भारत के औषधि नियन्त्रण महानिदेशक (Drug Controller General of India-DCGI) ने मध्यम श्रेणी के कोविड-19 लक्षणों वाले रोगियों के उपचार के लिए जाईडस कैडिला द्वारा निर्मित वाईराफिन (Virafin) के सीमित उपयोग की आपात स्वीकृति दे दी है। इस दवा का उपयोग करने के बाद 91.5 प्रतिशत रोगियों का आरटी-पीसीआर परीक्षण सातवें दिन नेगेटिव मिला और रोगियों में अतिरिक्त ऑक्सीजन लेने की जरुरत में उल्लेखनीय कमी आई।
केंद्र सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा जारी एक बयान में कहा गया है कि चिकित्सकीय अध्ययनों से यह जानकारी मिली है कि कोविड संक्रमित रोगियों में से बड़ी संख्या में जिन रोगियों को त्वचा के नीचे इंजेक्शन के रूप में वाईराफिन दी गई उनकी आरटी-पीसीआर रिपोर्ट एक सप्ताह बाद निगेटिव आई, जो कि अन्य एंटी -वाइरल दवाओं की तुलना में बेहतर परिणाम है।
अध्ययनों से वाईराफिन की सुरक्षित होने, सहनशीलता और प्रभावशीलता की पुष्टि हुई है। अध्ययनों से यह भी जानकारी मिली कि वाईराफिन वाइरल लोड में कमी लाने के साथ-साथ इस रोग का बेहतर तरीके से उपचार करने में कारगर है। इसमें पूरक ऑक्सीजन की आवश्यकता में कमी लाना शामिल है, जिससे ऑक्सीजन का स्तर घटने के कारण सांस लेने में हो रही कठिनाइयों को कम किया जा सकता है।
Just like the ‘whole of society’ & ‘whole of govt’, our scientists keep on contributing to the fight against #COVID19
GoI is committed to supporting each & every positive endeavour to end this #pandemic#Unite2FightCorona #Virafin @PMOIndia @DBTIndia @ZydusUniverse @BIRAC_2012 https://t.co/K0mu1GazYr
— Dr Harsh Vardhan (@drharshvardhan) April 24, 2021
इस उपलब्धि की चर्चा करते हुए केंद्र सरकार की जैव प्रौद्योगिकी विभाग की सचिव डॉ. रेणु स्वरूप ने कहा कि – सरकार कोविड-19 महामारी के विरुद्ध शमन रणनीतियों और हस्तक्षेप की दिशा में काम करने के लिए देश में उद्योगों को हर संभव सुविधा प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है। वाईराफिन को दी गई आपात स्वीकृति इस दिशा में एक नया पड़ाव है।
कैडिला हैल्थकेयर लिमिटेड के प्रबंध निदेशक डॉ.शर्विल पी.पटेल ने कहा कि – यह अनुभूति हो रही है कि अब हम एक ऐसा उपचार देने में सक्षम हैं जिससे वायरल लोड को काफी हद तक कम किया जा सकता है और इस संक्रमण की शुरुआत में ही इस रोग का बेहतर ढंग से उपचार में मदद मिल सकती है। यह ऐसे समय आई है जब रोगियों को इसकी आवश्यकता है।
उत्तराखंड में कोरोना महामारी अपना कहर बरपा रही है। संक्रमितों के साथ मौत का आंकड़ा बढ़ता जा रहा है। इस बीच, शनिवार को टिहरी जिले से एक बड़ी खबर सामने आयी है। जिले के राजकीय नर्सिंग कॉलेज सुरसिंग धार के 95 छात्र- छात्राएं कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं। इनमें अधिकांश छात्राएं हैं, जो कॉलेज के छात्रावास में रहती हैं। संक्रमितों को कॉलेज छात्रावास में आइसोलेट कर दिया गया है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार इन छात्रों के सैंपल करीब पांच दिन पूर्व लिए गए थे, जिसकी रिपोर्ट शनिवार को आयी। इतनी बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं की रिपोर्ट पॉजिटिव आने से जहां एक ओर हड़कंप मच गया है, वहीं दूसरी ओर अभिभावकों में भारी रोष व्याप्त है।
कुछ अभिभावकों ने इतनी बड़ी संख्या में छात्रों के संक्रमित होने के पीछे कॉलेज प्रशासन की लापरवाही को जिम्मेदार बताया है। अभिभावकों का कहना है कि कुछ दिन पूर्व कॉलेज के एक छात्र के बारे में पॉजिटिव होने की चर्चा थी। मगर कॉलेज प्रशासन ने इस ओर ध्यान नहीं दिया और ना ही कॉलेज में किसी की जांच करने की जरुरत महसूस की।
कॉलेज हॉस्टल में रह कई छात्राओं को कुछ दिन पहले से सर्दी-जुखाम की शिकायत हो रही थी। मगर तब भी कॉलेज प्रशासन ने जांच कराने के बजाय सब चीज पर पर्दा डालने का दुष्प्रयास किया। इन छात्राओं ने जब अभिभावकों को अपने स्वास्थ्य के बारे में जानकारी दी तो, चिंतित अभिभावकों ने जन प्रतिनिधियों के माध्यम से शासन-प्रशासन तक अपनी बात पहुंचाई और छात्रों के स्वास्थ्य की जांच के लिए दवाब बनाया।
अभिभावकों का मानना है कि यदि कॉलेज प्रशासन समय रहते उचित कदम उठा देता तो इतनी बड़ी संख्या में संक्रमण नहीं फैलता। फिर जो छात्र प्रतिदिन अपने घरों अथवा किराए के घरों से कॉलेज आते हैं, वो कोरोना कैरियर के रूप में पता नहीं कितने लोगों तक संक्रमण फैला चुके होंगे। हॉस्टल में रह रही छात्राओं के अभिभावकों को यह भी चिंता है कि कोरोना पॉजिटिव निकलने के बाद उनके बच्चों की देखरेख पता नहीं किस तरह से होगी ?
