का रकबा और खरीफ उपज अवश्य ही प्रभावित हो जाती।
प्रधानमंत्री मोदी ने किसान सम्मान निधि की आठवीं किश्त के रूप में अक्षय तृतीया के शुभ दिन को 19 हज़ार करोड़ रुपए 10 करोड़ किसानों के खाते में सीधे ट्रांसफर करके भी एक बड़ा आर्थिक संबल का वातावरण बना दिया है। महामारी के कठिन समय में ये राशि इन किसान परिवारों के बहुत काम आ रही है। इस योजना से अब तक 1 लाख 35 हज़ार करोड़ रुपए कृषकों के खाते में सीधे पहुंच चुके हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि इस राशि में से सिर्फ कोरोना काल में ही 60 हज़ार करोड़ रुपए से अधिक किसानों को मिल गए हैं।
मोदी सरकार ने कोरोना काल को देखते हुए, KCC ऋण के भुगतान या फिर नवीनीकरण की समय सीमा को बढ़ा दिया गया है। ऐसे सभी किसान जिनका ऋण बकाया है, वो अब 30 जून तक ऋण का नवीनीकरण कर सकते हैं। इस बढ़ी हुई अवधि में भी किसानों को 4 प्रतिशत ब्याज पर जो ऋण मिलता है, जो लाभ मिलता है, वह यथावत रहेगा।
भारत की केंद्र सरकार द्वारा किये जा रहे सतत कृषि उन्नयन के प्रयासों का ही परिणाम है कि इतनी विपरीत परिस्थितियों के बाद भी गत वर्ष की अपेक्षा खरीफ का रकबा 16.4% बढ़ने की संभावना बताई जा रही है। कृषि मंत्रालय ने आशा जताई है कि पिछले साल अच्छी बारिश होने की वजह से इस बार जमीन में नमी मौजूद है और यह फसलों के लिए बहुत बेहतर स्थिति है। पिछले 10 साल के औसत की तुलना में इस बार देश के जलाशय 21 प्रतिशत तक अधिक भरे हुए हैं। हमें उम्मीद है कि इस बार देश में बंपर कृषि उपज हो सकती है। गतवर्ष की अच्छी वर्षा, जलस्त्रोतों में जल की उपलब्धि व भूमि में नमी का लाभ उठाने हेतु शासन कृषि क्षेत्र को पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराये तो किसान भी देश के गोदामों को अनाज से लबालब भरने में सक्षम हो सकता है।
ग्लोबल रेटिंग एजेंसी फिच सॉल्यूशंस ने भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए नए संकट आने के संकेत दिए हैं। इसका असर आर्थिक विकास दर पर पड़ेगा और वित्त वर्ष 2021-22 में भारत का वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद 9.5% हो सकता है। ऐसी स्थिति में निश्चित ही जीवटता व जिजीविषा से लबालब किसान वर्ग ही भारतीय अर्थव्यवस्था को अपने उत्पादन से एक बड़ा संबल प्रदान कर सकता है। आवश्यकता है कि शासन-प्रशासन भारतीय कृषक के प्रति संवेदनशील रहे।

- जयराम शुक्ल
पत्रकार व लेखक
कहते हैं कि हमारा समाज धर्मभीरु है। उसकी रक्षा के लिए हम किसी पराकाष्ठा तक जा सकते हैं। यदि ऐसा आप भी सोचते हैं तो एकबार चित्रकूट हो आइए, वहां जाकर देखिए कि आस्थाएं किस तरह स्वार्थ की बलि चढ़ा दी जाती हैं।
यहां भगवान श्रीराम साढ़े ग्यारह वर्ष रहे। जहां वे विचरते रहे होंगे, वहीं के जंगल और पहाड़ों के भीतर उम्दा किस्म का बाक्साइट है। इसलिए भगवान राम की स्मृतियां बची रहें या चाहे जाएं चूल्हे भाड़ में। बेरहम विकास यात्रा और ग्रोथरेट के चंद्रखिलौना के लिये हमें वो जंगल और वो पहाड़ चाहिए ही चाहिए।
जिस सिद्धा पहाड़ को देखकर राम ने – भुज उठाय प्रण कीन्ह.. का संकल्प लिया था। उस पहाड़ की गति देखेंगे,जरा भी संवेदना होगी तो रो पड़ेंगे। जेसीबी के पंजों से ऐसे बाक्साईट निकाला है, जैसे गिद्ध शवों से आंतड़ियां निकालते हैं। सरभंग ऋषि का जहां आश्रम था, उस वन प्रांतर को भी खनिज के लिए शिकारी कुत्तों की तरह नोचा खाया गया है।
भोपाल से इंदौर जाते हुए जब मैं देवास बायपास से गुजरता हूं तो कलेजा हाथ में आ जाता है। बायपास शुरू होते ही बाएं हाथ में हनुमान जी की विराट प्रतिमा है, उसके पीछे खड़े पहाड़ का जो दृश्य है, बेहद दर्दनाक है। उसे देखकर कई भाव उभरते हैं कि जैसे चमगादड़ ने अमरूद का आधा हिस्सा खाकर फेंक दिया हो, कि जैसे जंगली कुत्तों ने जिंदा वनभैंसे के लोथड़े निकाल लिए हों, कि जैसे हमने बर्थडे की केक को चाकू से काटा हो।
यदि आपमें जरा भी संवेदना होगी तो इस अधखाए पहाड़ को देखकर कुछ ऐसे ही लगेगा। दाईं ओर गुंगुआती हुई कई चिमनियां दिखेंगी। दृश्य कुछ ऐसा बनता है कि मानो धरती माता के मुंह में जबरन कई सुलगती हुई बीड़ियां दता दी गईं हों। यह दृश्य सिर्फ देवास का नहीं है। जहां है – उसके इर्दगिर्द एक नजर तो डालकर देखिए..!
