कोरोना से बचाव को लेकर देश में वैक्सीनेशन अभियान चल रहा है। वैक्सीन को लेकर राजनीति भी हो रही है, विपक्षी दलों के नेता केंद्र को तो निशाना बना रहे हैं, लेकिन अपने दल द्वारा शासित राज्यों में अव्यवस्थाओं पर कुछ नहीं बोल रहे। उदाहरण, कांग्रेस नेता राहुल गांधी बार-बार केंद्र से वैक्सीन का मुद्दा उठा रहे हैं, यह भी पूछ रहे हैं कि हमारे बच्चों की वैक्सीन कहां गई? लेकिन, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, झारखंड, राजस्थान में वैक्सीन की बर्बादी को लेकर चुप हैं। जहां उनकी या उनके सहयोगियों की सरकार है. झारखंड (37 %) और छत्तीसगढ़ (30 %) कोरोना वैक्सीन की बर्बादी में पहले तीन राज्यों में शामिल हैं।
राजस्थान में भी वैक्सीन की बर्बादी के चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के अनुसार 8 जिलों के 35 वैक्सीनेशन सेंटरों पर 500 वायल में लगभग 2500 से भी ज्यादा डोज तो केवल डस्टबिन में मिले हैं। ये वायल 20-75% तक भरे हुए थे। 16 जनवरी से लेकर 17 मई तक राज्य में 11.50 लाख से भी अधिक कोविड-19 वैक्सीन की डोज बर्बाद हुई हैं।
राहुल गाँधी जी पूछ रहे थे हमारे बच्चों के #Vaccine कहाँ हैं ?@RahulGandhi जी,कचरे के डिब्बों में हैं हमारे बच्चों के वैक्सीन
आकर देखिये राजस्थान में👇 pic.twitter.com/5NussFjPjg— Major Surendra Poonia (@MajorPoonia) May 31, 2021
सबसे बुरी स्थिति राजस्थान के चूरू जिले की है। जिले में 39.7% वैक्सीन की डोज बर्बाद कर दी गई। हनुमानगढ़ में 24.60 प्रतिशत वैक्सीन तो भरतपुर में 17.13%, कोटा में 16.71%, चित्तौड़गढ़ में 11.81%, जालौर में 9.63%, सीकर में 8.83%, अलवर में 8.32% और धौलपुर में 7.89% वैक्सीन बर्बाद की गई। जयपुर प्रथम में 4.67% और द्वितीय में 1.31% वैक्सीन की डोज बर्बाद कर दी गई।
राजस्थान में 2500 कोविड की डोज कचरे में !आपदा के समय क्या ये निंदनीय नही है।@Rahulgandhi @priyankagandhi
इस पर भी बोलिये राजस्थान की जनता भी भारत की जनता है।हां ये अलग बात है यहा कांग्रेस की सरकार है pic.twitter.com/FytspbOC70— Dr. Alka Gurjar (@alka_gurjar) May 31, 2021
माना कि बड़ी वैक्सीनेशन ड्राइव में कुछ सीमा तक वैक्सीन की बर्बादी होती है, लेकिन इतनी बड़ी संख्या में वेस्टेज होने पर जवाबदेही तो बनती है। एक ओर कांग्रेस व राज्य सरकार वैक्सीन की कमी बताते हुए केंद्र सरकार पर निशाना साध रही है और दूसरी ओर स्वयं इस तरह की बर्बादी भी नहीं रोक पा रही। वैक्सीन की एक डोज की वेस्टेज का अर्थ है, एक जीवन को सुरक्षा कवच नहीं दे पाना।
राजस्थान सरकार का कोरोना प्रबंधन का मॉडल देखिये
कचरे में वैक्सीन
कबाड़ में वेंटिलेटर
फाइलों में ऑक्सीजन प्लांट
इंजेक्शन व दवाइयों की कालाबाजारी
कोरोना से मौत के आंकड़ों की जादूगरी
चिरंजीवी योजना में निःशुल्क इलाज का झूठा दावा#GehlotWastedVaccine— Arjun Ram Meghwal (@arjunrammeghwal) May 31, 2021
महामारी की दूसरी लहर ने बता दिया कि वैक्सीन का कितना महत्व है। वेस्टेज से लोगों का सुरक्षा कवच तो प्रभावित होता ही है, सप्लाई चेन पर भी खासा असर पड़ता है। वैक्सीन वेस्टेज यदि बहुत अधिक है तो इसकी मांग बढ़ती जाएगी और गैर-आवश्यक मात्रा में इसे खरीदना पड़ेगा। आज जब सवा अरब नागरिकों का वैक्सीनेशन होना है तो ऐसे में एक डोज के महत्व व उसकी कीमत को आसानी से समझा जा सकता है।
Negligence or politics ..? @INCIndia has to answer for this total failure of its Rajasthan State Govt . They keep preaching the whole world about vaccination . pic.twitter.com/XvM0PNpFll
— B L Santhosh (@blsanthosh) May 31, 2021
राजस्थान में वैक्सीन की बर्बादी ट्वीटर पर मुद्दा बन गई है। केंद्रीय संसदीय कार्य राज्य मंत्री अर्जुन राम मेगवाल, भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री (संगठन) बी.एल.संतोष समेत भाजपा की राष्ट्रीय सचिव अलका गुर्जर, मेजर सुरेंद्र पूनिया आदि तमाम लोगों ने ट्वीट कर कांग्रेस से इस पर सवाल पूछा है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ हर्षवर्धन ने इन ख़बरों को गंभीरता से लेते हुए राजस्थान के स्वास्थ्य मंत्री डॉ रघु शर्मा को पत्र लिख कर मामले की जांच करने को कहा है।
राजस्थान के कुछ ज़िलों में कोरोना वैक्सीन की बर्बादी की ख़बरों को गंभीरता से लेते हुए मैंने राज्य के स्वास्थ्य मंत्री श्री @RaghusharmaINC जी को पत्र लिखकर मामले की जांच करने को कहा है।
मैंने वैक्सीन की बर्बादी रोकने के लिए स्थानीय स्तर पर बेहतर योजना बनाने को कहा है।@PMOIndia pic.twitter.com/nBsfGGAhtN
— Dr Harsh Vardhan (@drharshvardhan) May 31, 2021
उधर, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि राज्यों से लगातार आग्रह किया जा रहा है कि वे यह सुनिश्चित करें कि उनके यहां सप्लाई की गई कुल वैक्सीन में से एक प्रतिशत से भी कम बर्बाद हो। जिन राज्यों में वैक्सीन की अधिक बर्बादी हो रही है, वे टीकाकारण अभियान को सही तरीके से चलाएं। इन राज्यों को वैक्सीनेशन में किसी भी प्रकार की लापरवाही से बचना चाहिए. एक वैक्सीन बर्बाद होने का अर्थ है कि कोई व्यक्ति इसकी डोज से वंचित रह जाएगा।
भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने पश्चिम बंगाल की वर्तमान स्थिति को लोकतंत्र के लिए खतरा बताया है। उन्होंने कहा कि भाजपा एक जिम्मेदार पार्टी की भूमिका निभाते हुए बंगाल के बिगड़ते हालात से देश के आमजन को अवगत कराएगी, ताकि जम्मू-कश्मीर जैसी स्थिति को वहां आने से रोका जा सके।
विजयवर्गीय पश्चिम बंगाल भाजपा के प्रभारी भी हैं। उन्होंने मंगलवार को चुनाव पश्चात बंगाल की वर्तमान परिस्थिति के संबंध में उत्तराखंड भाजपा द्वारा आयोजित एक वेबिनार को बतौर मुख्य वक्ता संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने बंगाल की वर्तमान स्थिति पर प्रकाश डालते हुए कहा कि किस प्रकार हिन्दू समाज का कुछ कट्टरपंथियों द्वारा दमन किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि बंगाल के हालात राज्य के साथ—साथ देश के लिए चिंता का विषय बने हैं।
उन्होंने कहा कि प्रखर राष्ट्रवाद के अगुआ डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने बांग्ला बचाओं के लिए काम किया था। भाजपा के लोग मुखर्जी के कार्यों को आगे बढ़ाते हुए बंगाल के बचाने में कोई कसर नहीं छोड़ेगे। भाजपा एक जिम्मेदार पार्टी होने के नाते वहां की संस्कृति, भाषा और क्रांतिकारियों के योगदान को कमजोर नहीं होने देगी।
आज पश्चिम बंगाल में चुनाव के बाद की परिस्थितियों पर वेबिनार के जरिए विचार-विमर्श किया गया।
जिसमें @ukcmo श्री @TIRATHSRAWAT जी, @BJP4UK के प्रदेशाध्यक्ष श्री @madankaushikbjp जी, राष्ट्रीय महामंत्री श्री @dushyanttgautam जी एवं उत्तराखंड भाजपा के पदाधिकारीगण उपस्थित रहे। pic.twitter.com/naMogHHniW
— Kailash Vijayvargiya (@KailashOnline) June 1, 2021
उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल की धरती से आनन्द मठ, वंदेमातरम, जनगण मन जैसे नारे और गीत राष्ट्र को मिले हैं। ऐसी महान धरती के लोगों के साथ अन्याय और चिन्हित कर सताने का काम किया जा रहा है। भाजपा देश विरोधी गतिविधियों के हमेशा से लड़ती आई है और आगे भी लड़ेगी।
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक ने कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कहा कि पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम से कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दल खुश है। लेकिन उन्हें वहां अपनी हार पर तरस नहीं आ रही। वहां के लोगों के संकटपूर्ण जीवन व बिगड़ते माहौल पर विपक्ष भी मौन बना हुआ। भाजपा पश्चिम बंगाल के लोगों के साथ खड़ी है।
वेबीनार में प्रदेश के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत, राष्ट्रीय महामंत्री दुष्यंत गौतम, प्रदेश महामंत्री (संगठन) अजेय, महामंत्री सुरेश भट्ट, प्रदेश मीडिया प्रभारी मनवीर सिंह चौहान समेत तमाम पार्टी पदाधिकारी जुड़े थे। बेबीनार का संयोजन प्रदेश महामंत्री कुलदीप कुमार ने किया।
मोदी सरकार के 7 वर्ष पूरे होने पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अभिनंदन किया है। शाह ने कहा कि मोदी सरकार ने विकास, सुरक्षा, जनकल्याण और ऐतिहासिक सुधारों के समांतर समन्वय का अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत किया है।
https://twitter.com/AmitShah/status/1398886002769285123
केंद्रीय गृह मंत्री शाह ने ट्वीट कर कहा कि “इन 7 वर्षों में मोदी जी ने एक ओर देशहित को सर्वोपरि रखकर अपने दृढसंकल्प और सर्वस्पर्शी व कल्याणकारी नीतियों से गरीब, किसान व वंचित वर्ग को विकास की मुख्यधारा से जोड़कर उनके जीवन को बेहतर बनाया है तो वहीं दूसरी ओर अपने मजबूत नेतृत्व से भारत को एक सशक्त राष्ट्र बनाया”।
https://twitter.com/AmitShah/status/1398886031173193730
शाह ने यह भी कहा कि “विगत 7 साल से देश की जनता ने मोदी जी की सेवा और समर्पण पर निरंतर अपना अटूट विश्वास जताया है, जिसके लिए मैं देशवासियों को नमन करता हूँ। मुझे पूर्ण विश्वास है कि मोदी जी के दूरदर्शी नेतृत्व में हम हर चुनौती पर विजय प्राप्त कर भारत की विकासयात्रा को अविरल जारी रखेंगे”।
https://twitter.com/AmitShah/status/1398886048789196801
मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने शनिवार को गन्ना विकास राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) स्वामी यतीश्वरानंद के साथ उत्तरकाशी जनपद का भ्रमण किया। उन्होंने बड़कोट में कोविड केयर सेंटर और नौगांव में सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र का निरीक्षण कर विभिन्न व्यवस्थाओं का जायजा लिया। उन्होंने कोविड सेल से होम आइसोलेशन में रह रहे लोगों से फोन से वार्ता कर उनका हालचाल भी जाना।
मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रदेश में डॉक्टरों की कमी को दूर करने के लिए राज्य सरकार द्वारा हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं। डॉक्टरों को दूरस्थ क्षेत्रों में तैनाती दी गई है। कोविड के दौरान डॉक्टरों की कमी न हो, इसके लिए जिलाधिकारियों को भी अधिकार दिया गया है कि कोविड के दौरान मानक के अनुसार एवं आवश्यकतानुसार डॉक्टरों की तैनाती कर सकते हैं।