अभिभावकों ने छात्राओं के स्वास्थ्य की देखरेख, भोजन इत्यादि की व्यवस्था जिला प्रशासन की निगरानी में कराने और कॉलेज प्रशासन की लापरवाही की जांच की मांग भी की है। इधर, इस संबंध में काफी प्रयासों के बाद भी कॉलेज प्रशासन से सम्पर्क नहीं हो सका। यदि कॉलेज प्रशासन अपना पक्ष रखेगा तो उसे भी प्रकाशित किया जाएगा।

- प्रवीण गुगनानी
लेखक व स्वतंत्र स्तंभकार
बंगाली में एक कहावत है – डूबे डूबे झोल खाबा। इसी भावार्थ की एक देसी कहावत है – ऊंट की चोरी नेवड़े नेवड़े नहीं हो सकती। दोनों ही कहावतों का एक सा अर्थ है कि बड़ी चोरी आज नहीं तो कल पकड़ी ही जाएगी। पश्चिम बंगाल में हिंदू हितों की चोरी ममता दीदी की एक ऐसी ही चोरी थी जिसका पकड़ा भी जाना तय था और उसका दंड मिलना भी तय था। तुर्रा यह था की यहां ममता दीदी द्वारा हिंदू हितों को चोरी करना या बलि चढ़ाने का कार्य डूबे डूबे झोल खाबा की शैली में नहीं, बल्कि बड़ी ही बेशर्मी से सीनाजोरी करके किया जा रहा था। चोरी ऊपर से सीनाजोरी करने की ही हद थी जब ममता दीदी ने उनके द्वारा प्रतिवर्ष कराए जाने वाले एक कार्यक्रम में कहा था – ”पश्चिम बंगाल में 31 फीसद मुस्लिम हैं। इन्हें सुरक्षा देना मेरी जिम्मेदारी है और अगर आप इसे तुष्टीकरण कहते हैं तो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है।” यहां उल्लेखनीय है कि ममता दीदी उन्हें केवल सुरक्षा नहीं दे रही थी, बल्कि मुस्लिमों को हिन्दुओं के विरुद्ध समय-समय पर भड़का रही थी और हिंदुओं को बार-बार चिढ़ा रही थी।
ममता दीदी पंडालों में दुर्गा पूजा व विद्यालयों में सरस्वती पूजा को रोक रही थी। मुहर्रम के कारण दुर्गा विसर्जन की तिथियां आगे बढ़ाई जा रही थी। मुस्लिमों हेतु नई सस्ती, सहज, आसान कर्ज नीति लाई जा रही थी। उनके लिए नई रोजगार नीति, मदरसों को धड़ाधड़ मान्यता व सहायता, आवास सब्सिडी, आवास भत्ता, फुरफुरा शरीफ डेवलपमेंट अथारिटी के माध्यम से वित्तीय सहायता से लाद देना, दो करोड़ बच्चों को छात्रवृत्ति, मुस्लिमों को उच्च शिक्षा व सरकारी नौकरी में 17% आरक्षण आदि आदि ऐसे कार्य थे जो मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए तीव्र गति से किए जा रहे थे। ममता दीदी के लिए इस चुनाव में संकट बन चुके अब्बास सिद्दीकी भले ही भाजपा से चिढ़कर कहते हों, किंतु कहते अवश्य हैं कि – “मुहर्रम के कारण दुर्गा विसर्जन की तिथि आगे बढ़ाये जाने के निर्णय गलत थे।”
बंगाल में 35 वर्ष वामपंथ का शासन व 10 वर्ष ममता दीदी का शासन वस्तुतः ऐसा शासन था जिसमें राम के इस प्रदेश में राम का नाम लेना ही गुनाह हो गया था। वामी तो राम के विरोधी थे ही, दीदी उनसे भी बड़ी राम विरोधी निकली और चलती गाड़ी से स्वयं निकलकर जय श्रीराम के नारे लगाते बच्चों को बड़ी ही निर्लज्जता से डांटने लगी थी। बच्चों को श्रीराम का नारा लगाने पर डांटना एक छोटी किंतु प्रतीकात्मक बड़ी घटना है जिसके बड़े ही विशाल अर्थ निकलते हैं।
अतीव ईश्वरवादी, संस्कृतिनिष्ठ व राष्ट्र्प्रेमी प्रदेश बंगाल में 35 वर्षो तक अनीश्वरवादी व संस्कृति विरोधी वामियों व 10 वर्षों का ऐसा ही ममता का शासन अपने आप में आश्चर्य का ही विषय है। 45 वर्षों के इस रामविरोधी या यूं कहें हिंदू विरोधी शासनकाल में भाजपा बंगाल में 2016 तक एक-एक विधानसभा सीट जीतने को भी तरसती रही। इसी मध्य चमत्कार हुआ जब 2018 के पंचायत चुनाव में भाजपा ने अच्छा-खासा मत लेकर सनसनी फैला दी। फिर यहां से प्रारंभ हुई बंगाल में वामपंथ से रामपंथ की यात्रा, जिसका अगला पड़ाव 2019 के लोकसभा चुनाव में आया और भाजपा को बंगाल ने जयश्रीराम कहते हुए 40 प्रतिशत मत व 42 में से 18 लोकसभा सीटें दे दी।
