वन संरक्षण कानून संशोधन पर कांग्रेस ने केंद्र सरकार को घेरा
नई दिल्ली। कांग्रेस ने वन संरक्षण कानून में वर्ष 2023 में किए गए संशोधनों को लेकर केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। पार्टी का कहना है कि इन बदलावों के जरिए देश में वन प्रबंधन को धीरे-धीरे निजी हाथों में सौंपने की प्रक्रिया शुरू हो गई है, जो पर्यावरण सुरक्षा और पारंपरिक वन नीति के लिए खतरनाक साबित हो सकती है।
कांग्रेस महासचिव और पूर्व केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा 2 जनवरी को जारी एक सर्कुलर का हवाला देते हुए कहा कि सरकार के फैसलों से जंगलों के संरक्षण की मूल भावना कमजोर हो रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि अगस्त 2023 में वन संरक्षण अधिनियम, 1980 में किए गए संशोधन संसद में जल्दबाजी में पारित कराए गए थे।
जयराम रमेश के अनुसार, संशोधन के तहत न केवल कानून का नाम बदलकर वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम किया गया, बल्कि जंगलों के संचालन और प्रबंधन से जुड़े प्रावधानों में भी बड़े बदलाव किए गए। उन्होंने कहा कि उस समय कांग्रेस ने चेताया था कि इन संशोधनों से निजी संस्थाओं के लिए जंगलों में प्रवेश का रास्ता खुलेगा और अब मंत्रालय का ताजा सर्कुलर उसी दिशा में संकेत दे रहा है।
कांग्रेस नेता ने यह भी कहा कि मौजूदा कदम केवल शुरुआत है और आने वाले समय में इससे जंगलों के व्यावसायिक इस्तेमाल को और बढ़ावा मिल सकता है। पार्टी का आरोप है कि इससे पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता और स्थानीय समुदायों के हितों पर नकारात्मक असर पड़ेगा।
मंत्रालय के सर्कुलर के मुताबिक, यदि राज्य सरकारें किसी सरकारी या गैर-सरकारी संस्था के साथ मिलकर प्राकृतिक पुनरुत्पादन, वृक्षारोपण या वन प्रबंधन से जुड़ी गतिविधियां संचालित करती हैं, तो इन्हें वन गतिविधि माना जाएगा। ऐसे मामलों में प्रतिपूरक वनीकरण और नेट प्रेजेंट वैल्यू (एनपीवी) के भुगतान जैसी शर्तें लागू नहीं होंगी। इसके साथ ही राज्यों को यह अधिकार भी दिया गया है कि वे इन गतिविधियों से होने वाले राजस्व के बंटवारे का ढांचा स्वयं तय करें।
कांग्रेस का कहना है कि इन प्रावधानों से जंगलों के निजी और व्यावसायिक प्रबंधन की राह आसान हो गई है, जिस पर सरकार को पुनर्विचार करना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को दी जमानत
नई दिल्ली। साल 2020 के दिल्ली दंगा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जमानत याचिकाओं पर अहम फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार करते हुए स्पष्ट किया कि केवल लंबे समय तक जेल में रहना या ट्रायल में देरी, अपने आप में जमानत का आधार नहीं बन सकता। हालांकि कोर्ट ने मामले के अन्य आरोपियों को राहत देते हुए उन्हें जमानत प्रदान कर दी है।
अन्य आरोपियों को मिली राहत
सुप्रीम कोर्ट ने गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को जमानत देने का आदेश दिया। अदालत ने कहा कि इन आरोपियों की भूमिका और उनके खिलाफ लगाए गए आरोप, उमर खालिद और शरजील इमाम की तुलना में अलग प्रकृति के हैं, जिस आधार पर उन्हें राहत दी जा सकती है।
ट्रायल में देरी को नहीं माना जा सकता जमानत का आधार
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने अपने फैसले में साफ कहा कि मुकदमे की सुनवाई में देरी को “ट्रंप कार्ड” के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने चेताया कि यदि केवल देरी के आधार पर जमानत दी जाने लगे, तो विशेष कानूनों के तहत बनाए गए वैधानिक सुरक्षा प्रावधान स्वतः ही कमजोर हो जाएंगे।
उमर खालिद और शरजील पर गंभीर आरोप