उन्होंने ने कहा कि उत्तरकाशी जनपद में कोविड के नियंत्रण के लिए अच्छे प्रयास हुए हैं। जिला प्रशासन एवं स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों द्वारा सराहनीय कार्य किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि कोरोना की तीसरी लहर के दृष्टिगत सरकार द्वारा पूरी व्यवस्थाएं की जा रही हैं। अस्पतालों एवं कोविड केयर सेंटरों में बच्चों के लिए अलग वार्ड की व्यवस्था के साथ ही उनके अभिभावकों के लिए भी व्यवस्थाएं की जा रही हैं। सीएचसी स्तर तक भी आक्सीजन प्लांट की व्यवस्था की जा रही है।
तीरथ ने भ्रमण के दौरान उत्तरकाशी में लगभग 52 करोड़ 37 लाख रूपये की 26 योजनाओं का लोकार्पण एवं शिलान्यास भी किया। जिसमें से 17 करोड़ 41 लाख रूपये की 12 योजनाओं का लोकार्पण एवं 34 करोड़ 46 लाख रूपये की 14 योजनाओं के शिलान्यास हुवा।
मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने बुधवार को वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से श्रीनगर मेडिकल कॉलेज में स्थापित 30 नए आईसीयू बेड का लोकार्पण किया।
इस अवसर पर मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने कहा कि कोविड के समय में इन आईसीयू बेड की उपलब्धता से विशेषकर पौड़ी, चमोली, रुद्रप्रयाग एवं टिहरी जिले के लोगों को ईलाज में मदद मिलेगी। इन जनपदों से अधिकांश मरीज ईलाज के लिए श्रीनगर आते हैं। कोविड के बाद अन्य बीमारियों के ईलाज के लिए भी इन आईसीयू बेड का उपयोग होगा।
कोविड-19 के संक्रमण काल में इन आईसीयू बेड की उपलब्धता से विशेषकर पौड़ी, चमोली, रुद्रप्रयाग एवं टिहरी जिले के लोगों को उपचार में मदद मिलेगी।
— Tirath Singh Rawat (मोदी का परिवार) (@TIRATHSRAWAT) May 26, 2021
उन्होंने कहा कि राज्य में स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर करने के लिए हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं। प्रदेश में आईसीयू, ऑक्सीजन बेड, वेंटिलेटर, ऑक्सीजन की पर्याप्त उपलब्धता है। मेडिकल कॉलेज एवं जिला अस्पतालों में सभी आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध हैं। इनका विस्तार सीएचसी एवं पीएचसी लेवल तक किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि जल्द ही नैनीडांडा, थलीसैंण एवं प्रदेश के अन्य दूरस्थ क्षेत्रों में ऑक्सीजन प्लांट स्थापित किए जाएंगे। उन्होंने कहा कि कोविड की तीसरी लहर के लिए अभी से सतर्कता बरतनी होगी। सभी अस्पतालों में बच्चों के लिए अलग से व्यवस्था हो। इसकी समय से पूरी तैयारी रखी जाय।
इस अवसर पर वर्चुअल माध्यम से उच्च शिक्षा एवं सहकारिता राज्य मंत्री डॉ. धन सिंह रावत, जिलाधिकारी पौड़ी विजय जोगदंडे, सीएमओ पौड़ी डॉ मनोज शर्मा, श्रीनगर मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ सीएमएस रावत आदि उपस्थित थे।
केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा कार्यान्वित की जा रही वन स्टॉप सेंटर (ओएससी) योजना से अब तक 3 लाख से अधिक महिलाओं को सहायता प्रदान की जा चुकी है।
वन स्टॉप सेंटर तहत महिलाओं को किसी भी प्रकार की हिंसा के खिलाफ लड़ने के लिए एक ही स्थान पर पुलिस, चिकित्सा, कानूनी सहायता व परामर्श और मनोवैज्ञानिक सहायता सहित कई सेवाओं के लिए तत्काल सहायता प्रदान की जाती है। यह योजना 1 अप्रैल, 2015 से पूरे देश में राज्य सरकारों के माध्यम से क्रियान्वित की जा रही है। अब तक, देश के 35 राज्यों में 701 सेंटर चालू किए जा चुके हैं।
https://twitter.com/PIBWCD/status/1396027720899776519
केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अनुसार कोविड महामारी के कारण बनी मौजूदा स्थिति में, जो महिलाएं संकट की स्थिति में हैं या हिंसा से प्रभावित हैं, वे त्वरित सहायता और सेवाओं के लिए निकटतम ओएससी से संपर्क कर सकती हैं। मंत्रालय ने सभी राज्यों/केन्द्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों/प्रशासकों और सभी जिलों के डीसी/डीएम को निर्देश दिया है कि वे लॉकडाउन अवधि के दौरान वन स्टॉप सेंटरों को चालू रखें।
योजना के दिशा-निर्देशों के अनुसार, इन केन्द्रों के सुचारू संचालन के लिए, कानूनी परामर्श, चिकित्सा सहायता, मनोवैज्ञानिक – सामाजिक परामर्श आदि प्रदान करने के लिए पैनल में शामिल एजेंसियों अथवा व्यक्तियों की नियुक्ति की जिम्मेदारी संबंधित राज्यों के जिला प्रशासन के पास है।
मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने शनिवार को शासन के वरिष्ठ अधिकारियों और जिलाधिकारियों के साथ सचिवालय में वीडियो कांफ्रेंसिग के द्वारा प्रदेश में कोविड की रोकथाम और बचाव कार्यों की समीक्षा की। मुख्यमंत्री ने ऐसे बच्चों के लिए विशेष योजना बनाने के निर्देश दिये जिनके माता-पिता या परिवार के मुखिया की मृत्यु कोविड के कारण हुई है। उन्होंने कहा कि ऐसे बच्चों की सहायता की जा सके, इसके लिये जल्द से जल्द इनका चिन्हीकरण सुनिश्चित किया जाए।