वर्तमान समय में जबकि विधानसभा चुनाव के पांच चरण संपन्न हो चुके हैं तब बंगाल में पुराने वामपंथी भी एक सुर में यह कहते दिखाई दे रहे हैं कि – “21 में राम और 26 में वाम” यानि वर्तमान में सत्ता ममता से लेकर भाजपा को दे दो और फिर 2026 के विधानसभा चुनाव में वाम मोर्चा की सरकार पुनः ले आओ। आश्चर्यजनक है किंतु यही सत्य है। बंगाल में मैदानी स्तर पर यह बात सतह से ऊपर आकर दिख रही है। बंगाल में मृत्युशैया पर पड़े वामपंथ का अब यही मंतव्य भी है और नियति भी। सार यह कि ममता को सबक सिखाने का मन बंगाल ने बना लिया है।
ये सब अचानक नहीं हुआ है, मुस्लिम तुष्टिकरण की दीदी की नीति ने बंगाल की जनता को विवश कर दिया था। भाजपा के घोर विरोधी व ममता के समर्थक माने जाने वाले नोबेल सम्मानित अर्थशास्त्री अमृत्य सेन की संस्था प्रतीचि ट्रस्ट ने अपनी 2016 की रिपोर्ट “लिविंग रिएलिटी ऑफ़ मुस्लिम्स इन वेस्ट बंगाल” में कहा था कि तृणमूल के प्रभाव वाले क्षेत्रों में मुसलमानों की स्थिति अन्य लोगों की अपेक्षा बहुत सुधर गई है। हावड़ा के पंचपारा मदरसे के बड़े इमाम के अनुसार – ” ममता बनर्जी के आने के बाद से स्थिति बेहतर हुई है। अब बच्चों को राशन, कपड़ा, किताबें सब कुछ मिलता है। पुरानी सरकार की तुलना में इस सरकार ने बेहतर काम किया है।
हुबली के एक शख़्स मोहम्मद फ़ैसल का कहना है कि “दीदी ने जो काम किया है, उसके बाद दीदी के खिलाफ कोई नहीं जा सकता है। दीदी ने जो हम लोगों के लिए किया है, हमारे बच्चों के लिए किया है, वैसा कभी नहीं हुआ। हम लोग बहुत ख़ुश हैं दीदी के राज में। दीदी ने हम लोगों का बहुत ध्यान रखा है।” एक बात यह भी बड़ी विशेष है कि ममता राज में बंगाल पुलिस में भी मुस्लिम नियुक्ति का अनुपात भी बड़े आश्चर्यजनक ढंग से बढ़ गया है। कम शिक्षित मुस्लिम समाज को अधिक शिक्षित हिंदू समाज की अपेक्षा अधिक नौकरियां मिलना भला बिना किसी उच्चस्तरीय षड्यंत्र के कैसे संभव है? ममता दीदी द्वारा राज्य की 97 प्रतिशत मुस्लिम जनता को ओबीसी में सम्मिलित कर लिया जाना एक बड़ा सामाजिक अन्याय और असमानता उत्पन्न करने का कारण है यहां।
इन कष्टप्रद व संघर्षप्रद परिस्थितियों में 2019 के लोकसभा चुनाव के पूर्व भाजपा के चाणक्य अमित शाह ने संगठन सुदृढ़ करने हेतु मध्यप्रदेश के कद्दावर नेता व हरियाणा चुनाव में प्रभारी के तौर पर स्वयं को सिद्ध कर चुके कैलाश विजयवर्गीय को बंगाल भेजा। कैलाश विजयवर्गीय ने भी जैसे इंदौर को छोड़कर बंगाल को अपना घर ही बना लिया। अथक परिश्रम, सुदृढ़ योजना, कार्यकर्ताओं के घर परिवार तक पहुंचना, उनके दुःख सुख में सतत सम्मिलित होना, केंद्र सरकार की योजनाओं को बंगाल में सुव्यवस्थित रीती-नीति से संचालित करना आदि कैलाश विजयवर्गीय की इस सफल कार्यशैली की विशेषताएं रही है।