अदालत ने कहा कि उमर खालिद और शरजील इमाम के खिलाफ गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम कानून (UAPA) के तहत प्रथम दृष्टया गंभीर आरोप बनते हैं। कोर्ट के अनुसार, इस स्तर पर यह नहीं कहा जा सकता कि अभियोजन पक्ष का मामला कमजोर है, इसलिए दोनों को फिलहाल जमानत नहीं दी जा सकती।
दिसंबर में सुरक्षित रखा गया था फैसला
गौरतलब है कि 10 दिसंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने सभी आरोपियों की जमानत याचिकाओं पर सुनवाई पूरी करने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। अदालत ने दोनों पक्षों को 18 दिसंबर तक अपनी दलीलों के समर्थन में आवश्यक दस्तावेज जमा करने का निर्देश भी दिया था।
पुलिस का पक्ष और आरोप
दिल्ली पुलिस के अनुसार, उमर खालिद, शरजील इमाम समेत अन्य आरोपी फरवरी 2020 में हुई हिंसा के कथित साजिशकर्ता थे। पुलिस का दावा है कि इस हिंसा में 53 लोगों की मौत हुई और 700 से अधिक लोग घायल हुए थे। आरोप है कि नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के विरोध के दौरान भड़की हिंसा का उद्देश्य केवल प्रदर्शन नहीं, बल्कि बड़े स्तर पर अशांति फैलाना था।
दिल्ली दंगों की पृष्ठभूमि
पूर्वोत्तर दिल्ली में फरवरी 2020 में CAA और NRC के विरोध के दौरान हिंसा भड़क उठी थी। आगजनी, पथराव और झड़पों की घटनाओं ने पूरे इलाके को अपनी चपेट में ले लिया था। इस मामले में कई सामाजिक कार्यकर्ताओं, छात्रों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं को आरोपी बनाया गया, जिनमें से कुछ को अब सुप्रीम कोर्ट से राहत मिली है, जबकि कुछ को अभी भी जेल में रहना होगा।
कर्नाटक- कर्नाटक के हुबली में एक 13 वर्षीय लड़की के साथ यौन उत्पीड़न के मामले में पुलिस ने तीन नाबालिग लड़कों के खिलाफ कार्रवाई की है। पुलिस ने बताया कि आरोपियों की उम्र 14 से 15 वर्ष के बीच है और उनके खिलाफ बाल यौन उत्पीड़न संरक्षण अधिनियम (POCSO) तथा किशोर न्याय (देखभाल एवं संरक्षण) अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया है।
पुलिस के अनुसार, यह मामला पिछले सात से आठ दिनों तक चलने वाली घटनाओं से जुड़ा है। लड़की के माता-पिता दिन के समय घर से बाहर रहते थे, और इसी दौरान आरोपियों ने घटना को अंजाम दिया।
हुबली-धारवाड़ के पुलिस आयुक्त एन. शशिकुमार ने बताया कि तीनों नाबालिगों को हिरासत में ले लिया गया है और आवश्यक कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि मामले की गहन जांच जारी है और पीड़िता की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सभी कदम उठाए जा रहे हैं।
पुलिस ने परिवार के सहयोग से लड़की की सुरक्षा सुनिश्चित की है। अधिकारियों ने यह भी बताया कि मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए आगे की जांच बंद कमरे और विशेषज्ञों की मौजूदगी में की जा रही है।
हालांकि हुबली मामला हाल ही का है, लेकिन यह भारत में बढ़ते बाल यौन अपराधों की चिंता को फिर से उजागर करता है। जनवरी में उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में चार वर्षीय बच्ची के साथ हुई हिंसक घटना ने देश में सुरक्षा और जागरूकता की अहमियत को रेखांकित किया था।
घुसपैठिए के पास से पाकिस्तानी मुद्रा और चाकू बरामद
जैसलमेर। राजस्थान के जैसलमेर जिले में अंतरराष्ट्रीय सीमा पर सुरक्षा बलों ने सतर्कता के चलते एक बड़ी घुसपैठ की कोशिश को नाकाम कर दिया। सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) ने भारतीय सीमा में अवैध रूप से प्रवेश करने का प्रयास कर रहे एक पाकिस्तानी नागरिक को हिरासत में लिया है। यह कार्रवाई नाचना–नोक सेक्टर से सटे सीमावर्ती इलाके में की गई।