उन्होंने कहा कि कोविड की तीसरी लहर के लिये तैयारियों को शीघ्रता से धरातल पर लागू किया जाए। वर्तमान में कोविड के मामलों में कमी देखने को मिल रही है, फिर भी हमें पूरी तरह से सावधान रहना है। किसी तरह की ढिलाई नहीं होनी चाहिए। तीसरी लहर में बच्चों पर फोकस करना है। जिला व ब्लॉक स्तर तक इसकी मैपिंग हो। फील्ड में काम करने वालों को मालूम होना चाहिए कि किसी तरह की परिस्थिति में उन्हें क्या करना है। उन्होंने ने कहा कि मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग का उल्लंघन और कालाबाजारी करने वालों पर जरूरी कार्रवाई की जाए। उन्होंने कहा कि ई-संजीवनी का अच्छा रेस्पोंस मिल रहा है। इसे और अधिक सुदृढ़ और प्रचारित किया जाए।
मैंने निर्देशित किया हैं कि ऐसे बच्चों के लिए विशेष योजना बनाई जाए, जिनके माता-पिता या परिवार के मुखिया की मृत्यु कोविड के कारण हुई है। इसके लिये जल्द से जल्द इनका चिन्हीकरण सुनिश्चित किया जाए। pic.twitter.com/0pC3FyvTfh
— Tirath Singh Rawat (मोदी का परिवार) (@TIRATHSRAWAT) May 22, 2021
मुख्यमंत्री ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में कोविड को लेकर अधिक ध्यान देना है। इसके लिए विकेंद्रीकृत योजना का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाए। आशा, एएनएम की सही तरीके से ट्रेनिंग हो। पीएचसी व सीएचसी स्तर तक तैयारियां हों। हर ब्लाॅक में कन्ट्रोल रूम हों। ग्राम सभाओं का सहयोग लिया जाए। जहाँ तक सम्भव हो दूरस्थ क्षेत्रों के लिए मोबाईल टेस्टिंग वैन, मोबाईल लैब, सेम्पलिंग वैन की व्यवस्था हो। गांव-गांव, घर- घर तक जरूरी मेडिकल किट व दवाओं की उपलब्धता हो। गांवों में क्वारेंटाईन सेंटर चिन्हित कर उन्हें जरूरी सुविधाओं से युक्त किया जाए।
उन्होंने कहा कि वैक्सीनेशन में धन की कमी नहीं है। इसके लिये हर सम्भव प्रयास कर वैक्सीनैशन की प्रक्रिया में तेजी लानी है। प्रस्तावित और निर्माणाधीन ऑक्सीजन जेनरेशन प्लांट को जल्द पूरा किया जाए। ऑक्सीजन आपूर्ति में बहुत सुधार हुआ है। इसे आगे भी बनाये रखना है। हमारे सभी आईसीयू संचालित होने चाहिए। कोविड से सम्बंधित सूचनाओं की रियल टाईम डाटा एन्ट्री सुनिश्चित की जाए।
मुख्यमंत्री ने कहा कि डेंगू को लेकर भी तैयारियां की जाएं। इसके बचाव के संबंध में जनजागरूकता अभियान चलाए जाएं। यह देख लिया जाए कि हमारे कोविड अस्पताल और कोविड केयर सेंटर के आस-पास पानी एकत्र न हो।
बैठक में मुख्यमंत्री के मुख्य सलाहकार शत्रुघ्न सिंह, मुख्य सचिव ओमप्रकाश, डीजीपी अशोक कुमार, अपर मुख्य सचिव मनीषा पंवार, सचिव अमित नेगी, डॉ पंकज कुमार पाण्डेय सहित शासन के वरिष्ठ अधिकारी, मंडलायुक्त, जिलाधिकारी व अन्य अधिकारी उपस्थित थे।

- प्रह्लाद सबनानी
आर्थिक मामलों के जानकार और बैंकिग सेवा के पूर्व अधिकारी
कोरोना महामारी के बीच एक अंतरराष्ट्रीय संस्था ट्रैस इंटरनेशनल (TRACE International) ने विश्व के 197 देशों में व्यापार रिश्वतखोरी जोखिम के स्तर पर एक प्रतिवेदन जारी किया था। चूंकि भारत में कोरोना की दूसरी लहर जारी है। अतः इस प्रतिवेदन पर शायद किसी की नजर ही नहीं गई। इस प्रतिवेदन के अनुसार विश्व के 197 देशों में से भारत में व्यापार रिश्वतखोरी जोखिम का स्तर बहुत तेजी से कम हुआ है। विश्व के 197 देशों की इस सूची में वर्ष 2014 में भारत का स्थान 185वां था जो वर्ष 2020 में 77वें स्थान पर पहुंच गया है। अर्थात 6 वर्षों के दौरान भारत ने 108 स्थानों की लम्बी छलांग लगाई है।
भारत के लिए यह एक बड़ी उपलब्धि है और इसे प्राप्त करने के लिए देश में कई प्रयास किए गए हैं। भारत में व्यापार भ्रष्टाचार एवं रिश्वतखोरी जोखिम के स्तर में इतना बड़ा सुधार मुख्य रूप से इसलिए देखने में आया है क्योंकि देश में केंद्र सरकार ने समाज के सभी क्षेत्रों से भ्रष्टाचार एवं रिश्वतखोरी को हटाने का अभियान छेड़ दिया था। साथ ही, केंद्र सरकार द्वारा भ्रष्टाचार रोकथाम एवं निवारण कानून, 1988 में, 30 वर्षों के बाद, बहुत संशोधन करते हुए इसे कठोर बनाया गया है, जिसके तहत अब रिश्वत देने वाला एवं रिश्वत लेने वाला दोनों ही दोषी माने गए हैं। साथ ही, सरकार ने अपने दैनिक कार्यों में तकनीक के उपयोग को भी बढ़ाया है। ई-टेंडरिंग, ई- प्रोक्योरमेंट एवं विपरीत नीलामी जैसे नियमों को लागू करने से भी बहुत फर्क पड़ा है और इससे अभिशासन में पारदर्शिता बढ़ी है।
अब अधिकतर सरकारी काम डिजिटल प्लेटफॉर्म पर किया जाने लगा है। जिसके कारण अब अधिकारियों/कर्मचारियों एवं जनता के बीच सीधा-सीधा सम्पर्क कम ही रह गया है। फिर चाहे वह आयकर विभाग हो अथवा नगर निगम एवं नगर पालिकाएं, बिजली प्रदान करने वाली कम्पनियां भी अब ऑनलाइन बिल जारी करती हैं। देश में सबसे बड़ा अभियान तो जन-धन योजना के अंतर्गत चलाया गया जिसके अंतर्गत करोड़ों देशवासियों के विभिन्न बैकों में 40 करोड़ से अधिक जमा खाते खोले गए हैं, इनमे 22 करोड़ महिलाओं के खाते भी शामिल हैं।