भाजपा के प्रदेश प्रभारी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर बंगाली जनता के विश्वास को मतों में बदलने में सफल होते दिखाई पड़ रहे हैं। इन सब कार्यों से बंगाल में भाजपा का संगठन नये सिरे से खड़ा होता चला गया। बंगाल में एक नया राष्ट्रीय भाव भी सम्मिलित होता चला गया और वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राग में राग मिलाकर “आमार शोनार बांग्ला” भारत माता की जय का भी जयघोष करने लगा। बंगाल की भद्र जनता को “खेला होबे” जैसा असभ्य नारा चिढ़ा रहा है, शोनार बांग्ला के लोग कभी खिलंदड़ नहीं रहे हैं। वे समूचे भारत को बौद्धिक दिशा देने में सक्षम लोग रहे हैं। बंगाल के इस विधानसभा चुनाव में बंगाल की जनता शेष राष्ट्र को क्या संदेश देती है यह देखना बड़ा ही रुचिकर व चर्चा का विषय रहने वाला है।

- सुयश त्यागी
स्वतंत्र पत्रकार व लेखक
कोरोना संक्रमण की बढ़ती रफ्तार से ना केवल भारत अपितु सम्पूर्ण विश्व एक गंभीर संकट झेल रहा है। भारत में पिछली लहर के मुकाबले इस लहर से संकट कई अधिक गहरा गया है। संकट गहराने की मुख्य वजह संक्रमण का शहरों के साथ ग्रामों की ओर रुख करना है। लगातार बढ़ते मरीजों के अनुपात में बढ़ती स्वास्थ्य जरूरतों का एक बड़ा अभाव समाज में दिखता है। शासन प्रशासन की पुरजोर कोशिशों के बाद भी शहरों से लेकर ग्रामों तक नागरिकों की पीड़ा उमड़ रही है।
महामारी के प्रकोप से चरमराती व्यवस्था में भारत के अनेक ग्रामों से नागरिकों का शासन से प्रश्न उठना जायज है, पर उन उठते प्रश्नों में गांधी जी की ग्राम स्वराज की अवधारणा से फलीभूत नागरिकों से भी कुछ प्रश्नों का स्वतः समरण हो उठता है। गांधी जी का मानना था भारत का विकास यहां के ग्रामों को केंद्र में रखे बिना संभव नही। उनका चिंतन ग्रामों का भौतिक रूप से पुनर्निर्माण का नही अपितु उन्हें आत्मनिर्भर बनाना था।
कोरोना संक्रमण शहरों की तरह ग्रामों में भी तेजी से पांव पसार रहा है, वहां की स्वास्थ्य सुविधाओं का शहरों से मुकाबला करना ही एक बेमानी सी होगीl गांधी जी की ग्राम स्वराज के माध्यम से ग्राम में निवासरत प्रत्येक ग्रामवासी की भारत के शासन में कैसे सहभागिता हो इसकी कल्पना थी, पर वर्तमान परिदृश्य में वो कल्पना अधूरी सी प्रतीत होती है।
आज हर दूसरा व्यक्ति स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार के लिए राज्य से लेकर केंद्र सरकार तक दोषारोपण करता है। बड़े नेताओं को सड़कों पर कोसता है, किंतु स्वयं के कर्तव्यों का विश्लेषण नहीं करता। अपने दायित्व का कभी बोध नही करता। प्रश्न भी तब करता है, जब बात हाथ से निकल चुकी होती है और उसके वो प्रश्न समाज में एक तनाव, अराजक व नकारात्मक वातावरण की स्तिथि उत्पन्न करने के सिवाय कुछ बड़ा बदलाव नही कर पाते।
उसे कभी स्वयं के मूलभूत अधिकारों की भी विवेचना करनी चाहिए कि उसने अपने ग्राम में होने वाली ग्राम सभाओं में कितनी बार ग्राम के विकास की योजना में सहभागिता ली होगी? कितनी बार अपने ग्राम के सरपंचों से वहां के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों या विद्यालयों की स्थिति पर ध्यान केंद्रित करवाया होगा? कितनी बार वहां पर साक्षरता, स्वच्छ्ता, कोरोना से बचने के लिए जनजागरण जैसे मुद्दों को उठाया होगा? कितनी बार वहां के विकास कार्य, निर्माण कार्य में लगी राशि का जनपद और खंड कार्यालयों में जाकर सत्यापन करवाया होगा? कितनी बार उसने ग्राम में कार्य कर रहे शासकीय कर्मचारियों से काम को गंभीरता व समय के पाबंदी से करने का आग्रह किया होगा?