बीएसएफ अधिकारियों के मुताबिक पकड़ा गया व्यक्ति प्रारंभिक जांच में मानसिक रूप से असंतुलित प्रतीत हो रहा है। हालांकि उसकी वास्तविक स्थिति, मंशा और पृष्ठभूमि की पुष्टि विस्तृत चिकित्सीय परीक्षण और संयुक्त पूछताछ केंद्र (JIC) में जांच के बाद ही हो सकेगी। शुरुआती पूछताछ में उसने अपना नाम इश्रात (35 वर्ष), पुत्र राणा मोहम्मद असलम बताया है और खुद को पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के सरगोधा जिले का निवासी बताया।
तलाशी के दौरान उसके पास से पाकिस्तानी मुद्रा, एक चाकू और कुछ अन्य संदिग्ध सामान बरामद किया गया है। इसके बाद बीएसएफ ने उसे आगे की कानूनी कार्रवाई के लिए नोक थाना पुलिस को सौंप दिया।
सुरक्षा एजेंसियां और पुलिस इस पूरे मामले की गहन जांच कर रही हैं। जांच का उद्देश्य यह पता लगाना है कि व्यक्ति किस रास्ते से सीमा पार कर भारत में दाखिल हुआ और क्या इस घटना के पीछे किसी प्रकार की सुरक्षा से जुड़ी साजिश तो नहीं है। सीमा पर सुरक्षा व्यवस्था को लेकर एजेंसियां अतिरिक्त सतर्कता बरत रही हैं।
जयराम रमेश बोले—भारत-पाक तनाव पर चीन की मध्यस्थता का दावा चिंताजनक
नई दिल्ली। भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव कम कराने को लेकर चीन द्वारा किए गए मध्यस्थता के दावे पर सियासी घमासान तेज हो गया है। कांग्रेस ने इन बयानों को गंभीर और चिंताजनक बताते हुए केंद्र सरकार से इस पर स्पष्ट जवाब देने की मांग की है। पार्टी का कहना है कि ऐसे संवेदनशील मुद्दे पर चुप्पी देश की सुरक्षा से जुड़े सवाल खड़े करती है।
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इस मामले में स्थिति साफ करने की अपील की है। उन्होंने कहा कि चीन जैसे देश, जो खुले तौर पर पाकिस्तान का समर्थन करता रहा है, उसके द्वारा भारत-पाक संबंधों में मध्यस्थता का दावा करना राष्ट्रीय हितों के खिलाफ है और इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता।
सरकार की चुप्पी पर कांग्रेस का सवाल
जयराम रमेश ने सोशल मीडिया पर जारी बयान में कहा कि इससे पहले अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी यह दावा कर चुके हैं कि उन्होंने मई 2025 में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ को रोकने में भूमिका निभाई थी। कांग्रेस का आरोप है कि प्रधानमंत्री ने अब तक इन दावों पर कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं दी। अब चीन के विदेश मंत्री द्वारा इसी तरह का बयान सामने आने से स्थिति और गंभीर हो गई है।
कांग्रेस नेता ने यह भी याद दिलाया कि चार जुलाई 2025 को भारतीय सेना के उप प्रमुख राहुल सिंह ने स्पष्ट रूप से कहा था कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान भारत को चीन की ओर से रणनीतिक चुनौती का सामना करना पड़ा था। ऐसे में चीन द्वारा मध्यस्थता का दावा कई सवाल खड़े करता है।
ऑपरेशन सिंदूर और चीन की भूमिका पर उठे सवाल
कांग्रेस ने कहा कि चीन की पाकिस्तान के प्रति झुकी हुई नीति जगजाहिर है। ऐसे में भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव कम कराने में उसकी भूमिका का दावा न सिर्फ विरोधाभासी है, बल्कि यह देशवासियों को दिए गए भरोसे के भी खिलाफ है। पार्टी ने आरोप लगाया कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दे को हल्के में लेने जैसा है।
जयराम रमेश ने भारत-चीन संबंधों का जिक्र करते हुए कहा कि 2020 में चीन को लेकर दिए गए बयानों से भारत की कूटनीतिक स्थिति कमजोर हुई है। उन्होंने कहा कि आज भारत का व्यापार घाटा बढ़ा हुआ है और कई क्षेत्रों में चीन पर निर्भरता बनी हुई है। ऐसे हालात में यह जानना जरूरी है कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ को रोकने में चीन की कथित भूमिका क्या थी।