पद्मपुराण में तालाब, बावड़ी, कुएं खुदवाने का पुण्य प्रताप वर्णित है। वृक्षों का महात्म्य तो दैवतुल्य है। बरगद, पीपल, आम तो हमारी जीवन संस्कृति से जुड़े हैं। महुआ तो वनवासी लोक संस्कृति का सिरमौर है।
कहते हैं, जिनके पुत्र नहीं होता था। वे आम व विभिन्न किस्म के फलदार पौधे लगाते थे। इन वृक्षों से मनुष्य को फल मिलते थे। इनमें जीव जंतु भी पलते थे। सभी आत्मा से उस व्यक्ति को साधुवाद देते व कृतज्ञ भाव व्यक्त करते जिसने बगीचे लगाए थे। सैकड़ों वर्ष तक उस व्यक्ति का नाम बगीचे के साथ चलता था। अब वही बगीचे कटकर पल्प व प्लाईबोर्ड फैक्ट्री में जा रहे हैं।
सड़कों ने भले ही आवागमन को सुगम किया हो, पर इसके लिए अरबों निर्दोष व फलदाई पेड़ों की बलि दी गई। शेरशाह सूरी ने भारत को उत्तर से दक्षिण जोड़ने के लिए जो राजमार्ग बनवाया था। वह बनारस से जबलपुर होते हुए दक्षिण जाता था। वर्षों तक हम इसे नेशनल हाइवे नंबर सात (एनएच 7) के नाम से जानते थे।
इस यवन बादशाह ने सड़कों के किनारे आम, जामुन, इमली, कपित्थ, बेल, महुआ जैसे फलदाई पौधे लगवाए थे। हर एक कोस पर कुएं और दस कोस पर एक बावड़ी व मुसाफिर खाना बने थे। रीवा के राजा अजीत सिंह के कार्यकाल में एक ब्रिटिश ट्रेवलर लेकी इस राजमार्ग से गुजरा था। उसकी डायरी के पन्ने रीवा के स्टेट गजेटियर में छपे हैं। लेकी ने सड़क के किनारे आम्रकुंजों का खूबसूरत वर्णन किया है।
हमारे देसी बादशाहों ने सड़क के विस्तार की योजना बनाई। योजना जब तक कागज से जमीन पर उतरती सड़कों के किनारे के वर्षों पुराने वृक्ष कटकर आरा मिलों में पहुंच गए। इनमें से हजारों-लाखों ऐसे जिनकी उमर पांच सौ वर्षों से एक हजार वर्ष रही होगी। किसी ने उफ तक नहीं किया।
सड़कें विधवा के मांग की भाँति सूनी हैं। गर्मियों में लगता है, रेगिस्तान से गुजर रहे हैं। वृक्षारोपण के नाम पर कनेर और बबूल रोपे गए हैं। कोई चिंता करने वाला नहीं और न ही इन पुरखों के लिए रोने वाला।
यूरोप-अमेरिका में पुराने पेड़ लिफ्ट एंड शिफ्ट किए जाते हैं। मिस्र में तो पहाड़ की शिफ्टिंग के बारे में सुना है। अपने यहां हर विकास विनाश की बुनियाद पर होता है। योजनाकार व इंजीनियर चाहते तो ये सभी पेड़ बच सकते थे। हां, जमीन का मुआवजा जरूर थोड़ा बढ़ता। पर फिकर किसे ? हर कोई घर भरना चाहता है। योजनाकार- इंजीनियर-ठेकेदार- नेता सभी के सब, क्या करियेगा !