आखिर करे भी तो क्यों! हर कार्यरत्त व्यक्ति ग्राम स्तर पर उसका कहीं ना कहीं परिचित या रिश्तेदार ही होगा। अपने आस-पड़ोस ग्राम और शहर का हाल देख वो पीड़ित भी होता है और लोगों की जवाबदेही तय करने से भी डरता है। हालांकि गलती उसकी भी नही है, ये मानव स्वभाव होता ही ऐसा है, अपनी व समाज की गलतियों को दूसरों पर मढ़ने के लिए हमेशा व्यक्ति सॉफ्ट टारगेट ही चुना करते हैं। गांव में बैठा कोई व्यक्ति राज्य के मुख्यमंत्री या देश के प्रधानमंत्री को कोस कर अपनी कुंठा निकाल लेगा, जमघट लगाकर उसकी निंदा कर लेगा, किंतु स्थानीय स्तर पर जायज लोगों से कभी प्रश्न नही करेगा और ना ही कभी कोई बड़ा बदलाव ला पायेगा।
वो गांव के पंच, सरपंच, जनपद और प्रतिनिधियों से संवाद नही करेगा। उनका उपयोग शायद वो बस अपने घर में होने वाले सामाजिक कार्यक्रमों में शोभा बढ़ाने के लिए ही करेगा। उसे अपने गांव के विकास से ज्यादा इस बात की चिंता रहेगी कि जनप्रतिनिधि सबसे पहले उसके घर पर आकर विराजमान हो, जिससे उसका व उसके परिवार का उसके गांव व आसपास के क्षेत्र में सम्मान बढ़े।
वो परिवर्तन जरूर लाना चाहता है पर उसका वो परिवर्तन सिर्फ विचारों तक ही सीमित है। जब बात वास्तविकता के धरातल पर आएगी तो प्रश्न कभी उसके परिजन पर उठेंगे तो कभी उसके परिचितों पर, जिससे उसकी क्रांति क्षणभर में शून्य होकर अधूरी रह जाएगी। उसे दूसरों राज्य में या किसी शहर में हुए चुनाव दिखेंगे। हरिद्वार में हुआ कुंभ दिखेगा, पर जब वो उनका असर अपने ग्राम पर देखेगा तो उसे दिखेगा की वहां ना अभी चुनाव थे, ना ही कुंभ और ना उन कारणों से वहां संक्रमण फैला, फिर आखिर क्यों उस ग्राम में ऐसी परिस्तिथि का निर्माण हो गया। मूल बात को छोड़कर वो हर अनर्गल बात करेगा, स्वयं तो भ्रमित बैठा ही है दूसरों को भी निरंतर भ्रमित करेगा।
अगर वास्तव में आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी ग्रामों में जमीनी स्तर पर ऐसे बड़े बदलाव आये होते तो यकीनन उनका असर आज ऊपर तक दिखता। वास्तविकता में क्क्त अभी खामियां निकालने की नहीं, ग्राम स्तर से लेकर केंद्र स्तर तक एकजुट होकर इस महामारी से लड़ने का है। आज इस महामारी से पीड़ा की घड़ी में जिला अस्पताल और ब्लॉक स्तर पर बने अस्पतालों की व्यस्तता किसी से छुपी नही है। ऐसे में इस देश में कितने ऐसे गांव होंगे जिन्होंने स्वयं के क्वारंटाइन सेन्टर निर्मित किए होंगे?
प्रदेश और देश की चुनी हुई सरकार आपकी है, तो आपके ग्राम, आपके क्षेत्र का चुना हुआ सरपंच या प्रतिनिधि भी आपका ही है। वहां अनेक-अनेक दायित्वों पर बैठे विभिन्न अधिकारी भी आपके ही हैं, जिनसे सवाल जवाब करना ना सिर्फ आपका अधिकार है, अपितु गांव व क्षेत्र के समग्र विकास के लिए आपका कर्तव्य भी है। बहरहाल, जिस दिन ग्रामों की सहभागिता जब कार्य योजना में बढ़ेगी तो गांधी जी की 150वी जन्मशताब्दी पार चुका भारत और उसे आत्मनिर्भर बनाने का संकल्प लिए देश के वर्तमान प्रधानमंत्री का स्वप्न वास्तव में सच हो जाएगा।
In a meeting chaired by PM Narendra Modi, an important decision of allowing vaccination to everyone above the age of 18 from 1st May has been taken. PM said that the Government has been working hard from over a year to ensure that maximum numbers of Indians are able to get the vaccine in the shortest possible of time. He added that India is vaccinating people at world record pace& we will continue this with even greater momentum.
India’s National Covid-19 Vaccination Strategy has been built on a systematic and strategic end-to-end approach, proactively building capacity across R&D, Manufacturing and Administration since April 2020. While pushing for scale and speed, it has simultaneously been anchored in the stability necessary to sustainably execute the World’s Largest Vaccination Drive.
1 मई से कोरोना वैक्सीनेशन का तीसरा चरण शुरू होगा, और इस दिन से 18 वर्ष से अधिक उम्र के लोग भी कोरोना का टीका लगवा सकेंगे
प्रधानमंत्री @narendramodi की अध्यक्षता में बैठक के दौरान यह फैसला किया गया।#COVID19Vaccination #LargestVaccinationDrive pic.twitter.com/YHQLkS994J
— सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (@MIB_Hindi) April 19, 2021
India’s approach has been built on scientific and epidemiological pillars, guided by Global Best Practices, SoPs of WHO as well as our India’s foremost experts in the National Expert Group on Vaccine Administration for Covid-19 (NEGVAC).
India has been following a dynamic mapping model based on availability of vaccines & coverage of vulnerable priority groups to take decisions of when to open up vaccinations to other age-groups. A good amount of coverage of vulnerable groups is expected by 30th April.
