उत्तराखंड

हर साल फीस में उछाल, लेकिन शिक्षक रह गए बेहाल, ये है निजी स्कूलों का हाल..

हर साल फीस में उछाल, लेकिन शिक्षक रह गए बेहाल, ये है निजी स्कूलों का हाल..

 

उत्तराखंड: प्रदेश के निजी स्कूल एक बार फिर सुर्खियों में हैं। इस बार वजह है शिक्षकों को मिलने वाला कम वेतन, जबकि दूसरी ओर अभिभावकों से बढ़ी हुई फीस और गैरज़रूरी चार्ज के नाम पर मोटी रकम वसूली जा रही है। सवाल उठता है कि जिन स्कूलों में लाखों रुपये की फीस ली जाती है, वहीं शिक्षकों की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर क्यों है? अभिभावकों का कहना है कि वे हर महीने भारी-भरकम फीस भरते हैं, जिसमें ट्यूशन फीस, स्मार्ट क्लास चार्ज, डेवलपमेंट फीस और एडमिनिस्ट्रेशन फीस जैसी कई मदें शामिल होती हैं। इसके बावजूद शिक्षकों को मानदेय के नाम पर न्यूनतम वेतन से भी कम राशि दी जाती है। बात करें प्राथमिक कक्षाओं की तो कई स्कूलों में शिक्षकों को 5 से 8 हजार रुपये प्रति माह तक पर काम कराया जा रहा है। वहीं उच्च कक्षाओं के शिक्षक भी मुश्किल से 15 से 20 हजार के दायरे में सिमटे हुए हैं। इससे उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति पर गंभीर असर पड़ रहा है। शिक्षक संगठनों और कुछ अभिभावक संघों ने इस पर नाराजगी जताते हुए सरकार से सख्त कदम उठाने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि स्कूल भारी-भरकम फीस वसूल रहे हैं, तो उन्हें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि शिक्षकों को सम्मानजनक वेतन मिले

अभिभावकों से अक्सर तर्क दिया जाता है कि स्कूल फीस इसलिए बढ़ाते हैं क्योंकि हर साल शिक्षकों की तनख्वाह भी बढ़ाई जाती है. लेकिन जमीनी हकीकत इससे कोसों दूर है। आज भी प्रदेश के सैकड़ों निजी स्कूलों में शिक्षक और कर्मचारी बेहद कम वेतन में काम करने को मजबूर हैं। दिलचस्प बात ये है कि सरकार ने पहले ही इस पर एक स्पष्ट आदेश जारी कर रखा है। आपको बता दे कि 26 जून 2007 को तत्कालीन शिक्षा सचिव डीके कोटिया ने निर्देश दिए थे कि राज्य के आईसीएसई और सीबीएसई स्कूलों को शिक्षकों और कर्मियों को वेतन और भत्ते उसी स्तर पर देने होंगे, जैसे सरकार सहायता प्राप्त स्कूलों में देती है। लेकिन आज भी ये आदेश शिक्षा विभाग की फाइलों में धूल फांक रहा है।

स्कूल प्रबंधन अपने हिसाब से तय करता है शिक्षकों का वेतन..
2018 में सीबीएसई ने अपने एफिलिएशन बायलॉज के अध्याय-5 में साफ कर दिया था कि निजी स्कूलों को अपने स्टाफ को सरकार द्वारा तय मानकों के अनुरूप वेतन देना होगा। इस आदेश के बाद भी अधिकांश स्कूल प्रबंधन अपने हिसाब से शिक्षकों का वेतन तय करते हैं। जिसकी न कोई तय नीति है, न पारदर्शिता।

 

 

 

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