इन जमा खातों में आज विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत प्रदान की जाने वाली लगभग सभी प्रकार की सहायता राशियां एवं सब्सिडी का पैसा केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा सीधे ही हस्तांतरित किया जा रहा है। मनरेगा योजना की बात हो अथवा केंद्र सरकार की अन्य योजनाओं की बात हो, पहिले ऐसा कहा जाता था कि केंद्र से चले 100 रुपए में से शायद केवल 8 रुपए से 16 रुपए तक ही अंतिम हितग्राही तक पहुंच पाते हैं, परंतु आज हितग्राहियों के खातों में सीधे ही राशि के जमा करने के कारण बिचोलियों की भूमिका एकदम समाप्त हो गई है और हितग्राहियों को पूरा का पूरा 100 प्रतिशत पैसा उनके खातों में सीधे ही जमा हो रहा है। साथ ही आज, मनरेगा योजना के अंतर्गत हजारों करोड़ रुपए की राशि भी ग्रामीण इलाकों में मजदूरों के खातों में सीधे ही हस्तांतरित की जा रही है। इस तरह के प्रयासों से भ्रष्टाचार पर सीधे ही अंकुश लगा है।
भारत में व्यापार रिश्वतखोरी जोखिम में हुए सुधार के चलते अब केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) के द्वारा भ्रष्टाचार एवं रिश्वतखोरी के मामलों में सीधे ही की जाने वाली कार्यवाही की संख्या में भी कमी देखने में आई है। वर्ष 2015 में जहां 3,592 प्रकरणों में केंद्रीय सतर्कता आयोग ने सीधे ही कार्यवाही की थी वहीं वर्ष 2019 में केवल 1,508 प्रकरणों में सीधी कार्यवाही की गई थी। इसी प्रकार, इस दौरान बाहरी संस्थानों से भ्रष्टाचार एवं रिश्वतखोरी से सम्बंधित प्राप्त शिकायतों की संख्या में भी कमी आई है। वर्ष 2014 में केंद्रीय सतर्कता आयोग को भ्रष्टाचार एवं रिश्वतखोरी से सम्बंधित 62,362 शिकायतें प्राप्त हुई थीं, जो वर्ष 2019 में घटकर 32,579 रह गईं थीं।
प्रायः यह भी पाया गया है कि व्यापार भ्रष्टाचार एवं रिश्वतखोरी जोखिम का स्तर यदि किसी देश में अधिक रहता है तो उस देश के सरकारी खजाने में आय कम हो जाती है क्योंकि भ्रष्टाचार एवं रिश्वतखोरी के माध्यम से उस रकम का कुछ हिस्सा कुछ अधिकारियों की जेब में पहुंच जाता है। इससे उस देश द्वारा विकास कार्यों पर ख़र्च की जाने वाली रकम पर विपरीत असर पड़ता है और उस देश की विकास दर भी प्रभावित होने लगती है।
भारत में व्यापार भ्रष्टाचार एवं रिश्वतखोरी जोखिम के स्तर में कमी का फायदा जीएसटी संग्रहण में लगातार हो रही वृद्धि के रूप में भी देखने में आया है। माह अप्रेल 2021 के दौरान देश में जीएसटी संग्रहण, पिछले सारे रिकार्ड को पार करते हुए, एक नए रिकार्ड स्तर पर पहुंच गया है। माह अप्रेल 2021 में 141,384 करोड़ रुपए का जीएसटी संग्रहण हुआ है। यह मार्च 2021 माह में संग्रहित की गई राशि से 14 प्रतिशत अधिक है। पिछले 7 माह से लगातार जीएसटी संग्रहण न केवल एक लाख रुपए की राशि से अधिक बना हुआ है, बल्कि इसमें लगातार वृद्धि दृष्टिगोचर हो रही है। यह भी देश में भ्रष्टाचार के स्तर में कमी होने का एक संकेत माना जा सकता है।
जिन देशों में व्यापार भ्रष्टाचार एवं रिश्वतखोरी जोखिम कम है उन देशों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश बहुत तेजी से बढ़ता है क्योंकि इससे विदेशी निवेशकों का विश्वास उस देश की अर्थव्यवस्था में बढ़ता है। भारत भी इसका अपवाद नहीं हैं। भारत में शुद्ध विदेशी निवेश, वर्ष 2013-14 में, 2,200 करोड़ अमेरिकी डॉलर का रहा था, जो वर्ष 2019-20 में बढ़कर 4,300 करोड़ अमेरिकी डॉलर का हो गया है। वर्ष 2010-11 में तो यह मात्र 1,180 करोड़ अमेरिकी डॉलर का ही था। वर्ष 2010-11 एवं 2019-20 के बीच देश में शुद्ध विदेशी निवेश में 263 प्रतिशत की वृद्धि आंकी की गई है।
हालांकि, व्यापार भ्रष्टाचार एवं रिश्वतख़ोरी जोखिम के स्तर एवं देश के सकल घरेलू उत्पाद में कोई सीधा सम्बंध तो पता नहीं चलता है। जब इसका आंकलन कई देशों के व्यापार भ्रष्टाचार एवं रिश्वतखोरी जोखिम के स्तर को उस देश के सकल घरेलू उत्पाद में हो रही वृद्धि दर से जोड़कर देखा गया तो पाया गया है कि जिन-जिन देशों में व्यापार भ्रष्टाचार एवं रिश्वतखोरी जोखिम का स्तर कम है उन देशों की अर्थव्यवस्था में विकास की दर अधिक रही है। भारत में भी यह दृष्टिगोचर है। विश्व के अन्य देशों यथा- ब्रिटेन, ईजिप्ट, ग्रीस, इटली आदि देशों में भी व्यापार भ्रष्टाचार एवं रिश्वतखोरी जोखिम के स्तर में कमी देखी गई है तो उसी अवधि में इन देशों की अर्थव्यवस्था में विकास की दर तेज हुई है। वहीं दूसरी ओर चीन, दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील, तुर्की, रूस जैसे देशों में व्यापार भ्रष्टाचार एवं रिश्वतखोरी जोखिम के स्तर में बढ़ोतरी देखी गई है तो उसी अवधि में इन देशों की अर्थव्यवस्था में विकास की दर भी कम हुई है।
भारत में व्यापार भ्रष्टाचार एवं रिश्वतखोरी जोखिम कम होते जाने का तात्पर्य यह कदाचित नहीं है कि देश में भ्रष्टाचार एवं रिश्वतखोरी समाप्त हो गई है। हां, इस सूचकांक में लगातार हो रहे सुधार का आशय यह जरूर है कि अन्य देशों की तुलना में भारत में भ्रष्टाचार एवं रिश्वतखोरी कम हो रही है। परंतु अभी भी पूरे विश्व में 76 देश ऐसे हैं जहां भारत की तुलना में भ्रष्टाचार एवं रिश्वतखोरी कम है।

- प्रशांत पोळ
विचारक व लेखक