असामान्य जीवन शैली के कारण आज लगातार पूरे विश्व में लीवर रोगियों की संख्या बढ़ती जा रही है। जब लीवर ठीक से अपनी मरम्मत और खुद को फिर से भरने में विफल रहता है, तो इससे नॉन एल्कोहलिक फैटी लिवर डिसीज (एनएएफएलडी) उत्पन्न होता है। एक बार जब यह स्थिति उत्पन्न हो जाती है, तो कोई इलाज उपलब्ध नहीं होता है। दुनिया भर में लगभग 1 बिलियन व्यक्तियों (वैश्विक आबादी का 20-30 प्रतिशत) के पीड़ित होने का अनुमान है। भारत में, यह जनसंख्या के 9-32 प्रतिशतके बीच है। यह तथ्य इस बात का सूचक है कि 10 भारतीयों में से 1 से 3 व्यक्तियों को फैटी लीवर या संबंधित बीमारी होगी।
सोमवार को विश्व लीवर दिवस के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम में केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण राज्य मंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने यह आंकड़े रखे। उन्होंने कहा कि लीवर दूसरा सबसे बड़ा अंग है जो चुपचाप सभी महत्वपूर्ण कार्य करता है। असामान्य जीवनशैली के कारण शरीर पर हमले का मुख्य रूप से सामना भी लीवर ही करता है। उन्होंने इसे एक मूक महामारी बताया और लोगों से सचेत रहने का आग्रह किया। उन्होंने धूम्रपान, मदिरापान व जंक फूड का त्याग करने की अपील की , क्योंकि ये इन बीमारियों को बढ़ाने वाले कारक हैं।
कोविड-19 महामारी के इस दौर में स्वास्थ्य के प्रति सजग हुए हैं। इसमें निरंतरता जरूरी है। @MoHFW_INDIA द्वारा #विश्वयकृतदिवस पर आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता की। बेहतर स्वास्थ्य के लिए यकृत की देखभाल आवश्यक है। इसके प्रति जागरूक रहने की जरूरत है। pic.twitter.com/jF31JZ9U5c
— Ashwini Kr. Choubey (@AshwiniKChoubey) April 19, 2021
उन्होंने स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालने वाले खर्राटे जैसे लक्षणों पर सतर्कता बरतने और चिकित्सा परामर्श लेने का भी आग्रह किया। उन्होंने ‘मित-भुक्ता’ और ‘ऋत-भुक्ता’ शब्दों पर जोर देते हुए उस प्राचीन अवधारणा को प्रतिपादित किया कि मितव्ययी रूप से और ज्यादातर मौसमी खाद्य पदार्थों के सेवन से लंबी आयु प्राप्त करने में मदद मिलती है।
This World Liver Day, promise yourself to keep your liver in good shape for maintaining a good health. #WorldLiverDay #SwasthaBharat #WorldLiverday2021 @PMOIndia @drharshvardhan @AshwiniKChoubey @PIB_India @mygovindia @NITIAayog pic.twitter.com/9imGaAq67M
— Ministry of Health (@MoHFW_INDIA) April 19, 2021
वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से आयोजित इस कार्यक्रम में विश्व स्वास्थ्य संगठन की दक्षिण पूर्व एशिया क्षेत्रीय कार्यालय की क्षेत्रीय निदेशक डॉ. पूनम खेत्रपाल सिंह, अपर सचिव एवं राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की मिशन निदेशक वंदना गुरनानी, स्वास्थ्य सेवा महानिदेशक डॉ. सुनील कुमार, संयुक्त सचिव (गैर-संक्रामक रोग) विशाल चौहान, यकृत एवं पित्त विज्ञान संस्थान (आईएलबीएस) के निदेशक डॉ. एस.के.सरीन आदि उपस्थित थे।
उत्तराखंड भाजपा के प्रदेश महामंत्री (संगठन) अजेय कुमार कोरोना पॉजिटिव हो गए हैं। उनके कोरोना पॉजिटिव होने की सूचना पर प्रदेश के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत, विधानसभा अध्यक्ष प्रेम चंद्र अग्रवाल, भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री व उत्तराखंड प्रभारी दुष्यंत गौतम, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक समेत अनेक वरिष्ठ नेताओं ने शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की कामना की है।
कोरोना पॉजिटिव होने की जानकारी अजेय कुमार ने रविवार को खुद अपने ट्विटर हैंडल पर दी। उन्होंने लिखा- शुरुआती लक्षण दिखने पर मैंने कोविड की जांच कराई और मेरी रिपोर्ट पॉजिटिव आई है। प्रभु की कृपा से मैं स्वस्थ हूं तथा चिकित्सकों की देख-रेख में उपचार ले रहा हूं।
आप शीघ्रातिशीघ्र कोरोना को परास्त कर पुनः अपना कार्यभार कुशलता से संपादित करें, मैं भगवान बदरी विशाल और बाबा केदार से यह मंगलकामना करता हूं। https://t.co/h7Y1sWBKEh
— Tirath Singh Rawat (मोदी का परिवार) (@TIRATHSRAWAT) April 18, 2021