क्या है चीन का दावा
गौरतलब है कि चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने हाल ही में कहा था कि भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव कम करना चीन की इस साल की कूटनीतिक सफलताओं में शामिल है। इस बयान के बाद भारतीय राजनीति में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।
भारत का आधिकारिक रुख
भारत सरकार लगातार यह स्पष्ट करती रही है कि मई 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच उत्पन्न हालात दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों के बीच सीधी बातचीत से सुलझाए गए थे। नई दिल्ली का स्पष्ट मत है कि भारत-पाकिस्तान से जुड़े मामलों में किसी भी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता स्वीकार्य नहीं है।
बंगाल चुनाव से पहले गरमाई सियासत , अमित शाह ने टीएमसी पर साधा निशाना
कोलकाता। पश्चिम बंगाल में प्रस्तावित विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक माहौल तेजी से गरमाता जा रहा है। राज्य में सभी प्रमुख दल रणनीति बनाने में जुटे हैं, वहीं आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी तेज हो गया है। इसी क्रम में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कोलकाता में आयोजित प्रेस वार्ता में राज्य की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर तीखा हमला बोला। शाह ने घुसपैठ, भ्रष्टाचार, प्रशासनिक विफलता और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों को लेकर राज्य सरकार को कटघरे में खड़ा किया।
घुसपैठ चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा बनेगा— अमित शाह
अमित शाह ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी राजनीतिक फायदे के लिए बांग्लादेश से हो रही अवैध घुसपैठ को नजरअंदाज कर रही हैं। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा सीमा पर बाड़ लगाने के लिए जमीन उपलब्ध नहीं कराई जा रही, जिसके कारण घुसपैठ पर प्रभावी रोक नहीं लग पा रही है। शाह ने स्पष्ट किया कि वर्ष 2026 का विधानसभा चुनाव घुसपैठ रोकने और सीमा सुरक्षा जैसे मुद्दों पर लड़ा जाएगा।
टीएमसी शासन में भय और भ्रष्टाचार का माहौल— शाह
गृह मंत्री ने दावा किया कि पिछले 15 वर्षों में टीएमसी शासन के दौरान पश्चिम बंगाल में भ्रष्टाचार, डर और प्रशासनिक अराजकता बढ़ी है। उन्होंने कहा कि आम नागरिक खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं और विकास कार्य ठप पड़े हैं। शाह ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार की जनकल्याणकारी योजनाएं राज्य में ‘टोल सिंडिकेट’ और भ्रष्ट तंत्र की भेंट चढ़ रही हैं, जिससे गरीब और जरूरतमंद वर्ग को लाभ नहीं मिल पा रहा।
सीमा पर बाड़बंदी में अड़चन का आरोप
अमित शाह ने कहा कि भारत-बांग्लादेश सीमा पर सुरक्षा बाड़ लगाने के लिए केंद्र सरकार पूरी तरह तैयार है, लेकिन राज्य सरकार जमीन उपलब्ध नहीं करा रही। उन्होंने सवाल उठाया कि जब त्रिपुरा, असम, राजस्थान, पंजाब, जम्मू-कश्मीर और गुजरात में घुसपैठ पर काफी हद तक नियंत्रण हो चुका है, तो केवल पश्चिम बंगाल में यह समस्या क्यों बनी हुई है।
शाह ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार की जानकारी में ही अवैध घुसपैठ हो रही है और इसका उद्देश्य जनसंख्या संतुलन बदलकर वोट बैंक को मजबूत करना है। उन्होंने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा गंभीर विषय बताया।
ममता बनर्जी को लिखे सात पत्र— शाह