इस दुनिया में मात्र दो ही देश धर्म के नाम पर अलग हुए हैं। या यूं कहे, धर्म के नाम पर नए बने हैं। वे हैं – पाकिस्तान और इजराइल। दोनों के बीच महज कुछ ही महीनों का अंतर हैं। पाकिस्तान बना 14 अगस्त, 1947 के दिन। इसके ठीक नौ महीने के बाद, अर्थात 14 मई, 1948 को इजराइल की राष्ट्र के रूप में घोषणा हुई।
पाकिस्तान मुस्लिम धर्म के नाम पर बना, तो इजराइल यहुदियों (ज्यू धर्मियों) के लिए था। किन्तु दोनों देशों में जमीन – आसमान का अंतर हैं। पाकिस्तान ने विगत 73 वर्षों में धर्म के नाम पर राजनीति की। अमेरिका जैसी महाशक्ति से मदद लेना जारी रखा। आतंकवाद को प्रश्रय दिया। और इन सब के बीच अपने देश के विकास का डिब्बा गुल किया। कटोरी लेकर खड़ा हुआ देश ऐसा पाकिस्तान का यथार्थ वर्णन किया जाता हैं। इसके ठीक विपरीत, एक करोड़ से भी कम लोकसंख्या के इजराइल ने इतने ही समय में ऐसी दमखम दिखाई, की विश्व की राजनीति इजराइल के बगैर पूरी हो ही नहीं सकती।
ज्यू धर्म प्राचीन हैं। ईसाईयत के पहले भी इसका अस्तित्व था। ईसा के पहले हजार–डेढ़ हजार वर्षों तक यहूदियों के उल्लेख इतिहास में मिलते हैं। यहूदी (ज्यू समुदाय) यह इतिहास में सबसे ज्यादा सताया गया समाज हैं। दो–सवा दो हजार वर्ष पहले उन्हें अपनी भूमि से भगाया गया था। चूंकि स्वभावतः ज्यू मेहनती एवम होशियार होते हैं। वे जहां भी गए, वहां तरक्की कर गए। स्वाभाविकतः अन्य लोगों के ईर्ष्या की बलि चढ़े।
दुनिया भर के सताए हुए (भारत अपवाद रहा) यहुदियों के मन में अपने मातृभूमि को लौटने की इच्छा प्रबल थी। इसे झायोनिस्ट विचारधारा कहा गया। इसी विचारधारा के चलते, बीसवी शताब्दी के प्रारंभ में, प्रथम विश्व युद्ध के पहले, लगभग चालीस हजार यहुदी, इजराइल में जा बसे।
बाद में दूसरे विश्व युद्ध में जर्मन नाजियों ने इन यहूदियों का अभूतपूर्व नरसंहार किया। साठ लाख से ज्यादा ज्यू धर्मियों को गैस चैम्बर या अन्य यातनाएं देकर मारा गया। इसके कारण पूरी दुनिया में ज्यू समुदाय के प्रति सहानुभूति उमड़ पडी। वैश्विक समुदाय ने इन यहूदियों को बसने के लिए दो स्थान प्रस्तावित किए। एक था युगांडा देश का एक हिस्सा और दूसरा वह, जो उनकी मातृभूमि था – इजराइल।
स्वाभाविक रूप से ज्यू समुदाय ने अपनी मातृभूमि का पर्याय स्वीकार किया। इजराइल का भाग्य कुछ ऐसा रहा की अपने निर्माण काल से ही उसे शत्रुओं से जूझना पड़ा। चूंकि मूल इजराइल की भूमि पर मुस्लिम आक्रान्ताओं ने सैकड़ों वर्षों से कब्जा कर रखा था। अतः उस भूमि पर इजराइल का बनना, यह पड़ोसी इजिप्त, सीरिया, जॉर्डन आदि देशों को नागवार गुजरा। जन्म लेते इजराइल को इजिप्त, सीरिया, जॉर्डन, लेबनोन और ईराक से युध्द लड़ना पड़ा। यह युद्ध, 1948 का अरब – इजराइल युद्ध नाम से इतिहास में जाना जाता हैं। इस युद्ध में नई नवेली इजराइली सेना ने अरब देशों को अपनी ताकत दिखा दी और इस युद्ध के बाद इजराइल की भूमि में 26% की बढ़ोतरी हुई।
आगे भी यही सिलसिला चलता रहा। इजराइल ने जितने भी युद्ध लड़े, लगभग सभी युद्धों के बाद उसके क्षेत्रफल में वृद्धि होती गई। इजराइल की इस ताकत और प्रगति को देखकर पड़ोसी अरब राष्ट्रों को काफी तकलीफ हो रही थी। जून 1967 में इजिप्त ने कुछ ऐसे हालात निर्माण किए की इजराइल को युद्ध के अलावा दूसरा कोई पर्याय ही नहीं बचा। 5 जून, 1967 को प्रारंभ हुआ यह युद्ध, मात्र छह दिनों में समाप्त हुआ। इसे सिक्स-डे-वॉर नाम से इतिहास में जाना जाता है।
इस युद्ध में छोटे से इजराइल ने निर्णायक जीत हासिल की थी। युद्ध में इजराइल ने इजिप्त से गाझा पट्टी और सिनाई पेनिन्सुला प्रदेश जीता, तो जॉर्डन से वेस्ट बैंक का क्षेत्र हथिया लिया। सीरिया को भी अपना गोलन हाइट्स का क्षेत्र इजराइल से गवाना पड़ा। कुल मिलाकर इजराइल इस युद्ध से भारी फायदे में रहा। उसके लगभग 800 सैनिक मारे गए। लेकिन इजिप्त, जॉर्डन,और सीरिया के हजारों सैनिक मारे गए। इस युद्ध के बाद अरब देशों में इजराइल की इतनी दहशत हो गई कि तब से आज तक, कुछ छुट-पुट घटनाएं छोड़ दे, तो एक भी बड़ा युद्ध उन्होंने इजराइल के विरुद्ध नहीं लड़ा है।
जब युद्ध में इजराइल को नहीं हरा सकते यह ध्यान में आया तो अरब राष्ट्रों और इस्लामी आतंकवादियों ने इजराइली नागरिकों पर हमले चालू किए। 1974 में जर्मनी के म्यूनिख में संपन्न हुए ओलिंपिक में इस्लामी आतंकवादियों ने इजराइली खिलाड़ियों को अगुवा कर लिया और एक-एक करके सबको समाप्त कर दिया। इस हमले से सारी दुनिया दहल गई, किन्तु आतंकवाद की इस धमकी के आगे न झुकते हुए इजराइली गुप्तचर संस्था मोसाद ने इस हत्याकांड में शामिल सभी आतंकियों को एक-एक करके मौत के घाट उतारा।
मोसाद ने ऐसे और भी अनेक चमत्कारिक ऑपरेशन्स किए हैं। दूसरे विश्व युद्ध में जर्मनी के जिस नाजी सैनिक अधिकारी ने ज्यू समुदाय को बर्बरतापूर्वक मौत के घाट उतारा था, वह युद्ध के बाद फरार हो गया था। मोसाद ने उसे सन 1961 में, अर्जेंटीना के ब्यूनस आयर्स में ढूंढ निकाला। अडोल्फ़ आईशमन नाम का यह हिटलर का साथी वहां नाम और भेष बदलकर रह रहा था। मोसाद के लोगों ने उसे वहां से उठाया। इजराइल पहुचाया। और उस पर कानूनी कार्रवाई की। इजराइल के न्यायालय ने उसे मृत्युदंड की सजा सुनाई।