उनके कोरोना पॉजिटिव निकलने पर प्रदेश के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने ट्वीट कर शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की कामना की है। विधानसभा अध्यक्ष प्रेमचंद अग्रवाल ने उनके शीघ्र स्वस्थ होने की कामना करते हुए अजेय कुमार से दूरभाष पर बात कर उनके स्वास्थ्य का हाल चाल भी जाना है।
भाजपा के प्रदेश प्रभारी दुष्यंत गौतम ने ट्वीट कर प्रदेश महामंत्री (संगठन) के स्वास्थ्य लाभ की कामना की है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक ने अजेय कुमार के शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की कामना करते हुए कहा कि अजेय कुमार लगातार चिकित्सकों के सम्पर्क में है और शीघ्र स्वास्थ्य लाभ लेकर अपने कार्य में जुटेंगे।
उधर, पार्टी के प्रदेश मीडिया प्रभारी मनवीर सिंह चौहान ने कहा कि दिल्ली प्रवास के दौरान अजेय कुमार की मेडिकल रिपोर्ट पॉजिटिव आयी और उन्होंने खुद को आइसोलेट कर लिया है। अजेय कुमार ने खुद के संपर्क में आये लोगों को अपना टेस्ट कराने को कहा है।
मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने कोविड-19 की स्थिति की समीक्षा के लिए रविवार को आपात बैठक बुलाई और कई महत्वपूर्ण निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि मास्क व सोशल डिस्टेंसिंग का पालन न करने वालों पर सख्त कार्रवाई की जाए। बिना मास्क के घूमने वालों पर जुर्माने की राशि को 200 रूपए से बढ़ाकर 500 रूपए करने के निर्देश दिए। उन्होंने रात्रि कर्फ़्यू को सख्ती से लागू करने को कहा और कहा कि शादी-विवाह में लोगों की अनुमन्य संख्या को 200 से घटाकर 100 किया जाए।
बीजापुर हाउस में शासन के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक में मुख्यमंत्री ने कहा कि स्थिति ज्यादा न बिगड़े, इसके लिए वर्तमान में लागू गाईडलाईन का अक्षरशः पालन करवाया जाना है। जो भी इसका उल्लंघन करे, उसके खिलाफ कार्यवाही में किसी प्रकार की ढिलाई न बरती जाए। राज्य की सीमाओं पर आवश्यकतानुसार चेकपोस्ट स्थापित किए जाएं और बिना आरटी-पीसीआर नेगेटिव रिपोर्ट के किसी को अनुमति न दी जाए। आगे की स्थिति का आंकलन करते हुए उसके अनुसार कोविड अस्पताल बनाए जाएं। अधिक से अधिक टेस्टिंग पर फोकस किया जाए।
कोविड की दवाओं की कालाबाजारी पर लाइसेंस निरस्त करने, टेस्टिंग बढ़ाने, फिलहाल चारधाम यात्रा और हेमकुण्ड साहिब की यात्रा पर आने वालों के लिए आरटीपीसीआर की नेगेटिव रिपोर्ट जरूरी करने के निर्देश दिए।
— Tirath Singh Rawat (मोदी का परिवार) (@TIRATHSRAWAT) April 18, 2021
मुख्यमंत्री ने कहा कि यह सुनिश्चित कर लिया जाए कि कोविड के ईलाज के जरूरी दवाईयों की ब्लैकमार्केटिंग न हो। यदि कोई दवा विक्रेता इसमें लिप्त पाया जाए तो तत्काल लाईसेंस निरस्त करते हुए सख्त से सख्त कार्यवही की जाए। कोविड से संबंधित सभी जरूरी उपकरण सरकारी अस्पतालों में उपलब्घ होने चाहिए। दवाईयों की कीमतों पर भी नियंत्रण रखा जाए। जिन जिलों में ज्यादा मामले आ रहे हैं, वहां नोडल अधिकारी तैनात किए जाएं।
मुख्यमंत्री ने कहा कि फिलहाल चारधाम यात्रा और हेमकुण्ड साहिब की यात्रा पर आने वालों के लिए आरटी-पीसीआर की नेगेटिव रिपोर्ट जरूरी कर दी जाए। उन्होंने कहा कि कोविड काल में प्रदेश की आर्थिकी को होने वाले नुकसान को किस प्रकार कम से कम किया जा सकता है, इसकी कार्ययोजना तत्काल बनाई जाए। उन्होंने वैक्सीनैशन अभियान में भी तेजी लाने, होम आइसोलेशन के लिए जरूरी प्रोटोकाॅल का पूरा पालन करवाने, होम आईसोलेशन वालों को जरूरी किट देने और उनसे लगातार सम्पर्क रखने को भी कहा।
बैठक में मुख्य सचिव ओमप्रकाश, डीजीपी अशोक कुमार, सचिव अमित नेगी, नितेश झा, शैलेश बगोली, एस.ए.मुरुगेशन, डाॅ. पंकज पाण्डेय, सूचना महानिदेशक रणवीर सिंह चौहान सहित शासन के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।
पीएम मोदी ने जाना संतों के स्वास्थ्य का हाल, कोरोना संकट के चलते कुंभ को प्रतीकात्मक रखने की अपील की
हरिद्वार में चल रहे महाकुंभ के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि से फोन पर बातचीत की और सभी संतों के स्वास्थ्य का हाल जाना। उन्होंने प्रशासन के साथ पूरा सहयोग करने के लिए संत समाज के प्रति आभार जताया।
प्रधानमंत्री मोदी ने ट्वीट कर यह जानकारी दी है। ट्वीट में मोदी ने अनुरोध किया कि दो शाही स्नान संपन्न हो चुके हैं इसलिए आगे कुंभ को अब प्रतीकात्मक ही रखा जाए। इससे महामारी के खिलाफ लड़ाई में ताकत मिलेगी।