एक सवाल के जवाब में गृह मंत्री ने बताया कि उन्होंने व्यक्तिगत रूप से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को सात पत्र लिखे हैं, लेकिन अब तक जमीन देने को लेकर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। उन्होंने कहा कि गृह सचिव समेत केंद्रीय अधिकारियों की कई बैठकों के बावजूद समाधान नहीं निकला। शाह ने यह भी आरोप लगाया कि राज्य सरकार घुसपैठियों के फर्जी दस्तावेज तैयार करा रही है, जिससे समस्या और गंभीर होती जा रही है।
2026 में भाजपा सरकार बनने का दावा
अमित शाह ने दावा किया कि 2026 के विधानसभा चुनाव में भाजपा पश्चिम बंगाल में दो-तिहाई बहुमत के साथ सरकार बनाएगी। उन्होंने भाजपा के बढ़ते जनाधार का हवाला देते हुए कहा कि पार्टी ने पिछले एक दशक में राज्य में लगातार मजबूती हासिल की है। उन्होंने विभिन्न चुनावों के आंकड़े गिनाते हुए कहा कि भाजपा का वोट शेयर और सीटें लगातार बढ़ी हैं, जबकि कांग्रेस और वाम दल हाशिये पर चले गए हैं।
संस्कृति और विकास को नई दिशा देने का वादा
शाह ने कहा कि भाजपा की सरकार बनने के बाद पश्चिम बंगाल की सांस्कृतिक विरासत को संजोने और विकास को नई गति देने का काम किया जाएगा। उन्होंने कहा कि बंगाल भाजपा के लिए ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि पार्टी के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का इस धरती से गहरा नाता रहा है।
गृह मंत्री ने भरोसा दिलाया कि भाजपा सरकार गरीबों के कल्याण, कानून-व्यवस्था सुधार और घुसपैठ पर सख्त नियंत्रण को प्राथमिकता देगी। उन्होंने कहा कि भाजपा बंगाल में बदलाव, सुरक्षा और विकास का नया अध्याय लिखना चाहती है।
पीड़ित पक्ष को न्याय की उम्मीद, सेंगर को मिली राहत पर सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप
नई दिल्ली। उन्नाव दुष्कर्म मामले में भाजपा के पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर से जुड़ा मामला एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। शीर्ष अदालत ने इस प्रकरण में सुनवाई करते हुए सेंगर को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। साथ ही अदालत ने दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश पर फिलहाल रोक लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मामले में विस्तृत आदेश बाद में जारी किया जाएगा।
दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट की रोक
दरअसल, यह सुनवाई केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की उस याचिका पर हुई, जिसमें दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा कुलदीप सिंह सेंगर की उम्रकैद की सजा निलंबित किए जाने के फैसले को चुनौती दी गई थी। दिल्ली हाईकोर्ट ने 23 दिसंबर को सेंगर को राहत देते हुए उसकी सजा पर रोक लगा दी थी। इसके बाद सीबीआई ने इस निर्णय के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है।
अन्य याचिकाओं पर भी होगी सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले से जुड़ी अधिवक्ता अंजलि पटेल और पूजा शिल्पकार की ओर से दायर याचिकाओं पर भी सुनवाई होनी है। उन्नाव दुष्कर्म मामला देश के सबसे संवेदनशील और चर्चित मामलों में शामिल रहा है, ऐसे में शीर्ष अदालत का फैसला बेहद अहम माना जा रहा है।
पीड़ित पक्ष का विरोध प्रदर्शन, न्याय की उम्मीद
इससे पहले रविवार को उन्नाव दुष्कर्म पीड़िता और उसकी मां ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर सेंगर को मिली राहत का विरोध किया था। प्रदर्शन के दौरान बड़ी संख्या में लोग हाथों में बैनर और तख्तियां लिए नजर आए। पीड़िता की मां ने कहा कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट पर पूरा भरोसा है और उन्हें न्याय मिलने की उम्मीद है। उन्होंने आरोप लगाया कि केस वापस लेने का दबाव बनाया जा रहा है।