ऐसा ही एक अद्भुत वाकया हैं, ऑपरेशन एंटेबी । 27 जून, 1976 को मुस्लिम आतंकियों ने एयर फ्रांस का एक हवाई जहाज हाईजैक किया, जिसमें लगभग आधे यात्री ज्यू समुदाय के थे। इस विमान को वो आतंकी, युगांडा के एंटेबी में ले गए। उनकी मांग थी, इजराइल के जेलों में बंद चालीस इस्लामी आतंकियों को रिहा किया जाए। इजराइल ने इसका जबरदस्त जवाब दिया। दुनिया के इतिहास में पहली बार हवाई अपहरण की घटना में आतंकी पूर्णतः परास्त हुए। इजराइल डिफेन्स फोर्सेज (आईडीएफ) ने जवाबी कार्रवाई करते हुए 4 जुलाई, 1976 को अपने 106 यात्रियों में से 102 यात्रियों की सकुशल रिहाई कराई। इस ऑपरेशन में सभी 7 आतंकी मारे गए। उनको प्रश्रय देने वाले 45 युगांडन सैनिक भी मारे गए। युगांडा के एयर फोर्स के लगभग 30 फाईटर जहाज नष्ट किए। इजराइल का मात्र एक सैनिक मारा गया, वो था उनका कैप्टेन – योहन नेतान्याहू। इजराइल के प्रधानमंत्री, बेंजामिन नेतान्याहू का सगा भाई।
ऐसे अनेक, असंभव लगने वाले कारनामे, इज़राइल की सेना ने और उसकी गुप्तचर संस्था मोसाद ने कर दिखाएं हैं। सत्तर के दशक में इराक ने, फ्रांस की मदद से परमाणु बम बनाने की महत्वाकांक्षी योजना बनाई थी। अगर यह बम बन जाता, तो इज़राइल का अस्तित्व निश्चित रूप से खतरे में आता। इसलिए इजराइल के तत्कालीन प्रधानमंत्री मेनशेन बेगीन ने मोसाद को इन परमाणु भट्टियों को नष्ट करने के आदेश दिए। उन दिनों इज़राइल को F-16 युद्धक विमान, नए–नए मिले थे। इज़राइल ने इन्ही विमानों का प्रयोग कर, 7 जून, 1981 को अत्यंत गोपनीय पद्धति से, बम गिराकर इन भट्टियों को नष्ट किया ! सारा अरब जगत देखता रह गया, पर कुछ कर न सका।
युद्ध का अद्भुत कौशल, सुरक्षा में चुस्त, जासूसी में दुनिया में अव्वल यह सब तो इजराइल की विशेषता हैं ही, किन्तु इजराइल इनके परे भी हैं। इजराइल तकनीकी में अग्रेसर राष्ट्र है। यह अत्याधुनिक तकनीक का न सिर्फ प्रयोग करता हैं, वरना निर्माण भी करता हैं। इजराइल को ठीक से समझने के लिए इजराइल को पास से देखना जरूरी हैं।
मैं तीन बार इजराइल गया हूं। तीनों बार अलग-अलग रास्तों से। पहली बार लंदन से गया था। दूसरी बार पेरिस से। लेकिन तीसरी बार मुझे जाने का अवसर मिला, पड़ोसी राष्ट्र जॉर्डन से। राजधानी अम्मान से, रॉयल जॉर्डन एयरलाइन्स के छोटे से एयरक्राफ्ट से तेल अवीव की दूरी मात्र चालीस मिनट की है। मुझे खिड़की की सीट मिली और हवाई जहाज छोटा होने से, तुलना में काफी नीचे से उड़ रहा था। आसमान साफ था। मैं नीचे देख रहा था। मटमैले, कत्थे और भूरे रंग का अथाह फैला रेगिस्तान दिख रहा था। पायलट ने घोषणा की, कि – थोड़ी ही देर में हम नीचे उतरने लगेंगे। और अचानक नीचे का दृश्य बदलने लगा। मटमैले, कत्थे और भूरे रंग का स्थान हरे रंग ने लिया। अपनी अनेक छटाओं को समेटा हरा रंग।
रेगिस्तान तो वही था। मिटटी भी वही थी। लेकिन जॉर्डन की सीमा का इजराइल को स्पर्श होते ही मिटटी ने रंग बदलना प्रारंभ किया। यह कमाल इजराइल का है। उनके मेहनत और जज्बे का है। रेगिस्तान में खेती करने वाला इजराइल आज दुनिया को उन्नत कृषि तकनीकी निर्यात कर रहा है। रोज टनों से फूल और सब्जियां यूरोप को भेज रहा है। आज सारी दुनिया जिस ‘ड्रिप इरीगेशन सिस्टम’ को अपना रही है वह इजराइल की ही देन है।
मात्र अस्सी लाख जनसंख्या का यह देश। तीन से चार घंटे में देश के एक कोने से दूसरे कोने की यात्रा संपन्न होती है। मात्र दो प्रतिशत पानी के भण्डार वाला देश। प्राकृतिक संसाधन नहीं के बराबर। ईश्वर ने भी थोड़ा अन्याय ही किया है। आजु-बाजू के अरब देशों में तेल निकलता है, लेकिन इजराइल में वह भी नहीं।
इजराइल राजनीतिक जीवंतता और समझ की पराकाष्ठा का देश है। इस छोटे से देश में कुल 12 दल हैं। आज तक कोई भी दल अपने बलबूते पर सरकार नहीं बना पाया है। पर एक बात हैं – देश की सुरक्षा, देश का सम्मान, देश का स्वाभिमान और देश हित, इन मुद्दों पर पूर्ण एका है। इन मुद्दों पर कोई भी दल न समझौता करता है, और न ही सरकार गिराने की धमकी देता है। इजराइल का अपना नेशनल एजेंडा, जिसका सम्मान सभी दल करते हैं।
जब इजराइल बना, तब दुनिया के सभी देशों से यहूदी (ज्यू) वहां आये थे। अनेक देशों से आने वाले लोगों की बोली भाषाएं भी अलग-अलग थी। अब प्रश्न उठा की देश की भाषा क्या होना चाहिए ? उनकी अपनी हिब्रू भाषा तो पिछले दो हजार वर्षों से मृतवत पड़ी थी। बहुत कम लोग हिब्रू जानते थे। इस भाषा में साहित्य बहुत कम था। अतः किसी ने सुझाव दिया की अंग्रेजी को देश की संपर्क भाषा बनाई जाए। पर स्वाभिमानी ज्यू इसे कैसे बर्दाश्त करते ? उन्होंने कहा, ‘हमारी अपनी हिब्रू भाषा ही इस देश के बोलचाल की राष्ट्रीय भाषा बनेगी।’
इजराइल सरकार ने मात्र दो महीने में हिब्रू सिखाने का पाठ्यक्रम बनाया। और फिर शुरू हुआ, दुनिया का एक बड़ा भाषाई अभियान। और मात्र पाँच वर्षों में सारा इजराइल हिब्रू के मामले में शत-प्रतिशत साक्षर हो चुका था। आज हिब्रू में अनेक शोध प्रबंध लिखे जा चुके हैं। इतने छोटे से राष्ट्र में इंजीनियरिंग और मेडिकल से लेकर सारी उच्च शिक्षा हिब्रू में होती है। इजराइल को समझने के लिए बाहर के छात्र हिब्रू पढने लगे हैं।
ये है इजराइल.. जीवटता, जिजीविषा और स्वाभिमान का जीवंत प्रतीक..!