मैंने प्रार्थना की है कि दो शाही स्नान हो चुके हैं और अब कुंभ को कोरोना के संकट के चलते प्रतीकात्मक ही रखा जाए। इससे इस संकट से लड़ाई को एक ताकत मिलेगी। @AvdheshanandG
— Narendra Modi (@narendramodi) April 17, 2021
मोदी के ट्वीट के जवाब में स्वामी अवधेशानंद गिरि ने प्रधानमंत्री के आह्वान का सम्मान करते हुए प्रतिक्रिया दी और श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि कोविड की परिस्थितियों को देखते हुए भारी संख्या में स्नान के लिए न आएं और कोविड नियमों का अवश्य पालन करें।
यहां यह बता दें, कि हरिद्वार में कुंभ के दौरान अब तक कई प्रमुख संत कोरोना से संक्रमित हो गए हैं। कोरोना संकट को देखते हुए कुछ संतों ने कुंभ को सांकेतिक रखने की बात भी कही है।
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत तथा केंद्रीय खेल एवं युवा मामलों के राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) किरेन रिजिजू ने शुक्रवार को टिहरी में वाॅटर स्पोर्ट्स एंड एडवेंचर इंस्टीट्यूट का उद्घाटन किया।
इस अवसर पर मुख्यमंत्री तीरथ ने कहा कि राज्य सरकार प्रदेश में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए निरंतर कार्य कर रही है। इसके मद्देनजर ही टिहरी झील क्षेत्र में वाॅटर स्पोर्ट्स एंड एडवेंचर इंस्टीट्यूट बनाने का फैसला किया गया।
उन्होंने कहा कि साहसिक खेलों के लंबे गौरवशाली इतिहास और अनुभव को देखते हुए इस संस्थान के संचालन और प्रबंधन का कार्य आईटीबीपी को सौंपने का निर्णय लिया गया है। यहां पैरा ग्लाइडिंग, पैरा मोटर, पैरासेलिंग बोट, स्कूबा ड्राइविंग, हाॅट एयर बैलून, क्याकिंग, केनोइंग, हाईरोप कोर्स, रॉक क्लाइंबिंग, जुमारिंग, रैपलिंग और ऑल टेरेन बाइक सहित कई साहसिक खेलों का प्रशिक्षण दिया जाएगा।

उन्होंने कहा कि आईटीबीपी को इस संस्थान के संचालन के लिए राज्य सरकार से जो भी सहयोग चाहिए होगा, वह प्राथमिकता से उपलब्ध करवाने की बात कही।
केंद्रीय राज्यमंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि वाॅटर स्पोर्ट्स एंड एडवेंचर इंस्टीट्यूट के रूप में आज देश में खेल के क्षेत्र में नया अध्याय जुड़ा है। वाॅटर स्पोर्ट्स के क्षेत्र में हमारा देश ओलिंपिक, एशियन गेम्स, काॅमनवेल्थ आदि में विशेष उपलब्धि हासिल नहीं कर पाया है। इस दिशा में केंद्र सरकार द्वारा विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि हमारे देश में प्रतिभावान खिलाड़ियों की कोई कमी नहीं है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहतर प्रदर्शन करने के लिए उन्हें उचित प्रशिक्षण और सुविधाएं देने के लिए अनेक प्रयास किए जा रहे हैं।
Sh Tirath Singh Rawat, Hon'ble CM Uttarakhand along with Sh Kiren Rijiju, Hon'ble Union MoS (I/C) Youth Affairs and Sports inaugurated the Water Sports Adventure Institute (WSAI), ITBP, Tehri, Uttarakhand today@TIRATHSRAWAT @KirenRijiju #Himveers pic.twitter.com/imyyV1B6cw
— ITBP (@ITBP_official) April 16, 2021
रिजिजू ने कहा कि हमारे देश में वाॅटर स्पोर्ट्स की अपार संभावनाएं हैं और उत्तराखंड वाॅटर स्पोर्ट्स और एडवेंचर एक्टिविटीज़ के लिए सबसे उपयुक्त स्थान है। यहां ट्रेकिंग, राॅक क्लाइंबिंग, पैराग्लाइडिंग, स्कूबा डाइविंग, पैरा मोटर, ऑल टेरेन बाइक, कयाकिंग, केनोइंग, स्कीइंग आदि का प्रशिक्षण पाकर खिलाड़ी देश का नाम रोशन करेंगे। आईटीबीपी को 20 साल के लिए यह संस्थान संचालित करने के लिए प्रदान करने के निर्णय से इस संस्थान से देश का प्रतिनिधित्व करते हुए अनेक खिलाड़ी निकलेंगे।
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि औली में स्नो स्पोर्टस के विकास के लिए भी केंद्र सरकार ने धनराशि दी है, ताकि वहां अंतरराष्ट्रीय स्तर का प्रशिक्षण सेंटर विकसित हो सके। देश में खेलों के विकास के लिए जो भी सहायता चाहिए होगी, वह प्रदान करेंगे।
इस अवसर पर टिहरी की सांसद महारानी माला राज्यलक्ष्मी शाह, विधायक धन सिंह नेगी, टिहरी की जिला पंचायत अध्यक्ष सोना सजवान, आईटीबीपी के महानिदेशक एसएस देसवाल, आईटीबीपी के एडीजी मनोज सिंह रावत, महानिदेशक उत्तरी फ्रंटियर निलाभ किशोर, टिहरी की डीएम ईवा आशीष श्रीवास्तव आदि उपस्थित थे।