सुरक्षा की मांग
पीड़िता ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से अपील करते हुए कहा कि उन्हें और उनके परिवार को पर्याप्त सुरक्षा दी जाए, ताकि वे बिना किसी डर के अपनी कानूनी लड़ाई जारी रख सकें। पीड़ित पक्ष का कहना है कि वे हर हाल में न्याय के लिए संघर्ष करते रहेंगे।
BS6 से कम बाहरी वाहनों की दिल्ली में एंट्री पर स्थायी रोक
नई दिल्ली। राष्ट्रीय राजधानी में लगातार बिगड़ते वायु गुणवत्ता स्तर को देखते हुए दिल्ली सरकार ने प्रदूषण नियंत्रण के लिए बड़ा और दीर्घकालिक फैसला लिया है। पर्यावरण संरक्षण की दिशा में अब अस्थायी उपायों की जगह स्थायी नियम लागू किए जा रहे हैं, ताकि आने वाले समय में राजधानी को गंभीर प्रदूषण संकट से बचाया जा सके।
दिल्ली के पर्यावरण मंत्री मजिंदर सिंह सिरसा ने जानकारी देते हुए बताया कि ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (GRAP) के चौथे चरण के तहत लागू की जाने वाली दो अहम पाबंदियों को अब स्थायी रूप से लागू कर दिया गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अब राजधानी में बिना वैध प्रदूषण नियंत्रण प्रमाण पत्र (PUCC) के किसी भी वाहन को पेट्रोल, डीजल या सीएनजी नहीं दिया जाएगा। यह नियम सभी पेट्रोल पंपों पर हर समय लागू रहेगा, न कि केवल प्रदूषण के आपात हालात में।
इसके साथ ही दिल्ली की सीमाओं पर भी सख्ती बढ़ा दी गई है। सरकार ने फैसला किया है कि भारत स्टेज-6 (BS6) मानकों से कम उत्सर्जन वाली बाहरी गाड़ियों को दिल्ली में प्रवेश की अनुमति नहीं दी जाएगी। यानी BS3 और BS4 श्रेणी के वाहन अब राजधानी में नहीं आ सकेंगे। केवल BS6 मानकों पर खरे उतरने वाले, इलेक्ट्रिक और सीएनजी वाहन ही दिल्ली में प्रवेश कर पाएंगे।
पर्यावरण मंत्री ने कहा कि मौसम विभाग द्वारा आने वाले दिनों में वेस्टर्न डिस्टर्बेंस के कारण मौसम के फिर से बिगड़ने की आशंका जताई गई है, जिससे प्रदूषण का स्तर और बढ़ सकता है। ऐसे में सरकार लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए है और समय रहते कड़े कदम उठा रही है। उन्होंने कहा कि सरकार की प्राथमिकता है कि दिल्ली के लोगों को दोबारा प्रदूषण के गंभीर हालात का सामना न करना पड़े।
सरकार का मानना है कि वाहनों से होने वाले उत्सर्जन को नियंत्रित किए बिना वायु गुणवत्ता में सुधार संभव नहीं है। इसी वजह से इन दोनों नियमों को स्थायी बनाकर प्रदूषण पर दीर्घकालिक नियंत्रण की दिशा में ठोस कदम उठाया गया है।
नई दिल्ली- देश की सर्वोच्च अदालत ने दुष्कर्म से जुड़े एक मामले में अहम फैसला देते हुए आरोपी को बड़ी राहत दी है। सुप्रीम कोर्ट ने न सिर्फ दोषसिद्धि को रद्द किया, बल्कि 10 साल की सजा को भी समाप्त कर दिया। अदालत ने माना कि यह मामला आपसी सहमति से बने संबंधों का था, जिसे परिस्थितियों और गलतफहमी के चलते आपराधिक विवाद का रूप दे दिया गया।
यह मामला मध्य प्रदेश से जुड़ा है, जहां ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को दुष्कर्म का दोषी ठहराते हुए सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी। बाद में हाईकोर्ट ने भी सजा पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। इसके बाद आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। शीर्ष अदालत में सुनवाई के दौरान पूरे प्रकरण की गहराई से समीक्षा की गई।
न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने मामले के सामाजिक और मानवीय पहलुओं पर भी विचार किया। अदालत ने दोनों पक्षों से उनके परिजनों की मौजूदगी में संवाद किया। बातचीत के बाद यह स्पष्ट हुआ कि दोनों के बीच लंबे समय से संबंध थे और अब वे अपने रिश्ते को वैवाहिक रूप दे चुके हैं। जुलाई 2025 में दोनों का विवाह भी हो गया।