- सिद्धार्थ शंकर गौतम
लेखक व पत्रकार
जिस मलेरकोटला की रक्षा का वचन गुरु गोविन्द सिंह जी ने स्वयं दिया था उसी को पंजाब के कांग्रेसी मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने ईद के अगले दिन ही पंजाब का 23 वां व एकमात्र मुस्लिम बहुल जिला बनाकर मुस्लिमों को ईदी का तोहफा दिया है। नए बने जिले में मलेरकोटला शहर, अमरगढ़ और अहमदगढ़ सीमा में आएंगे। गौरतलब है कि 1941 में मलेरकोटला में 38 प्रतिशत आबादी मुसलमानों की थी जबकि सिख 34 प्रतिशत और हिंदू 27 प्रतिशत थे। पूर्व में संगरूर जिले में आने वाला और अब नया जिला बना मलेरकोटला आज मुस्लिम बहुल हो चुका है।
मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने ट्वीट कर कहा कि यह साझा करते हुए खुशी हो रही है कि ईद-उल-फितर के पाक मौके पर मेरी सरकार ने घोषणा की है कि मलेरकोटला राज्य का नवीनतम जिला होगा। 23वें जिले का विशाल ऐतिहासिक महत्व है। जिला प्रशासनिक परिसर के लिए उचित स्थान का तत्काल पता लगान का आदेश दिया है। मलेरकोटला को जिला का दर्जा देना कांग्रेस का चुनाव से पहले किया गया एक वादा था। उन्होंने कहा कि देश की आजादी के वक्त पंजाब में 13 जिले थे। इस दौरान उन्होंने मलेरकोटला में 500 करोड़ रुपए की लागत से मेडिकल कॉलेज, एक महिला कॉलेज, एक नया बस स्टैंड और एक महिला पुलिस थाना बनाने की भी घोषणा की। मेडिकल कॉलेज के लिए वक्फ बोर्ड ने 25 एकड़ जमीन दी है जबकि लड़कियों के कॉलेज के लिए 12 करोड़ और बस स्टैंड के लिए 10 रुपए आवंटित करने की घोषणा भी की गई।
दरअसल, अमरिंदर सिंह ने मुस्लिम बहुल मलेरकोटला को जिला बनाकर कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति को ही आगे बढ़ाया है। इससे पूर्व 1990 में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री जगन्नाथ प्रसाद मिश्र ने मुस्लिम बहुल किशनगंज को जिला बनाकर एक नए विवाद को जन्म दिया था। आज यह क्षेत्र बांग्लादेशी मुस्लिम अवैध घुसपैठियों के लिए स्वर्ग है। इसी प्रकार 2005 में हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा ने मेवात को जिला बनाकर इस क्षेत्र को मिनी पाकिस्तान बना डाला। अभी एक साल पहले तक मेवात में हिन्दुओं के ऊपर हुए अत्याचारों व उनके पलायन की ख़बरों ने देश को झकझोर दिया था।
देखा जाए तो पंजाब की कांग्रेस सरकार ने मुस्लिम बहुल मलेरकोटला को जिला बनाकर अपनी वाम समर्थित विचारधारा का ही परिचय दिया है। बिना वाम विचारधारा के कांग्रेस कुछ नहीं है। मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि 1969 में वरिष्ठ वामपंथी और केरल के तत्कालीन मुख्यमंत्री ई.एम.एस.नम्बूदिरीपाद ने मुस्लिम बहुलता के आधार पर पहली बार मललप्पुरम जिले का गठन किया था जो आज कट्टरवादी मुस्लिमों के संगठन पीएफआई की आतंकी गतिविधियों का गढ़ बन चुका है।
कुल मिलाकर कांग्रेस सदा से ही हिंदुत्व को लेकर असहज रही है और 2014 के बाद राष्ट्रीय फलक पर नरेन्द्र मोदी के आने से उसके सॉफ्ट हिंदुत्व को झटका लगा है। मुस्लिमों के एकजुट वोट बैंक को लेकर उसकी राजनीति हमेशा से ही मुस्लिमों के इर्द-गिर्द चलती रही है। याद कीजिये मनमोहन सिंह सरकार के समय की सच्चर समिति की उस रिपोर्ट को जिसमें कहा गया था कि मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में प्रशासनिक अधिकारी से लेकर अन्य शासकीय नियुक्तियां मुस्लिम होना चाहिए ताकि वहां की बहुसंख्यक आबादी उनके साथ सहज हो। ऐसा होना प्रारंभ भी हुआ था किन्तु नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद इस प्रथा पर रोक लगी।
मुस्लिम समाज भी ऐसा चाहता है कि जहां उसकी बहुतायत हो वहां उन्हीं की कौम के अधिकारी रहें, जबकि यह संविधान की मूल भावना के विरुद्ध है किन्तु इतिहास गवाह है कि कांग्रेस ने कभी संविधान के हिसाब से चलना स्वीकार नहीं किया है। अब जबकि हिन्दू कांग्रेस की मुस्लिमपरस्ती को समझ चुका है वह एक बार पुनः मुस्लिम वोट बैंक के सहारे देश में धर्म के नाम पर विभेद पैदा कर राज करने की मंशा पाले बैठी है। मुस्लिम बहुल मलेरकोटला को जिला बनाने का निर्णय हमें इसी परिपेक्ष्य में देखने की आवश्यकता है।
अब सवाल यह है कि मुस्लिम बहुल जिलों के इतिहास को देखते हुए क्या मलेरकोटला शांत रह पायेगा? क्या यहाँ रहने वाले सिख और हिन्दू भाई-बहन सुरक्षित रहेंगे? क्या फतेहगढ़ साहिब गुरुद्वारा (जिस स्थान पर गुरु गोविन्द सिंह जी के दोनों बेटों को दीवार में जिन्दा चुनवा दिया गया था उन्हीं की याद में बनाया गया) और किसी अशांति का गवाह नहीं बनेगा? क्या कांग्रेस भारत में अन्दर ही अन्दर कई पाकिस्तान बनाने का प्रयास कर रही है? प्रश्न कई हैं जिनका उत्तर भविष्य के गर्भ में है। फिलहाल तो सिख-मुस्लिम भाई-भाई के नारे पर चढ़कर पंजाब की कांग्रेस सरकार सेकुलरिज्म की नई मिसाल पेश कर रही है।