आप जहां भी रहते हों, उसके दस किलोमीटर की परिधि में नजर दौड़ाइए। इससे भी वीभत्स और कारुणिक दृश्य दिखेंगे। पर इसे अंतः से महसूस करने को वाल्मीकि की दृष्टि जगानी होगी, जिन्होंने क्रौंच वध की घटना में क्रौंचनी के अश्रु से उपजी करुणा के चलते सृष्टि की पहली कविता रच दी।
पूरे देश के पहाड़ों और वनों के साथ ऐसे ही निर्दयी व्यवहार हो रहा है। किसलिए ?क्योंकि विकास के लिए ये जरूरी है। इससे ग्रोथरेट बढ़ती है। ग्रोथरेट की गणित बड़ी बेरहम है। खड़े हुए पेड़ों का विकास में कोई योगदान नहीं। इन्हें काटकर वहां से राजमार्ग निकालिए और पेड़ों को आरा मिल भेजिए या पेपर मिल, तभी विकास को गति मिलेगी। खड़े हुए पहाड़ विकास के बाधक हैं। उन्हें केक की तरह काटकर सड़क में पसराना पड़ेगा, विकास की गाड़ी तभी आगे बढ़ेगी। बहती हुई नदियों का विकास में तब तक कोई योगदान नहीं जब तक कि इन्हें बांध कर गांवों को न डुबा दिया जाए। यह विकास का नया फलसफा है। जहां संवेदना, स्मृति, जिंदगी की कोई हैसियत नहीं। विकास के समानांतर विनाश की भी ग्रोथरेट होती है, पर इसे नापे कौन? यह अर्थशास्त्रियों के विमर्श का विषय नहीं है।
हर मनुष्य में यह दृष्टि है….. हां, मैं प्रकृति प्रेमी हूं। मेरी मुक्ति यहीं दिखती है। जब भी समय मिलता है तो विन्ध्य के वनप्रांतर में भटक लेता हूं। सिंगरौली के धुंए से निकल कर उससे लगे जंगलों में खूब भटका हूं। वाल्मीकि आज यहां आकर घूमते तो गश खाकर गिर पड़ते। हम भौतिकवादी खुदगर्ज आदमी हैं। इसलिए ये सब कुछ देख भी लेते हैं। यहां आकर आप देखेंगे कि आदमी ने किस तरह धरती को उलटा पलटकर माटी के धुएं के नंगे पहाड़ खड़े कर दिए। लगभग तीन सौ किलोमीटर की परिधि का नामोनिशां मिट गया। पहाड़ पिसकर बिजली में बदल दिए गए। खैर के अद्भुत जंगलों, वन्यजीवों की बात कौन करे, यहां के वाशिंदे आज किस लोक में हैं, किसी को इसकी खबर नहीं।
विकास का ऑक्टोपस सिंगरौली से लगे सरई क्षेत्र के खूबसूरत जंगलों की ओर बढ़ रहा है। यह दुनिया के सबसे संपन्न जैव विविधता वाला क्षेत्र है। पेड़ पौधों की दृष्टि से और जीव जंतुओं की दृष्टि से भी।
छत्तीसगढ़, झारखंड के हाथियों का यह कॉरीडोर है। भालुओं का प्राकृतिक आवास। गुफाओं की श्रृंखला आदम सभ्यता की कहानी कहती हैं। इस क्षेत्र का गुनाह यह है कि इसके पेट में कोयला है और वह कोयला हमारी ग्रोथरेट के लिए जरूरी है। इसलिये चाहिए हर हाल पर, किसी कीमत पर। कभी कभी, गुण भी मौत के गाहक बन जाते हैं। जैसे कस्तूरी मृग के लिए, मणि नाग के लिए। यह तय है कि आज नहीं तो कल इस खूबसूरत वन की कस्तूरी और मणि की कीमत विकास की बलिबेदी पर चढ़कर चुकानी होगी।
अब ये कुछ सवाल खुद से पूछिये.. क्या हम कोई पहाड़ बना सकते हैं ? क्या जंगल, नदी, झरने पैदा कर सकते हैं ? तो फिर इन्हें सजाए मौत देने, नष्ट भ्रष्ट करने का अधिकार किसी को कहां से मिला ? पुराण कथाओं में पढ़ा है कि एक बार सहस्त्रबाहु ने नर्मदा को बांधने की कोशिश की थी, परशुराम ने उसके सभी हाथ काट ड़ाले। आज हम नदियों को बांधने, उनकी धारा को मोड़ने की, पहाड़ों और जंगलों को खाने की राक्षसी कोशिशें कर रहे हैं।
इन्हें हमारे वैदिक वांग्यमय में माता, पिता, सहोदर, भगिनी, पुत्र, बंधु-बांधवों का दर्जा कुछ सोच समझकर ही दिया गया है। ये हमें देते ही देते हैं। ये हैं तभी हम हैं।
नीति ग्रंथों में लिखा है कि प्रकृति से हम उतना ही लें, जितना कि एक भ्रमर फूल और फल से लेता है। हमें गाय की तरह दुहने की इजाजत है। गाय को ही काटकर खाने की नहीं।
विकास की निर्दयी होड़ ने प्रकृति को कत्लगाह में बदल दिया है। संभल सकें तो संभलिए नहीं तो याद रखिए ईश्वर की लाठी बे-आवाज़ होती है..और हर किए की सजा मिलती है, इसी लोक और इसी काया में।