अदालत ने पाया कि दोनों की जान-पहचान वर्ष 2015 में सोशल मीडिया के माध्यम से हुई थी और समय के साथ संबंध गहरे होते चले गए। शिकायतकर्ता ने शादी में देरी को लेकर असुरक्षा महसूस की, जिसके बाद मामला दर्ज कराया गया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस पूरे घटनाक्रम में आपराधिक मंशा के स्पष्ट संकेत नहीं मिलते।
पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 का प्रयोग करते हुए एफआईआर, निचली अदालत का फैसला और सजा सभी को निरस्त कर दिया। अदालत ने कहा कि अब जब दोनों साथ रह रहे हैं और वैवाहिक जीवन व्यतीत कर रहे हैं, तो मुकदमे को आगे बढ़ाने का कोई औचित्य नहीं रह जाता।
इसके साथ ही अदालत ने आरोपी की नौकरी से जुड़ा मसला भी सुलझाया। आपराधिक मामले के चलते उसे निलंबित कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित विभाग को निलंबन समाप्त करने और बकाया वेतन जारी करने के निर्देश दिए। वहीं, हाईकोर्ट में लंबित अपील को भी निरर्थक घोषित कर दिया गया।
अरावली विवाद पर भूपेंद्र यादव का पलटवार, कांग्रेस के आरोप किए खारिज
नई दिल्ली। अरावली पर्वतमाला को लेकर चल रहे सियासी विवाद के बीच केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने कांग्रेस के आरोपों पर तीखा पलटवार किया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पहाड़ियों की परिभाषा में बदलाव से अरावली का कोई हिस्सा संरक्षण से बाहर नहीं होगा और कांग्रेस द्वारा फैलाया जा रहा भ्रम तथ्यों से परे है।
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि कांग्रेस इस मुद्दे पर इसलिए असहज है क्योंकि केंद्र सरकार ने गुजरात से लेकर दिल्ली तक पूरी अरावली पर्वतमाला में खनन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि किसी भी वैज्ञानिक या आधिकारिक अध्ययन में यह साबित नहीं होता कि नई परिभाषा से अरावली के 90 प्रतिशत हिस्से को नुकसान पहुंचेगा।
दरअसल, कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने आरोप लगाया था कि पर्वतीय श्रृंखलाओं की परिभाषा में बदलाव से अरावली क्षेत्र का बड़ा हिस्सा संरक्षण के दायरे से बाहर चला जाएगा, जिससे खनन और अन्य गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए भूपेंद्र यादव ने कहा कि भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) के किसी भी अध्ययन में ऐसे दावों की पुष्टि नहीं होती है।
भूपेंद्र यादव ने कांग्रेस पर हमला बोलते हुए कहा कि अगर विपक्ष पर्यावरण संरक्षण को लेकर वास्तव में गंभीर होता, तो उसे यह भी बताना चाहिए कि अरावली क्षेत्र को सबसे ज्यादा नुकसान किसके शासनकाल में हुआ। उन्होंने कांग्रेस नेताओं से सवाल किया कि वे अपने ही दल के वरिष्ठ नेताओं से अरावली के क्षरण को लेकर जवाब क्यों नहीं मांगते।
केंद्रीय मंत्री ने यह भी कहा कि सरकार अरावली पर्वतमाला को संरक्षित और पुनर्जीवित करने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने आरोप लगाया कि पूर्ववर्ती सरकारों के दौरान इस क्षेत्र में अवैध खनन और अंधाधुंध गतिविधियों से भारी नुकसान हुआ, जिसकी भरपाई अब की जा रही है।
गौरतलब है कि हाल ही में पहाड़ियों की नई परिभाषा तय की गई है, जिसके अनुसार किसी क्षेत्र को पहाड़ी तब माना जाएगा जब उसकी ऊंचाई आसपास के भूभाग से कम से कम 100 मीटर अधिक हो। वहीं, अरावली पर्वतमाला को दो या उससे अधिक ऐसी पहाड़ियों के समूह के रूप में परिभाषित किया गया है, जो 500 मीटर के दायरे में स्थित हों। विवाद बढ़ने के बाद केंद्र सरकार ने राज्यों को निर्देश जारी करते हुए अरावली क्षेत्र में नए खनन पट्टों पर पूरी तरह रोक लगाने का आदेश दिया है।
